20 अगस्त 2026

ग़ज़ल

 धर्म के धंधे पुराने हो गए,

धीरे-धीरे वो सयाने हो गए!


रक्त-रंजित जीभ लेकर घूमते,

बद-सियासत के ठिकाने हो गए।


दिन-दहाड़े लूटकर मंदिर चले,

रघुबीर भी उनके निशाने हो गए।


रात-दिन वो झूठ बोते,बाँटते,

सच सुने सच में, ज़माने हो गए।


इंतहा की आख़िरी शब आ गई,

क़ातिलों के दिन सुहाने हो गए !


• संतोष त्रिवेदी 

2 अगस्त 2026

माफ़ी

 जड़ से सबको साफ़ किया

फिर कहते हैं माफ़ किया !


लाठी-गोली बच्चों को दी

कहते हैं इंसाफ़ किया।


डायरबनकर हमला बोला 

कायर बनकर माफ़ किया।


जो भी सच की हाँक लगाता 

उसको वतन-ख़िलाफ़ किया।


फ़स्ल ज़हर की पकी खड़ी है 

काटो निकलो माफ़ किया !