14 सितंबर 2026

ग़ज़ल

 वह सवालों से परे है

देवता बनता फिरे है।

रंग उस पर फिट सभी हैं,

रूप ऐसा वह धरे है!

देस की पतवार साधे,

वह अकेला ही चले है।

गर्क बेड़ा हो भले ही,

हृदय में ज्वाला भरे है!

लिख रहा है खूब बेहतर,

शहद बातों से झरे है।

यह किताबी आदमी ही,

सच बताने से डरे है!

आदमी ख़ुद बन न पाया,

साँप की छाया तले है।

ज़ाहिलों का है समागम,

बुद्धि ख़ुद की ही हरे है!


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