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11 अक्टूबर 2012

प्रार्थना !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से |
मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ,नट नागर से ||

तेरी ही महिमा से जग का
होता है सञ्चालन,
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर
करते सबका पालन,

कर दो कृपा-दृष्टि ऐ भगवन !अभयस्वरुपी वर से |
हे प्रभु मुझको पार लगा दो ,इस जीवन के सागर से || 

सारे जग में खेल है तेरा
तू है कुशल मदारी,
खाली झोली भर दो मेरी
हे भोले-भंडारी,

मुक्ति दिला दो हे प्रलयंकर!इस शरीर-नश्वर से |
हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से ||


रचनाकाल:०८/०९/१९९०,फतेहपुर
 

13 जुलाई 2012

वर्षा गीत !

वर्षा की रिमझिम बूंदों ने 
मन में नई मिठास भरी,
नए-नए पौधों से सजकर 
सारी धरती हुई हरी ||


सूरज की कठिन चुभन से
तन जब अग्नि समान हुआ,
मेघ-देव से जल-प्रसाद पा 
शीतल,शांत महान हुआ ||


झड़ी लगी जब वर्षा की 
लबालब्ब सब खेत हुए,
कृषकों के नाचे मन-मयूर 
मुदित सभी के हृदय हुए ||


वर्षा-देवी के स्वागत में
सूरज ने गरमी रोकी ,
पशु-पक्षी सारे चहक उठे
आई बहार भी फूलों की ||


हे वर्षा-देवी ! स्वागत-स्वागत 
सूखी धरती पर बार-बार,
तुम आईं ,जीवन आया 
संग में आईं खुशियाँ हज़ार ||




विशेष : रचनाकाल --१८/०६/१९९० 
स्थान: दल्ली-राजहरा (छत्तीसगढ़)

1 नवंबर 2011

बदलते हुए !

इन्हीं  आँखों से मैंने, जाम को ज़हर होते देखा,
ढल गयी जो शाम उसे सहर होते देखा !१!


ज़िन्दगी के मायने ,अब बदल गए,
अपनों में परायों का, असर होते देखा !२!


खुशबू-ओ-मोहब्बत से ,भरे हुए चमन में,
घुसते हुए लोगों का ,क़हर होते देखा !३!


जिन्होंने बनाए थे ,अपने खूं से  घरौंदे,
उन्हीं को आज हमने , खंडहर होते देखा !४!


कहाँ तक बचेंगे ,बदलती रिवायत से,
छिपाते जिसे रहे ,नज़र होते देखा !५!




*आख़िरी शेर को छोड़कर सब पुरनिया  हैं !

फतेहपुर,२५/०३/१९९० 








3 अक्टूबर 2011

कुछ मन से ,कुछ बेमन से !

कई दिनों से मन उचाट-सा है.विषय बहुत हैं लिखने को पर लगता है जो 'तड़प' है उसमें कहीं कुछ कमी आ गयी है.ऐसा क्यों होता है अब? पहले पढने से मन विरत हुआ और अब लिखने से ! यह निरा काहिलपना नहीं तो क्या है ? किताबें लेना ,उन्हें निहारना और खरीदना मुझे अब भी अच्छा लगता है,पर उन किताबों में भी उसी तरह धूल ठहरी हुई है जैसे मेरे दिमाग में !

फिर भी ,प्रवीण पाण्डेय की यह पोस्ट   पढ़कर करीब दस साल बाद दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी गया और  पुनः सदस्य बना.अज्ञेयजी की आत्मकथा 'शेखर एक जीवनी' पढने की इच्छा बहुत दिनों से थी,पर वह उस समय वहाँ भी न मिली.अचानक हिंदी के प्रसिद्द आलोचक राम विलास शर्मा की आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' दिखाई दी और मैंने उसे तुरत लपक लिया .यह तीन खण्डों में है जिसका शुरूआती भाग अभी पढ़ रहा हूँ.शर्माजी हमारे बैसवारा के ही रहने वाले थे ,इसलिए इसमें अतिरिक्त दिलचस्पी हुई.वास्तव में बेहद रोचक और देसज-शब्दों की प्रचुरता लिए हुए यह पुस्तक बहुत रुचिकर लग रही है .इसके बारे में फिर कभी विस्तार से !


इस बीच मेरे परम सुह्रद डॉ.अरविन्द मिश्र  कई बार मुझे नई पोस्ट के लिए प्रेरित कर रहे थे,मुझे अपना लेखकीय-धर्म याद दिला रहे थे,सो अपने मन को सान पर चढ़ाकर पैना करने की कोशिश में जुट गया ! पुरानी डायरियों के पन्ने उलटे,तो कई रचनाएँ  आज मुझे बड़ी हलकी लगीं,फिर भी झाड़-पोंछकर जो बच रहा ,वह आपके  रूबरू है !


                                          आ  जाओ तुम 

साँस आखिरी,आस आख़िरी,
आ  जाओ तुम ,सलाम आख़िरी !


ये निगाहें,तुम्हें ही ताकतीं,
स्याह ज़िन्दगी में,रोशनी -सी झांकती,
थक गया हूँ मैं,इंतज़ार में,
पी रहा हूँ ये, जाम आख़िरी !!

मिल नहीं सके, तो ना सही,
तमन्ना भी अब,और ना रही,
तन की नहीं,प्यास नज़र की,
बुझा जाओ तुम,है काम आख़िरी !!

ज़ुदा जो रहे ,अब तलक मुझसे,
कुछ भी नहीं  हैं,शिकवे-गिले तुमसे,
कर रहा हूँ अर्ज़,तसलीम तो करो,
मान जाओ तुम ,है  कलाम  आख़िरी  !!

साँस  आखिरी ,आस आख़िरी,
आ जाओ तुम ,सलाम आख़िरी !!


रचना काल : १०/१०/१९८९  ,फतेहपुर 


अगर यह बेमतलब लगे तो हमारी पसंद की यह ग़ज़ल तो सुन ही लो ,मुन्नी बेग़म की दिलकश आवाज़ में !







24 जून 2011

प्रार्थना


हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से,
साभार :गूगल प्रभु
मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ नट-नागर से !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो इस जीवन के सागर से !!

तेरी ही महिमा से जग का,होता है संचालन,
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर करते सबका पालन ,
कर दो कृपा-दृष्टि ऐ भगवन ,अभय-स्वरूपी वर से !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से !!

 सारे जग में खेल है तेरा,तू है कुशल मदारी,
खाली झोली भर दो सबकी ,हे भोले-भंडारी.
मुक्ति दिला दो हे प्रलयंकर,इस शरीर- नश्वर से !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से !!




विशेष:अकसर अकेले में गुनगुनाया करता हूँ !
रचना काल:०८/०९/१९९०,फतेहपुर

23 जनवरी 2011

जीवनसाथी

      आँखों में समाई हो,सोचों में समाई हो,
      घनघोर घटा बनकर,मेरे मन में छाई हो !

         जब से तुम ज़ुदा हुईं ,ये जीवन सूख गया,
        अब तुम ही याद मेरी,तुम ही तनहाई हो !

        जिस तरफ़,  जहाँ तक भी , ये नज़रें जाती हैं,
          ज़र्रे में, दरिया में ,हरसूं दिखलाई हो !

          तेरे साँसों की खुशबू,अब तक है ताज़ादम,
          हर पल यह लगता है,जैसे  तुम  आई हो !

          नज़रों के पास नहीं , पर साथ मेरे हरदम ,
          ग़ज़ल भी  हो मेरी, तुम मेरी रुबाई हो !


विशेष: पत्नी-वियोग  में,रचनाकाल--२६/०६/१९९२ (संशोधन के साथ)
दूलापुर (रायबरेली )

1 दिसंबर 2010

ग़ज़ल

हमको अपनी ही ख़बर, मिलती नहीं है आजकल,
इस गुलिस्ताँ में कली,  खिलती नहीं है आजकल . (१)



मन तड़पता है मेरा, दीदार करने को ,
तेरी थोड़ी भी झलक, मिलती नहीं है आजकल.(२)


राह ये कटती  नहीं , डस रहीं तनहाइयाँ,
 ख्वाब में भी वो, तडपा  रही है आजकल.(३)


मेरे हमदम तू न जाने, क्या है मेरी दास्तां,
हर ख़ुशी से ग़म की बू  आ रही है आजकल.(४)


आ भी जाओ अब मेरे महबूब ऐ "चंचल",
तेरे बिना ये ज़िन्दगी ,खाली रही है आजकल.(५)




विशेष :१९९४ की यह रचना ,पहली चार लाइनें गाँव(दूलापुर)
           व बाद की दिल्ली में रहते हुए !

4 अक्टूबर 2010

ग़ज़ल

हर   जगह  क्यूँ  आप  नज़र  आते  हैं ?
ख्वाबों में भी  साफ़ नजर आते हैं!

दिल की गहराइयों से,तुम्हें चाहा हमने,
फिर भी अजनबी से आप गुजर जाते हैं.

नज़र-ए-इनायत तो कभी हम पे' करो,
सुना है,मुजलिमों पे आप रहम खाते हैं.

ये प्यार का पैग़ाम,शायद पहुँच सके,
इस गली से यूँ,चुपचाप निकल जाते हैं.

हाल-ए-दिल मेरा ,कोई सुना दे "चंचल",
मैं हूँ तनहा,अकेले भी आप जिए जाते हैं!

रचना काल: २१/०६/१९९०
दल्ली-राजहरा (छत्तीसगढ़)

2 अक्टूबर 2010

गाँधी , फिर इस देश में आजा !

गाँधी, फिर इस देश में आजा. 
सत्य,अहिंसा और प्रेम का ,
      फिर से भारत में बिगुल बजा जा !
        गाँधी,फिर इस देश में आजा !

जिस भारत में तूने अपने
       रक्त से शांति-पौध को सींचा,
हिन्दू,मुस्लिम के हृदयों में,
      सद्भाव,प्रेम की रेखा खींचा,

सर्व-धर्म समभाव जगाकर ,
      फिर से प्यार के दीप जला जा !
      गाँधी, फिर इस देश में आ जा !

मानव मूल्यहीन  हो रहे,
         आज तुम्हारे देश में,
 घृणा भर रही है हृदयों में,
         कुछ हैं पशुवत वेश में ,

ऐ मोहन, इस देश में आकर ,
     फिर से 'रघुपतिराघव' गा जा !
     गाँधी, फिर इस देश में आ जा !


विशेष : रचना काल
०२/१०/१९९०  दूलापुर,रायबरेली   

17 मई 2010

प्रदूषण और हम !


कैसा सुन्दर घर-आँगन था,गली-मोहल्ले सारे,
ठंडी-ठंडी हवा सुहानी ,प्यार से हमें दुलारे।

फूल महकते वन-उपवन में,अपनी बाँह पसारे
पशु -पक्षी
चहके फिरते,बुझते मन के अंगारे।


पर्यावरण-प्रदूषण जबसे हुआ है इस दुनिया में,
घुट-घुट कर सब साँस ले रहे, अपनी-अपनी कुटिया में।


घर-बाहर सब धुआँ भर गया , सड़कों में,गलियों में,
फूल-से नाज़ुक बच्चे बदले मुरझाई कलियों में।


वन-जंगल सब पेड़ कट रहे ,वीरानी सी छाई,
फ़सल उग रही नित भवनों की ,प्रकृति मौत को नियराई।


अब भी वक़्त संभल जाएँ हम , पर्यावरण शुद्ध कर लें,
ज़हरीले वायु-प्रदूषण से दिल्ली-प्रदेश मुक्त कर लें।।

विशेष-दिल्ली नगर निगम के शिक्षा -विभाग द्वारा पुरस्कृत (१९९६)
रचना काल-१२-१२-१९९६

19 अप्रैल 2010

तुम हो न सके मेरे !


जिनकी हमें तलाश थी,वो इस तरह मिले,
उनसे हुआ जो सामना ,हसरत से ना मिले।

ख़्वाब-ओ-ख़याल क्या थे ,मिलने से उनके पहले,
फूलों को थे तलाशते ,काँटे मुझे मिले।


कल तक रहे जो हमदम, मेरे जनम-जनम के,
जनम-जनम की बात क्या,दो पल भी ना मिले।

इस ज़िन्दगी में क्या बचा,तनहाइयों के सिवा,
फिज़ा है उनके बाग़ में, मुझे उजड़ा चमन मिले।


मुझको सियाह रात देने वाले ''चंचल",
हर मोड़ पर तुझे,आफ़ताब ही मिले !

फतेहपुर,१५/०१/१९९०