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1 मार्च 2010

होरी औ कम्पूटर बाबा !

होरी कै सबका मुबारकबाद !होरी तो हर साल की तरा आई है,मुदा अबकी हम स्वाचा कि होरी अपने कम्पूटर बाबा के साथै मनाइ । एकु दिन पहिलेहेते हम फेसबुक,ट्विटर और ब्लागवा मा धंसि गैन। जहाँ-तहां हम भकुअन कि तरा घूमित रहेन मुदा हमका कउनो रसिया न मिली जहिते हम फागुन की आंड़ मा आपन काम बना लेई ! सही बताइ,यहि कम्पूटरी दुनिया मा हम एकदम बौझक हन ।


अपने बचपन मा ,जब हम गाँव मा रहित रहेन तब सही मा, बड़ी मजा आवति रहै। धुलेंडी के दिन आपनि बानर -सेना तय्यार कइके खूब हंगामा मचाइत रहेन। बादि मा जब घर-घर फागु जाति रहै तो वहिमा बड़ा आनंद आवत रहै। कतो गुर-भंगा मिलै तो कतो कुसुली (गुझिया) ,कतो-कतो ऊंख का रसु औ पानौ मिलत रहैं.फाग गावै मा बड़ी मजा आवति रहै। जब फागु ना आवै तो सबके सुर मा सुर मिला के यह बताइत रहेन कि हमहुक आवथि ।

जब ते हम लिखि -पढ़ि के तय्यार भैन तो लागत कि सबते बड़े भकुआ हम ही हन ।अब ना तो वी मनई रहे,ना भौजाई और ना वी तेउहार । बस बचे हैं तो हमारि जइसि कुछु भकुआ जिनके लगे कउनो काम नहिन सिवाय कम्पूटर बाबा मा भड़ास निकारै के !

बुरा न मानो होरी हैं.....





28 फ़रवरी 2010

होली या ठिठोली !

हम तो यारों रंग ते खेली,वी ताने बन्दूक।
हमरी ते तो पानी निकरै,औ उनकी ते हूक। ।

हमरे रंग मिलावटी ,उनके असली लाल।
बच्चे भी अब डर रहे, देख अबीर-गुलाल । ।

होली आते ही हुए ,वो तो मालामाल।
नकली मावा भले ही ,सबको करे हलाल। ।

गुझिया,खुरमा खो गए बचपन के पकवान।
फागुन में ही बुझ गए ,बुढऊ के अरमान। ।

ना कान्हा मथुरा मिलैं,नहीं अवध रघुबीर।
फाग सुने से जाए ना ,हमरे मन की पीर। ।

21 जनवरी 2010

अब तो फागुन आयो रे !

पिया मिलन का दर्द सताए,
अपना कोई मिलने आए,
खड़ी द्वार पर जिसे निहारूँ ,
अब तो फागुन आयो रे !

बासंती मौसम अब आया ,
पतझड़ नयी कोंपलें लाया ,
मैं प्रियतम पर वारी जाऊँ,
अब तो फागुन आयो रे !

सरसों फूल रही खेतों में,
कोयल कूके है पेड़ों में,
लगता है मैं भी कुछ गाऊँ ,
अब तो फागुन आयो रे !

चारों तरफ बयार नयी है,
वसुंधरा श्रृंगारमयी है,
मदमाती मैं किसे पुकारूँ,
अब तो फागुन आयो रे !

प्रकृति हो गई रंग-रंगीली,
भर पिचकारी पीली-नीली,
मैं साजन के रंग हो जाऊँ,
अब तो फागुन आयो रे !

ढोल-मंजीरे बजते कैसे,
बिछुड़े हुए मिले हों जैसे,
आओ प्रिय ! या मैं उड़ आऊँ,
अब तो फागुन आयो रे !



जनवरी १९९८ की एक सर्द सुबह - दिल्ली