बलात्कार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बलात्कार लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

7 जनवरी 2013

दामिनी का अपनों के नाम सन्देश !



मेरे प्यारे भाई बहनों

मैं यहाँ आकर भी जीवित हूँ,जैसी मेरी इच्छा थी ।अब आप लोग भी अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त हो गए होंगे।मैं आप सबको अपने प्रति बे-इन्तहा प्यार दिखाने के लिए आभार व्यक्त करती हूँ।गाँव से आई एक अकेली लड़की को पूरी दुनिया और देश का जो प्यार मिला, वह हमारे जीने से ज़्यादा महत्वपूर्ण है।मेरे मन में अब किसी के प्रति कोई विद्वेष या घृणा-भाव नहीं है।मेरे नश्वर शरीर का मरना यदि किसी मरते हुए समाज को जिंदा करने में सहायक है तो,ऐसी मौत के लिए मुझे फख्र है।जिन्होंने मेरे शरीर को नोचा-खसोटा,उनके लिए भी मेरे मन में सहानुभूति है।वे जब तक जियेंगे,हर पल मरेंगे ।हर क्षण वो मेरी आँखों की चमक महसूस करेंगे।वे मुझे भूल न सकें इसके लिए मैं सूरज की हर किरण,हवा की हर दस्तक के साथ,उनके आस-पास ही रहूँगी,झकझोरती रहूँगी ।

मुझे उन सबके परिवारों की भी बड़ी चिंता है।उन सबकी माँ-बहन-बेटियाँ कैसे दूसरों से नज़रें मिलाती होंगी ? मैं जानती हूँ कि अभी हमारी बहनों के आँखों में इतना पानी तो बचा होगा कि उसे वे उन अपनों पर उलीच सकें,जिनके आँखों की कोरें बिलकुल सूख चुकी हैं।मुझे अपने माँ-बाप के अलावा आप सबसे आंसुओं का इतना सैलाब मिला है कि मुझे नई ज़िंदगी मिल गई है।इसलिए आप सब मेरे न रहने का शोक न मनाएं वरन अब सोते-से जग जाएँ।मेरे अकेले के जीने से कहीं ज़्यादा ज़रूरी है कि मेरी बाकी बहनें चैन से रहें।शारीरिक रूप से तो मैं एक बार ही मरी हूँ,पर मैं चाहती हूँ कि उन्हें रोज़-रोज़ मानसिक तौर पर न मरना पड़े।

मेरे साथ जो हुआ,इसकी मुझे कोई शिकायत नहीं है।इसी बहाने कई बातें साफ़ हो गईं।जिस व्यवस्था में रहते हुए हम डरते रहे,मरते रहे,वह स्वयं डरी हुई और बड़ी कमज़ोर निकली।आप लोगों ने जिस व्यवस्था को बनाये रखकर उससे अपनी रक्षा का भ्रम पाल लिया था,वह चूर-चूर हो गया।मैंने देखा कि मुझसे हमदर्दी जताने आए लोगों पर यही व्यवस्था कहर बनकर टूट पड़ी।इसके लिए उसके भंडार-गृह से आँसू गैस के गोले और लाठियाँ तुरंत बाहर निकल आईं,जबकि आतताइयों के लिए इसी व्यवस्था को महीनों,सालों सोचना पड़ता है।मेरे साथ जो हुआ ,उसके प्रतिकार को तो यह सरकार तत्पर नहीं दिखी,पर हाँ,मेरी ओर आने वाले सभी रास्ते बंद कर दिए गए।आप सबने दिखा दिया कि डरी हुई व्यवस्था एक जागे हुए समाज को कभी डरा नहीं सकती।

मैं तो एक प्रतीक मात्र थी।मुझे तो इस भौतिक शरीर को एक न एक दिन त्यागना ही था,पर इस व्यवस्था के द्वारा मेरा कत्ल किया जाना बहुत कुछ उघाड़ गया है।उस दिन किसी दामिनी के साथ नहीं,इस व्यवस्था के साथ बलात्कार हुआ था और लगातार हो रहा है।मैं गौरवान्वित हूँ कि इस बात को सबके सामने लाने का जरिया मैं बनी।कुछ लोग यह कह रहे हैं कि दामिनी मर गई है पर सच्चाई तो यह है कि उस दिन पूरे समाज की मौत हुई थी,जिसे एक कांधा भी नसीब नहीं हुआ।दामिनी न तो पहले डरी और न बाद में।हाँ,मैंने लाठी-गोलियों से लैस इस व्यवस्था को थर-थर काँपते ज़रूर देखा है।मुझे आप सबके निश्छल प्रेम पर पूरा भरोसा है और यह भी कि इस मरे हुए समाज में प्राण फूंकने का काम आप लोग ही कर सकते हैं।अब जब भी किसी बहन-बेटी के साथ कुछ गलत होता दिखे तो मुझे याद कर लेना ।यह दामिनी हमेशा आपके दिलों में यूँ ही धधकती और समाज को झिंझोड़ती रहेगी ।


हमारी ओर से ....

वह ज्योति थी
अँधेरे से इसलिए लड़ती रही
आखिर तक ज्वाल बन जलती रही,
वह है सभी ज़िन्दा शरीरों में
और हैवानों को जला देगी,
राख उसकी हड्डियों की
नरपिशाचों को गला देगी !


23 दिसंबर 2012

चलो दिल्ली !


 
 
चलो दिल्ली ,चलो जनपथ, जहाँ हुक्काम बहरे हैं
हवाओं में,फिजाओं में ,जहाँ संगीन पहरे हैं.
चलाओ गोलियाँ ! छलनी हमारी छातियाँ हो जांय ,
ये आतिश बुझ नहीं सकती, हमारे ज़ख्म गहरे हैं.

तुम्हारे चैन की अब, आखिरी शब आ गई  ,
हमारा आज बिगड़ा है ,मगर सपने सुनहरे हैं.

बढ़े क़दमों ! नहीं रुकना ,बदल जायेगा मौसम ये,
नया सूरज उघाड़ेगा ,अँधेरे में जो चेहरे हैं.

 

21 दिसंबर 2012

हम मनुष्य हैं अभी !


शुक्र है अभी
कच्चा नहीं निगलते हम मानव-शरीर
मसलते हैं मांसल देह
खरोंचते हैं नाखूनों से
चबाते नहीं हड्डियाँ
पीते नहीं रक्त
भागकर छुप जाते हैं,
इस पहचान से
हम
मनुष्य हैं अभी  !
प्रलय का दिन
निश्चित नहीं है
हम उसे लाते हैं मन-मुताबिक
परमात्मा से नहीं डरते
हमसे  काँपती है मानवता
अपने पंजे फैला लिए हैं हमने ,
शुक्र है अभी
खुला आसमान बचा है
धरती भी नहीं फटी
सूरज चुआ नहीं अपने केन्द्र से
और भूमि-अभिलेखों में
हम मनुष्य हैं अभी !


देवेन्द्र पाण्डेय जी की कविता से प्रेरित होकर

19 दिसंबर 2012

अराजकता का जिम्मेदार कौन ?


 
जब से दिल्ली में चलती बस में बलात्कार की वारदात हुई है,संसद से लेकर सड़क पर खूब उबाल दिख रहा है। सड़क पर तो आम आदमी इस तरह के वाकयों के बार-बार होने से परेशान होकर निकल पड़ा और संसद में हमारे प्रतिनिधि तार्किक चिंताएं दिखाने में पीछे नहीं रहे। सड़क पर महिलाओं का गुस्सा क्षोभ,अपमान और व्यवस्था की निष्क्रियता से सातवें आसमान पर था। आम महिला की इस चिंता को समझना बिलकुल कठिन नहीं है। संसद के अंदर बैठे हुए हमारे कई प्रतिनिधि इसकी जघन्य भर्त्सना कर चुके हैं। कोई अपराधियों को फाँसी की सजा से कम पर मानने को तैयार नहीं तो कोई पुलिस-आयुक्त को हटाने पर आमादा है तो कोई इस बेबसी पर आँसू बहा रहा है । आखिर,ये जन-प्रतिनिधि किससे यह सब माँग कर रहे हैं जबकि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस व्यवस्था के यही लोग जिम्मेदार और गुनाहगार हैं !

बलात्कार जैसी घटनाएँ सीधे-सीधे कानून-व्यवस्था का मामला हैं। हमारे समाज में जब तक यह धारणा नहीं मज़बूत होगी कि किसी भी दुष्कृत्य के लिए अभियुक्त को जल्द और निश्चित रूप से उसके परिणाम भुगतने होंगे,तब तक ऐसी घटनाओं पर पचास बार फाँसी देने या गोली मार देने की सज़ा का प्रावधान महज़ कागजी ही रहेगा। आज यह धारणा पुख्ता हो चुकी है कि कोई  ,कहीं भी किसी महिला को छेड़ दे,उसे ज़बरिया उठा ले और यहाँ तक कि हवस पूरी करके मार भी दे तो कोर्ट-कचहरी में कुछ नहीं होना है। अव्वल तो कई मामले थाने या न्यायालय तक आते ही नहीं और यदि आए भी तो उनमें से अधिकांश सबूतों के अभाव में न्याय की दहलीज पर ही दम तोड़ देते हैं। इसलिए कई बार इन मामलों की शिकायत भी नहीं की जाती।

संसद में कई महिला-प्रतिनिधियों की चिंताएं सच्ची जान पड़ती हैं पर आखिर में कानून-व्यवस्था को लागू करना-करवाना आम जनता की जिम्मेदारी तो नहीं है। कानून अभी भी इतने कमज़ोर नहीं हैं पर मुख्य बात इन्हें लागू करने की है। जब हमारी राजनीतिक-व्यवस्था भ्रष्टाचार और अपने-अपने सत्तारोहण पर जुटी हुई हो,ऐसे में नौकरशाही या पुलिस-प्रशासन क्यों पीछे रहे ?हमारे प्रतिनिधि इस तरह की घटनाओं की सीधी जिम्मेदारी पुलिस-प्रशासन पर डालकर निश्चिन्त हो जाते हैं पर क्या सबसे बड़े जिम्मेदार वे स्वयं नहीं हैं?सरकार गरीबों को कैश-सब्सिडी का झुनझुना पकड़ाकर आत्म-मुग्ध हो रही है और उसकी लुटती हुई आबरू की कोई कीमत नहीं है.यह आम जनता के साथ मजाक नहीं तो क्या है ?हास्यास्पद तो यह है कि कानून-व्यवस्था तहस-नहस होने पर सरकार और हमारे प्रतिनिधि ही चिंताएं भी ज़ाहिर कर देते हैं. आखिर जनता ने सत्ता की लगाम जिनको सौंपी है तो किसी भी प्रकार की अराजकता  होने पर वे पल्ला कैसे झाड़ सकते हैं ?

आज पूरे देश में कानून का कोई खौफ नहीं है। जिसको जो मन में आ रहा है,कर रहा है। संसद में हमला करके,हत्याएं-बलात्कार करके,सरे-आम उगाही करके भी अगर कोई सुरक्षित रह सकता है तो ऐसे जंगलराज में कोई क्यों डरे ?हम पूरी तरह से अराजक-राज में रह रहे हैं। अब ज़रूरत केवल कानून के राज को स्थापित करने की है,संसद में भाषणबाज़ी करने की नहीं। ऐसा न हो पाने पर वहाँ फफक-फफककर रोना महज़ घडियाली आँसू बहाने से ज़्यादा कुछ नहीं है।