21 जनवरी 2012

मौसमी हैं बादल !

चुनाव के वक्त हिन्दू होते हैं,मुसलमान होते हैं,
फ़िर पाँच साल तक ,हम इंसान होते हैं !

सालों बाद उनने  हमें गौर से जाना ,
हम उन्हीं के मंदिर के भगवान होते हैं !

सब राज-पाट ले लो, इक अंगूठे के लिए,
बस थोड़े दिनों के वे , जजमान होते हैं !

रख के भी क्या करोगे,जो है तुम्हारे पास,
रखने वाले हर दम, धनवान होते हैं !

आपकी नजदीकियाँ ,अब समझ आई हमें,
बहुत दिनों तलक, हम नादान होते हैं !

हर तरफ से उठ रही , आज ये आवाज़,
हमारी भी जिंदगी के अरमान होते हैं !

इस बदलती रुत ने ,समझा दिया हमें,
मौसमी हैं बादल,मेहमान होते हैं ! 




59 टिप्‍पणियां:

  1. मौसमी हैं, झड़ जायेंगे,
    सन्नाट संदेश..

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  2. आप कसीदे काढते रहें और हम मैदान में जमे हैं ....

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    1. आप देखते रहें कहीं गडबड़ी न हो जाए !

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  3. तगड़ी गोलिया चलाई हैं ....
    शुभकामनायें शिकारी को !

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    1. शिकारी इस बार भी खाली हाथ लौटेगा,
      निशाना फिर से चूकेगा,सयाने हैं परिंदे ये !

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    2. परिंदे मारना लाज़िम, अगर अपना वजूद चाहो !
      कभी बाजों की संगति में कबूतर जी नहीं सकते

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    3. अब लगा है तीर निशाने पर,
      कब तक बचायेगा वो अपने पर !

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    4. वास्ते सतीश भाई ,

      दरिंदे मारना लाजिम ,अगर अपनी ज़मीं चाहो !
      कबूतर एक हो जायें तो शाहीं जी नहीं सकते !!

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    5. बाज के चरण पकड़ें फिर जमी पर आ गिरें
      इस तरह उड़ने से अच्छा, केचुए रेंगा करें।

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    6. @ अली भाई और देवेन्द्र पाण्डेय ,
      आज तो रंग जमा दिया आप लोगों ने ....
      परिंदे शायद संतोष भाई ने बाज जैसे दरिंदों के लिए ही कहा है
      आनंद आ गया !
      आप तीनों से निवेदन है कि इसे आगे बढ़ाएं तो और मज़ा आये ....

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    7. बाज से भी ज़्यादा ,मज़बूत हैं दरिंदे,
      शिकारी रहा समझ ,फक़त इन्हें परिंदे !!

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    8. बड़े शातिर दरिंदे हैं साधू हो नहीं सकते
      परिंदे कैद हैं हर सूँ साथी हो नहीं सकते।

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  4. बहुत ज़बरदस्त व्यंग है .. अच्छी प्रस्तुति

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  5. चुनाव के समय हम,हिंदू-मुसलमान होते है
    बाकी के पांच सालों तक,हम इंसान होते है

    खरी करारी रचना बहुत अच्छी प्रस्तुति,बेहतरीन पोस्ट....
    new post...वाह रे मंहगाई...

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    1. सुधार के लिए आभार....चाहता मैं भी था,पर कुछ कारणों से वह पंक्ति बड़ी होने पर भी रखा !

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    2. हो आयें हैं जी....!शायद अब घट गई हो !

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    1. खूब-खूब आभार बज़रिये देवेन्द्र जी !

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  7. इस बदलती रुत ने ,समझा दिया हमें,
    मौसमी हैं बादल,मेहमान होते हैं !

    आपके मस्त दोहे पढ़ पढ़ कर अब हम भी ख़बरदार हो रहे हैं.
    सुन्दर मस्त प्रस्तुति के लिए आभार.

    समय मिलने पर मेरे ब्लॉग पर भी आईयेगा,संतोष जी.

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  8. मौसमी ही हैं । बस यह मौसम आता है पांच साल में ।

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    1. अच्छा है,जल्दी आएगा,तो फिर से....हमें बंटना होगा !

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  9. अतिथि देवो भव, चुनाव मेहमान का स्‍वागत.

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  10. दो बार पढकर सोचा ! इन लोगों के बारे में टिप्पणी करने की इच्छा नहीं हो रही :)

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    1. @इन लोगों के बारे में टिप्पणी करने की इच्छा नहीं हो रही :)
      अब इससे भी ज़्यादा कुछ बचता है इनके बारे में ?

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  11. आपकी यह मौसमी रचना काबिले तारीफ है।..बधाई हो।

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    1. उनकी तरह रचना भी अब मौसमी हो गई है,
      वे रोज़ जो आने लगे ,तो समझो शामत आ गई !!

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  12. ज़बरदस्त बहुत सटीक रचना प्रस्तुत की है आपने

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  13. अच्‍छा लगा आपके ब्‍लॉग पर आकर....आपकी रचनाएं पढकर और आपकी भवनाओं से जुडकर....

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    1. आप डॉ. अरविन्द मिश्रजी से सलाह लें तो ज़्यादा कुछ कर पाएंगे .
      आपका आभार !

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  14. सालों बाद उनने , हमें गौर से पहचाना ,
    हम उन्हीं के मंदिर के भगवान होते हैं ..

    क्या बार है ... कुछ ऐसा ही हमारे नेता भी समझते हैं पर केवल वोट के लिए ... फिर भूल जाते है ....

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  15. संतोष जी...

    मेरी एक शिकायत पर गौर फरमायें। शिकायत यह है कि..
    आप सभी के कमेंट का प्रत्युत्तर दे रहे हैं सिर्फ एक रचना त्यागी जी को छोड़कर। क्षमा करें यह आपका व्यक्तिगत मामला है लेकिन धन्यवाद तो बनता ही है। मैं नहीं समझ पा रहा कि उनका क्या अपराध है!:)

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    1. आपकी शिकायत दूर कर दी गई है, मौक़ा-मुआयना कर सकते हैं :-)

      वैसे केवल औपचारिक टीप का औपचारिक जवाब देने से बचता हूँ , बकिया रचना जी से कोई एलर्जी नहीं है !

      आपका आभार इतनी सूक्ष्मता से बाँचने के लिए !

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  16. रोते, पीटते, मांगते कट जाती है ज़िन्दगी
    पर इन्हीं 2-4 दिन हम भी भगवान होते हैं

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  17. सारा खेल ही मौसमी है, तो धर्म और धार्मिकता भी ऐसी ही चलेगी न फिर ?

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    1. राजनीति मौसमी है,धर्म तो सनातन है !

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    2. आपके और हमारे लिए तो सनातन है संतोष जी - हमारे राजनीतिज्ञों की बात कर रही थी मैं ... पल में तोला , पल में माशा वाले लोगों की ...

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    3. बिलकुल दुरुस्त फ़रमाया शिल्पा जी !

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  18. सुन्दर, सटीक, सामयिक रचना।
    (हमारी पिछली टिप्पणी लगता है फिर से स्पैम के खड्डे में गिर गयी।)

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    1. ...शायद ऐसी ही टीप के इन्तेज़ार में वह खड्ड में थी,अब निकल आई है !
      आभार !

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  19. आपकी ही पंक्तियों से,

    हर तरफ से उठ रही , आज ये आवाज़,
    हमारी भी जिंदगी के अरमान होते हैं !

    .....यही वो मौसम है अपने -अपने अरमानों के साकार करने का !


    सब चुने
    सही चुने !

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  20. इत्ते से भी मान जाए तो काहे के घाघ?

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  21. भावों और शब्दों का उत्कृष्ट संयोजन बेहद गहन अभिव्यक्ति।

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