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19 जुलाई 2016

खत जो लिखे नहीं गए !

...और उस दिन पचीस साल बाद जब तुम अचानक मुझसे मिलीं,हम एक-दूसरे को  पहचान ही नहीं पाए।मैं शहर से कुछ रोज़ की छुट्टी लेकर गाँव जा रहा था ।कस्बे के टेम्पो-स्टैंड में जब मैंने टेम्पो पकड़ा ,दूर-दूर तक जहन में तुम्हारा ख्याल भी न था।तुम्हारे ठीक सामने रूखे और सफ़ेद बालों में जो प्रौढ़ व्यक्ति बार-बार बाहर की ओर झाँक रहा था,तुम्हारा अपना,वह मैं ही तो था ! तुम दो बच्चों के साथ  बैठी हुई थीं और अपने अतीत से उतना ही अनजान ,जितना कि मैं।हम तुम बेहद करीब बैठे थे पर एकदम अजनबियों की तरह !कितना-कुछ बदल गया था इन बीते वर्षों में कभी तुम्हारे आस-पास होने पर हवा भी तुम्हारे होने की चुगली कर देती थी पर उस वक्त ऐसा कुछ नहीं हुआ।हमारी साँसें भी शायद ठण्डी हो गई थीं बिलकुल हमारी तरह।

हम टेम्पो में करीब एक घंटे तक आमने-सामने बैठे रहे और मैं आदतन चुप ही रहा।हालाँकि तुम्हें पता है कि मैं कितना बातूनी हूँ पर न जाने उस वक्त किस ख़ामोशी ने मुझे घेर लिया था।हम उस छोटे से सफ़र में थोड़ी देर के लिए एक साथ रहे।कभी तुमको लेकर मैंने सोचा था कि पूरी ज़िंदगी का सफ़र तय करेंगे पर वैसा होने की कभी गुंजाइश भी न बनी।उस रोज छोटा सा ही सफ़र सही,हमने साथ तय किया तो थोड़े वक्त के लिए हमसफर बन गए।पर अफ़सोस, हमें यह बात तुम्हारे चले जाने के बाद पता चली।टेम्पो से उतरते ही हमारे स्कूल का साथी रामू वहीँ मिल गया और उसी ने तुम्हारी शिनाख्त की । उसने इतने अरसे बाद हम दोनों के साथ होने पर मुबारकवाद दी तो मैं चौंक गया।पर अब कुछ नहीं हो सकता था।तुम तब तक वहाँ से निकल चुकी थीं।ऐसे दिन भी कभी आएँगे,सोचा न था।उस समय यदि मालूम हो जाता तो तुम्हारा हाल पूछता।बहरहाल,तुम्हारी पहचान पाने के पल से ही मेरे होशो-हवास गुम हैं पर तुम तो मेरे होने को लेकर ही अनजान होगी।क्या पता तुमने मुझे पहचान लिया हो या नहीं भी ?

तुम्हारे जाने के बाद से मैं यही सोच रहा हूँ कि कितने जाने-पहचाने हम इतने अनजाने कैसे हो गए ? क्या ये केवल समय का अंतर भर था या हम दोनों बिलकुल बदल गए ?जब मैं  तुम्हारे नज़दीक था,तब अपनी बात न कह सका था और अब जब तुम्हें मेरे होने न होने का एहसास भी नहीं रहा ,अपने बारे में कैसे कह दूँ ? क्या बदलाव ऐसे भी होता है ?तुम्हारा कोई जवाब उस वक्त भी नहीं मिला था,जब हम साथ हुआ करते थे ,क्या आज भी मुझे इंतज़ार करना होगा ? यह शायद आखिर से पहले वाला खत है।मिले तो भी जवाब न देना।कुछ बातें सवालों में रहें तो ही बेहतर।


6 मार्च 2013

खत,जो कभी पहुँच नहीं पाए !(३)

स्कूल में हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम में तुमने जब लोकगीत गाया था,मेरी निगाह शब्दों से कहीं अधिक तुम्हारे हाव-भाव पर थी.गाते वक्त तुम जब भी अपना हाथ ऊपर उठाती तुम्हारा दुपट्टा सरकने लगता.दुपट्टे के सरकने का तुम पर पता नहीं क्या असर होता रहा हो,पर मेरी जान ज़रूर सरक जाती.तुम्हारे दुपट्टे के लहराने से मैं रोमांचित तो होता था पर डर लगता था कि कहीं वह ज़मीन पर आ गया तो दोस्त हँसेंगे.बहरहाल ,उस दुपट्टे ने भी मेरी तरह तुम्हारा खयाल रखा और अपनी सीमा नहीं लांघी.

गाने का मुझे भी शौक था और इसलिए स्कूल की अन्त्याक्षरी टीम में शामिल था.मैं बहुत सुन्दर नहीं गाता था,वह भी तब जबकि सामने तुम होती.साइकिल चलाते हुए मैंने कई फ़िल्मी और मौलिक गीत तुम्हें समर्पित किये थे पर जब सबके सामने गाना पड़ता तो सहज नहीं रह पाता था.ऐसी स्थिति में गाने से पहले मैं तुम्हारी लोकेशन देख लेता और गाते समय उधर गलती से भी न देखता.

मुझे तब बड़ी पीड़ा पहुंची थी ,जब तीन साल एक ही कक्षा में रहने के बाद हमारे सेक्शन बदल गए थे .तुम्हें देखने के लिए मुझे अब ज़्यादा परिश्रम करना पड़ता.ऐसे में मुझे अंतरावकाश का बेसब्री से इंतज़ार रहता.थोड़ी-सी देर के इंटरवल में अन्य दोस्तों की तरह मैं चांट,पट्टी खाने या गुल्ली-डंडा खेलने से बचता था.तुम मेरी यह बेबसी समझती थी कि नहीं,नहीं मालूम.

तुम जब भी मेरे बगल से गुजरती,मुझे ऑक्सीजन मिल जाती.आस-पास ऐसी बयार बहने लगती,जैसे बहार आ गई हो.भले ही हम एक-दूसरे से न बोलते,मगर हमारी आँखें चंद पल में सब कुछ बयाँ  कर देतीं.मुझे हमेशा से लगता कि तुम मेरे लिए ही हो,हालाँकि इसके लिए मैंने कभी दावा नहीं पेश किया.मैं तुमसे दूर रहकर भी हमेशा तुम्हारे पास रहा हूँ.

क्या तुमने कभी मुझको भी अपने आस-पास महसूस किया है,हवाओं में,एहसास में ?

1 मार्च 2013

खत,जो कभी पहुँच नहीं पाए !(२)

जब भी कक्षा में मास्टर जी नहीं होते,मुझे अच्छा नहीं लगता था.ऐसा पढ़ाई न होने के कारण बिलकुल नहीं था.दरअसल ,खाली कक्षा होने पर मेरे साथी मुझे घेरे रहते और मैं तुम पर अपना ध्यान फोकस नहीं कर पाता .उस बीच  मैं किसी तरह से तुम्हें देखने की कोशिश करता तो साथी चिढ़ाने लगते और मैं उन्हें समझाने का असफल प्रयास करता.तुम तब भी किताब के पन्नों में गुम रहती और इस बात से बिलकुल अनजान कि कोई तुम में गुम है.मास्टरजी के कक्षा में आने पर मेरी जान में जान आती .इधर वो पढाना शुरू करते और मैं तुम्हें एकटक देखने लग जाता.

तुम्हें देखते हुए मुझे यह भी याद नहीं रहता कि किसी और की नज़र मुझ पर है.बाद में पता चला कि वह तुम्हारी सहेली थी जो मेरी ऐसी गतिविधि पर नज़र रखती थी,जिसकी वास्तव में मुझ पर नज़र थी.मगर तुम्हारे हुस्न के समंदर में मैं इस क़दर डूब चुका था कि मुझे नदी-नालों और किनारों की परवाह नहीं थी.दिन-भर में एक-दो बार भी मेरी नज़रें तुमसे मिल जाती तो मेरा दिन सुफल हो जाता था.मेरी खुशी तब और बढ़ जाती,जब हमारी नज़रें मिलने पर तुम्हारे चेहरे की हँसी पहले से अधिक चौड़ी हो जाती.

मेरा घर भी तुम्हारे घर से बहुत दूर नहीं था,पर अमूमन मैं उधर जाता नहीं था.मेरे पिताजी बहुत सख्त मिजाज थे,इसलिए किसी प्रकार के जोखिम लेने की हिम्मत नहीं थी मेरी .कभी-कभार यदि उधर की तरफ़ का कोई काम निकल आता तो कोशिश करके मैं ही जाता.जानबूझकर मैं तुम्हारे घर के सामने से साइकिल पर निकलता कि शायद तुम दरवाजे पर मिल जाओ,पर अकसर मैं मुँह की खाता और तुम आस-पास दिखाई भी नहीं देती.एक बार तो इसी देखा-देखी में मेरी साइकिल एक खूंटे से टकरा गई और मैं मुँह के बल गिरा.गनीमत रही कि तुमने उस वक्त मुझे नहीं देखा था.उस समय ज़मीन से उठने की मेरी फुर्ती देखने लायक थी.


कक्षा में मेरे लिए वे क्षण सबसे रोमांचित करने वाले थे,जब तुम कभी मेरे पास से गुजरती और हौले से मेरे सिर पर धप्प से एक धौल जमा देती.मुझे पक्का पता था कि ऐसा तुम तभी करती थी जब मेरे आस-पास दोस्तों का गैंग नहीं होता था.हालाँकि तुम्हें धौल ज़माने का साहस मुझ में कभी नहीं आया .तुमसे करीब होने की यही सबसे बड़ी और इकलौती उपलब्धि रही.तुम्हारे सांवले-सलोने रंग ने मुझ पर ऐसा जादू किया कि बाद के वर्षों में मेरे जेहन में यही शेर कौंधता रहता ,
'जब भी देखता हूँ कोई सांवली-सी सूरत,तुम्हारा ही अक्स ,उसमें नज़र आता है.'

सामान्यतः तुम मुझसे नज़रें मिलाने से बचती थीं.एक-दो बार ऐसा भी हुआ कि तुम अपनी सहेलियों के साथ जिस जगह से गुजरती,मैं अपने दोस्तों के साथ खड़ा होता.उस वक्त तुम्हारी नज़रें ज़मीन पर होतीं और मैं सोचता कि तुम नाराज़ हो या तुम्हारी अदा है.इस बात पर मैं दोस्तों को एक शेर भी सुनाता था;
'देखा जब भी आपको,नज़रें झुकी मिलीं,जाने खफ़ा हैं मुझसे ,या फ़िर अदा है आपकी '

तुमने मुझे अपना प्रेमी बनाया था या एक नाकाम  शायर ?

27 फ़रवरी 2013

खत,जो कभी पहुँच नहीं पाए !(१)

स्कूल के दिनों में ,जब मैंने एक पर्ची पर लिखकर तुम्हारा नाम पूछा था तो तुमने उस पर झट से अपना नाम लिखकर उसी कागज का गोला बनाकर मेरी ओर फेंका था.तुमने मेरा भी नाम जानना चाहा था,यह जानकर ही मैं ख्यालों में खो गया था.जब मुझे होश आया तब तक मास्टरजी कक्षा में आ चुके थे और इस तरह हमारा पहला संपर्क अधूरा रह गया था.


जब भी मास्टरजी श्याम-पट में कुछ लिखते,मैं तुम्हारे बालों को निहारता .तुम कनखियों से कभी-कभी मुझे देखती तो मैं बल्लियों उछल जाता.तुम्हारे हाथ की लिखावट आकर्षक थी और मेरी बहुत साधारण. मास्टरजी जब इमला बोलते तो हम दोनों के बराबर अंक आते.इस बहाने कक्षा में हम दोनों ही खड़े होते और साथी इस पर भी कहानियां बनाते.मुझे तो खुशी इस बात की होती कि किसी बहाने मेरा नाम तुम्हारे साथ जुड़ा तो !


एक बार किसी लड़के ने कुछ बच्चों की कॉपियों में तुम्हारा और मेरा नाम एक साथ लिख दिया था.बात धीरे-धीरे मास्टरजी तक पहुंची और इसके लिए मुझे ही दोषी बनाया गया.मैंने पहली बार तुम्हारे नाम के दो डंडे अपने हाथ में खाए थे .शुरू में तुम्हें भी लगा था कि शायद मैंने कुछ किया हो पर बाद में उस लड़के के पकड़े जाने पर वह बात खत्म हो गई थी .सच में,मुझे मार का कोई रंज न था,बस मुझे तुम्हारी रुसवाई नागवार लगी थी.


मैंने तुमसे कभी सीधी बात नहीं की थी पर जिस दिन तुम स्कूल नहीं आतीं थीं ,मेरा मूड खराब रहता,कुछ भी नहीं अच्छा लगता.मैं नहीं जानता कि मेरे स्कूल न आने पर तुम्हें कभी ऐसा लगा हो ?मैं किसी न किसी बहाने तुम्हारी खैर-खबर ज़रूर ले लेता था.


स्कूल की घंटी बजने पर सभी बच्चे खुश होते पर मैं तुमसे बिछड़ने को लेकर अकसर उदास हो जाता.मुझे याद नहीं आता ,जब तुम्हें मैंने उदास देखा हो.तुम्हारा चेहरा हर समय खिलखिलाता रहता और मुझे लगता कि यह सब तुम मेरे लिए करती हो.

क्या कभी तुमको भी मुझसे अलग होने का अहसास हुआ था ?