हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से |
मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ,नट नागर से ||
तेरी ही महिमा से जग का
होता है सञ्चालन,
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर
करते सबका पालन,
कर दो कृपा-दृष्टि ऐ भगवन !अभयस्वरुपी वर से |
हे प्रभु मुझको पार लगा दो ,इस जीवन के सागर से ||
सारे जग में खेल है तेरा
तू है कुशल मदारी,
खाली झोली भर दो मेरी
हे भोले-भंडारी,
मुक्ति दिला दो हे प्रलयंकर!इस शरीर-नश्वर से |
हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से ||
रचनाकाल:०८/०९/१९९०,फतेहपुर
मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ,नट नागर से ||
तेरी ही महिमा से जग काहोता है सञ्चालन,
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर
करते सबका पालन,
कर दो कृपा-दृष्टि ऐ भगवन !अभयस्वरुपी वर से |
हे प्रभु मुझको पार लगा दो ,इस जीवन के सागर से ||
सारे जग में खेल है तेरा
तू है कुशल मदारी,
खाली झोली भर दो मेरी
हे भोले-भंडारी,
मुक्ति दिला दो हे प्रलयंकर!इस शरीर-नश्वर से |
हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से ||
रचनाकाल:०८/०९/१९९०,फतेहपुर








