सूखा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
सूखा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

18 जुलाई 2012

भूले अपना देश !

सावन झाँके  दूर से,बेबस है इंसान  ।
कब तक सोखेगी धरा, धूप हुई हलकान ।।


पढ़-लिख काया  बदल ली,बदले नहीं विचार ।
कौआ  कोयल-भेष में,करता शिष्टाचार ।।


शब्द अर्थ को खो रहे,भटक रहे हैं छंद।
लिखते कुछ,होते अलग,ब्लॉगर-लेखक-वृन्द ।।


तुलसी इस संसार में ,वही बड़ा विद्वान।
खड़ी फ़सल  में आग दे,बोए  निज अभिमान ।।


लिपा-पुता चेहरा दिखे,भोला-सा इन्सान ।
जेबों में मक्कारियाँ ,कर देती हैरान ।।


सूरत धोखा दे रही,संबंधों में खोट ।
रिश्तों में चालाकियाँ ,देती गहरी चोट ।।


पाहुन सावन की तरह,भूले अपना देश ।
मेघ-डाकिया बाँटता ,नित झूठे सन्देश ।।