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4 जून 2012

मेरे गीत---अब सबके गीत !

करीब दस रोज़ पहले सतीश सक्सेना जी  से बात हुई और तय हुआ कि उनके दिल्ली-आवास पर मुलाक़ात हो.इस मुलाक़ात की फौरी वज़ह तो उनकी पहली कृति को हासिल करना था,पर पहली बार मिलने का उल्लास भी था.सतीशजी ने बकायदा समझा दिया ताकि हमें उन तक पहुँचने में कोई दिक्कत पेश न हो.आखिर तय-समय पर मैं उनके आवास पर पहुंचा तो बिना किसी औपचारिकता के उन्होंने गले लगाया.ऐसा लगा ही नहीं कि यह हमारी पहली भेंट हो !

सप्रेम-भेंट 
हमने ब्लॉगिंग के वर्तमान घटनाक्रम पर खूब चर्चा की.इस बीच चाय-पानी भी होता रहा.उनके अतिथि-कक्ष में रखा निकॉन का बड़ा कैमरा मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था.अचानक सतीश जी अपने इस प्रिय हथियार को लेकर मुझ पर ताबड़तोड़ टूट पड़े.मैं हतप्रभ,गोया  सेलिब्रेटी हो गया होऊँ ! इत्ते फोटू खींचे कि मेरी सारी परदेदारी उजागर हो गई.चित्रों में मेरे उड़े हुए बाल अचानक मेरे उम्रदराज़ हो जाने की चुगली करने लगे थे.कुछ चित्र वाकई खूबसूरत थे.जब उनकी बहू आ गई तो हम दोनों ने एक साथ फोटो खिंचाई.सतीशजी ने चालाकी से अपना चश्मा यह कहकर हटा लिया था कि इससे ज़रा बुजुर्गियत झलकेगी !!

बहरहाल,अब बात असल मुद्दे की. उन्होंने हाल ही में 'ज्योतिपर्व प्रकाशन ' से छपा अपना पहला काव्य-संग्रह 'मेरे गीत' मुझे भेंट किया .मैंने सरसरी तौर पर वहीँ इस पुस्तक को देखा और उनसे यह आग्रह भी किया कि इसमें से वे अपनी पसंद का एक गीत सुनाएँ.वे सहज भाव से इसके लिए राज़ी हो गए और मैंने अपने मोबाइल से उस दृश्य को कैद कर लिया.'मेरी रचना क्यों लिखी गई' कविता को उन्होंने हमें गाकर सुनाया.


घर आकर जब इस संकलन को पढ़ना शुरू किया तो सबसे ज़्यादा प्रभावित किया सतीशजी की भूमिका ने | माँ को बिलकुल बचपन में खोने का दर्द वही जान सकता है जिसके ऊपर ऐसा पहाड टूटा हो.लगता है,सतीश जी को दर्द का जो घूँट तब मिला ,वही अब कविता का सागर बन के निकल रहा है.उन्होंने भूमिका में कई जगह इस बात को रेखांकित किया है.माँ की तड़प को उन्होंने कितनी शिद्दत से महसूस किया है:
कई बार रातों में उठकर,
दूध गरम कर लाती होगी,
मुझे खिलाने की चिंता में 
खुद भूखी रह जाती होगी,
                                          मेरी तकलीफों में अम्मा,सारी रात जागती होगी |

और यह देखिये:
एक दिन सपने में तुम जैसी  
कुछ देर बैठकर चली गईं ,
हम पूरी रात जाग कर माँ
बस तुझे याद कर रोये थे !

ऐसी रचनाओं को पढ़ते-पढ़ते दिल भर आता है.बिलकुल दर्द को कविता बनाकर कागज पर उतार दिया है !इस संग्रह में माँ को समर्पित कई रचनाएँ हैं  |कवि ने अपने गीतों में अपने दर्द के अलावा अपनों के प्यार का भी इज़हार किया है.इसमें बेटी,बहू और पत्नी पर आधारित संस्मरणात्मक रचनाएँ हैं.जहाँ एक तरफ कवि के जीवन में माँ का अभाव खटकता है,वहीँ बाद में पत्नी,पुत्र,पुत्री और बेटी ने उसके जीवन में ऊर्जा का संचार कर दिया है.इस लिहाज़ से 'मेरे गीत' की रचनाएँ कवि के अपने जीवन के इर्द-गिर्द अनुभव किये जाने से उपजी हैं.इनमें काल्पनिकता के बजाय यथार्थ का पुट ज़्यादा है |

पत्नी को समर्पित एक हास्य-रचना देखिये:
जब से ब्याही हूँ साथ तेरे 
लगता है मजदूरी कर ली,
बरतन धोए,घर साफ करें
बुड्ढे -बुढिया के पैर छुए 
       जब से पापा ने शादी की,फूटी किस्मत अरमान लुटे,
         जब देखो तब बटुआ खाली,हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


अपने पारिवारिक जीवन से इतर सामान्य जीवन,हास्य और प्यार पर भी रचनाएँ हैं,पर हमें उनकी दर्द से भरी रचनाएँ ज़्यादा प्रभावित करती हैं.कविताओं में संवेदनशीलता और सरोकार का अहसास होता है.इनमें कुछ बाल कवितायेँ भी हैं.कवि का पहला संग्रह है,इस नाते कविताओं के चयन में थोड़ा चूक हुई है.इनमें गंभीर कविताओं के बीच बिलकुल हल्की रचना अखरती है.इन्हें या तो अलग से स्थान दिया जाता या इसी संग्रह में देना ज़रूरी था तो अलग सेक्शन बनाया जा सकता था.
फोटोग्राफिक हुनर 

बहरहाल,कवि को उसके पहले संग्रह की ढेर सारी बधाई और मित्रों से यह अनुशंसा कि इस संकलन को अवश्य पढ़ें !
और हाँ,ऑडियो की खराबी के बावजूद सतीश जी को वीडियो में देखें और सुनें !