12 जुलाई 2014

मौसम

बारिश का इमकान नहीं है,
आदम अब इंसान नहीं है। 
पाथर दूब भले जम जाए,
मंदिर में भगवान नहीं है। 
चुप्पी साध रखी है उसने, 
शातिर है, नादान नहीं है। 
गुंडे अब अगुवाई करते,
खादी में ईमान नहीं है। 
संत विराजे हैं कुर्सी पर,
भक्त मगन हैं,ज्ञान नहीं है।

2 टिप्‍पणियां:

  1. संत विराजे हैं कुर्सी पर,
    भक्त मगन हैं,ज्ञान नहीं है।
    सही कहा आपने ,लोग अंधे हो केवल भक्ति में मग्न है

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  2. उम्दा और बेहतरीन प्रस्तुति के लिए आपको बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@जब भी सोचूँ अच्छा सोचूँ

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