१)
न गए का ग़म
न आने वाले का ख़ैर-मक़दम
नए साल में
नई खाल में
जुज्झि करेंगे लोकपाल में
आरक्षण में ,संघवाद में,
संसद में सब नाच करेंगे
फिर से अपनी सुर-ओ-ताल में
३)
गए और नए
दोनों का आभार है,
गए ने जहाँ
कई नए मिलाए ,
नाकुछ रहे जो
वो अलगाए !
नए में सब पुराने रहेंगे,
चाहे नए जितने बनेंगे !
पुरनिया तो थाती हैं,पक्के संघाती हैं !
अब देखिये अपने अली साहब की दुआएं !
(३१/१२/२०११ को आखिरी आती हुई मेल में )
ना तो आज जिंदगी का कोई आख़िरी दिन है,
और ना ही कल पहला होने वाला है .
...बस दुआओं के ख्याल से
कुछ लम्हें फिक्स कर रक्खे हैं !
सो दुआ ये कि
आप खुशहाल-ओ-आबाद रहें
लम्हें आपके इशारे पर थिरकते रहें
और वक्त आपकी मुट्ठी में क़ैद रहे !!
