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9 सितंबर 2011

मौत का एक दिन !

मौत का एक दिन मुअइयन है,नींद क्यूँ रात भर नहीं आती? 

ग़ालिब ने बहुत पहले हमें वह बात समझाने की कोशिश की थी जिसे शायद वह ख़ुद समझ नहीं पाए थे ! कई बार हम चाहकर भी अपने को इस बेचैनी से बचा नहीं पाते और पूरी की पूरी रात किसी डर,आशंका या चिंता की भेंट चढ़ जाती है.हम दिन में बहुत समझदार होते हैं पर रात आते-आते वह समझदारी न जाने कहाँ फुर्र हो जाती है ?

रात में बिस्तर जाने के समय जब हम बहुत थके और गाफ़िल-से होते हैं तो बहुत जल्द नींद के आगोश में चले जाते हैं ! यह स्थिति उत्तम और ज़रा दुर्लभ क़िस्म की होती है ! कई बार हम संगीत सुनते-सुनते या कोई पुस्तक पढ़ते-पढ़ते लुढ़क लेते हैं पर पूरी रात बेखटके सो जाते हैं.हमारा मोबाइल , ऐसा आधुनिक-यंत्र है जो हमारे लिए कई बार यंत्रणा बन जाता है इसलिए अकसर उसे स्विच-ऑफ कर देते हैं !हम पूरी तरह 'रेस्ट-मोड' में जाना पसंद करते हैं !

हमारी जिस प्रकार की जीवन-शैली बन गई है उसमें नींद का न आना सामान्य बात हो गई है.हम आपसी बातचीत में इस बात की हिमायत खूब करते हैं कि हमें बिंदास और बेफ़िक्र होके जीना चाहिए.पैसे के पीछे इतना न भागना चाहिए कि जिस 'जीवन-सुख' के लिए हम पैसा चाह रहे हैं, पैसा आने पर वही सुख हमसे कोसों दूर हो जाये !इस 'भौतिक-चिंतन' से भले ही आपको अपनी नींद में खलल न पड़े पर जाने-अनजाने प्राकृतिक या अप्राकृतिक रूप से हमारे जीवन पर जब कोई ख़तरा मंडराता दिखता है तो हम 'डॉक्टर' से 'रोगी' बन जाते हैं.यहीं से हमारे लिए रात एक दुस्वप्न बनने लग जाती है ! 

हम सब अच्छी तरह से जानते हैं कि एक दिन हम सबको अपना बोरिया-बिस्तर उठाना होगा पर शायद सबसे बड़ा आश्चर्य यही है कि जानते हुए भी हम हज़ारों साल का इंतजाम करने में लगे रहते हैं.पर यह हमारे लिए उस ईश्वर का वरदान भी है कि हमें इस बात की यथार्थता वास्तव में हो जाये तो हमारे लिए दो पल भी जीना मुश्किल हो जाये.आशावाद का संचार हममें लगातार बना रहता है और हम अपने नित्य-कर्मों में,पारिवारिक-दायित्वों में मशगूल रहते हैं !अगर हमें मौत  की यकीनी दिन-दहाड़े हो जाये तो क्या जीवन इतना सामान्य रह पायेगा ?

हमारी ज़िन्दगी का फलसफा एक शेर में यूँ है:

हँस सको जितना,खुलकर हँसा करो,
न जाने क़यामत किस द्वार  पर खड़ी हो !!




विशेष सन्दर्भ : दिल्ली में एक ही दिन बम-धमाका  और भूकंप की  तनिक छाया  में !