28 जनवरी 2012

हम वो परिंदे हैं !

उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,
कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती !(१ )


हमने मौसम की तरह,उनका इंतज़ार किया,
पतझर के बाद भी ,बासंती-हवा नहीं आती ! (२)


वे खूब खुश रहें ,अपने जहान में,
हमें तो अब दुआ भी,देनी नहीं आती !(३)


शाख़ से गिर गए हम वो परिंदे हैं,
आस्मां न हाथ आया,ज़मीं नहीं सुहाती !(४)


बीते हुए लम्हों को पकड़ने की ज़िद में, 
ख़ुशी न रोक सका,ज़िन्दगी चली जाती !(५)


यह भी देखें:

अपने अली साहब को यह ग़ज़ल भेजकर सम्मति ली थी ,
उनने तीसरे शेर में कुछ यूं तबदीली की,हालाँकि मैंने अपना 
वाला वर्ज़न ज्यों का त्यों रखा है ताकि उसका भाव हमारा हो !

दुआ ये दिल से वो शादाब हों आबाद हों अपने जहान में,
लुटे से हम ज़रुर हैं फिर भी ,लबों पे बद्दुआ नहीं आती !
--अली सैयद
और यह देखिये मेरी हिमाकत:
दुआ ये दिल से वो ,आबाद हों अपने जहान में,
लुटे तो हम ज़रूर हैं,पर बद्दुआ नहीं आती !

35 टिप्‍पणियां:

  1. आपको दुआ देनी नहीं आती
    इसलिए बासंती हवा नहीं आती।

    गाओगे गीत जो पर्यावरण के
    सुधर जाएंगे आचरण आदमियत के।

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    1. काश ,हम भी आदमी होते,
      तो यूँ सरे-आम न रोते !

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    2. आदमियत ... हिमाकत ...

      यही है शब्‍दों की ताकत।

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  2. बिन तेरे क्या अजीब आलम है
    खुद की बेगम नज़र नहीं आती :)

    घोंसले कितने बनाये हमने
    शाख से ये खबर नहीं आती :)

    सर्दियाँ खुश्क खुश्क सी गुजरीं
    गर्मियां तर-ब-तर नहीं आतीं :)

    तुमसे उम्मीद नहीं अब हमको
    चुम्मियां इस अधर नहीं आतीं :)

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    1. अपनी लाइफ से जो अब्सेंट हो तुम
      डेट-ए-एक्जाम की खबर नहीं आतीं :)

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    2. संतोष जी से कहना था..

      दोस्त गम ख्वारी में अब और फरमायेंगे क्या
      रोयेंगे जब जार-जार चुटकी भी न बजायेंगे क्या!

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  3. बसंत पंचमी के दिन इतना थका-थकापन! :)

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  4. बड़ी बेवफा है बासंती हवा,
    पतझड़ के बाद भी नहीं आती..

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    1. यही तो दर्द है मसलसल हमको,
      अब उनकी खबर भी नहीं आती !

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    2. खबर जब भी आये, दुरुस्त आये,
      हमें कयामत मनानी भी आती।

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  5. ओह! गमज़दा माहौल में पढ़ी जाय तो खूब अच्छी लगेगी यह गज़ल।

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    1. माहौल का कुसूर नहीं,न ग़ज़ल का है,
      हमारी जिंदगी ही कुछ ऐसी हो गई है !

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    2. :( ....!

      ऐ मेरे शहर की वासंती हवा..जा! बैसवारी में कोई उदास बैठा है। जा उसे मस्त कर दे।

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    3. आभार ....बसंती को भेजने के लिए !

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  6. ग़ज़ल, इम्प्रोवाइज़ेशन और टिप्पणियाँ, सभी सुन्दर लगीं।

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  7. बेहतरीन गजल चल निकली .... बह निकली....
    बसंती हवा मानिंद

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  8. उम्‍मीद में दुनिया कायम है.... आएगी जरूर आएगी। इंतजार करें।
    बढिया लिखा है आपने और अली साहब ने जो परिवर्तन किये वो भी गजब के हैं।

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  9. उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,
    कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती ..

    भाई लाजवाब और गहरा शेर है ये तो ... मज़ा आ गया पूरी गुफ्तगू पढ़ के ...

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  10. लगता है , मिश्र जी की बसंती हवा लग गई आपको भी । :)
    टिप्पणियां पढ़कर भी आनंद आ रहा है त्रिवेदी जी ।

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  11. भाई जी ,
    वसंत में, बसन्ती का इन्तजार है !
    मन का हर कोना , बेक़रार है !

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  12. "यह भी देखें" इस पोस्ट का सबसे अच्छा हिस्सा है :)

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  13. उत्तम अभिव्यक्ति।
    बसंत पंचमी की शुभकामनाएं....!

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  14. वाह
    बेहतरीन गज़ल..
    पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ...
    बाकी पोस्ट्स धीरे धीरे पढेंगे.
    शुभकामनाएँ.

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  15. इन दिनों आप और अली साहब अपने सृजनीय जीवन के उफान पर हैं :)
    शेर अच्छे है ! बधाई!

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  16. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति
    आज चर्चा मंच पर देखी |
    बहुत बहुत बधाई ||

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  17. बहुत बेहतरीन लिखा है आपने ...
    दुआ ये दिल से वो ,आबाद हों अपने जहान में,
    लुटे तो हम ज़रूर हैं,पर बद्दुआ नहीं आती !
    यह परिवर्तन भी बहुत शानदार है ...

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  18. उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,
    कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती !
    क्या बात है संतोष जी!! बहुत खूब.

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  19. बहुत बेहतरीन लिखा है आपने ...बहुत बहुत बधाई .....

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  20. गहन भाव लिए सुन्दर रचना |
    आशा

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  21. इन्तजार करे बसंती का,...
    बहुत सुंदर गजल, बेहतरीन प्रस्तुति,
    welcome to new post --काव्यान्जलि--हमको भी तडपाओगे....

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