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25 मार्च 2014

बेमौसम की बदरी !

सबने अब हुँकार भरी है,
वही देश का प्रहरी है||



अपनी अपनी विजय पताका,
अपनी अपनी गगरी है ||



फिर से आस लगाए हम,
कब हालत ये  सुधरी है ?



गाँव,शहर वाकिफ़ उनसे ,
वाकिफ़ काशी नगरी है ||



टीका,टोपी स्वाँग सभी,
स्वर्ग से काया उतरी है ||



पंडित,मुल्ला धरम बचाते,
इतनी पाप की गठरी है ||



छँट जायेगा जल्द कुहासा,
बेमौसम की बदरी है ||






29 नवंबर 2012

रोशनी देगा कोई ?


ज़िन्दगी हमको कहाँ ले जाएगी,
मौत से पहले बता देगा कोई ?(1)


आखिरी शब है नहीं हो पास तुम,
यह खबर तुमको सुनाएगा कोई ?(2)


हमने किए जो फैसले ,भारी पड़े
इस राज से परदा उठाएगा कोई ?(3)


चल चुकी तलवारबाजी इस शहर में,
अब अम्न का पैग़ाम लाएगा कोई ?(4)

महफ़िलें रोशन रहीं हैं अब तलक,
बुझते दियों को रोशनी देगा कोई ?(5)

 

 

5 नवंबर 2011

पन्ना मेरी किताब का !



सबसे  दूर हूँ,ग़ुमसुम सा हो गया हूँ ,
*गायब है एक पन्ना ,मेरी किताब का !१!

सोचता तो होगा,वह भी मेरी  तरह,
दूर जाके पन्ना,मेरी  किताब का !२!

मैं रहा अधूरा,वो भी रहा अकेला,
नुच गया है पन्ना, मेरी किताब का !३!

ज़िन्दगी के इस ,छोटे अहम सफ़र में ,
ज़िस्म-सा था पन्ना,मेरी किताब का !४!

ये हवाएँ,आंधियाँ,दुश्मन मेरी बनीं,
उड़ा गईं हैं पन्ना ,मेरी किताब का !५!


क़यामत के रोज़ मैं,खुदा से पूँछ लूँगा,
क्यों जुदा हुआ पन्ना ,मेरी किताब का ?६!





* पंक्ति डॉ अरविन्द मिश्र  द्वारा  सुझाई गयी,इसलिए उन्हीं को समर्पित !

1 नवंबर 2011

बदलते हुए !

इन्हीं  आँखों से मैंने, जाम को ज़हर होते देखा,
ढल गयी जो शाम उसे सहर होते देखा !१!


ज़िन्दगी के मायने ,अब बदल गए,
अपनों में परायों का, असर होते देखा !२!


खुशबू-ओ-मोहब्बत से ,भरे हुए चमन में,
घुसते हुए लोगों का ,क़हर होते देखा !३!


जिन्होंने बनाए थे ,अपने खूं से  घरौंदे,
उन्हीं को आज हमने , खंडहर होते देखा !४!


कहाँ तक बचेंगे ,बदलती रिवायत से,
छिपाते जिसे रहे ,नज़र होते देखा !५!




*आख़िरी शेर को छोड़कर सब पुरनिया  हैं !

फतेहपुर,२५/०३/१९९० 








3 अक्टूबर 2011

कुछ मन से ,कुछ बेमन से !

कई दिनों से मन उचाट-सा है.विषय बहुत हैं लिखने को पर लगता है जो 'तड़प' है उसमें कहीं कुछ कमी आ गयी है.ऐसा क्यों होता है अब? पहले पढने से मन विरत हुआ और अब लिखने से ! यह निरा काहिलपना नहीं तो क्या है ? किताबें लेना ,उन्हें निहारना और खरीदना मुझे अब भी अच्छा लगता है,पर उन किताबों में भी उसी तरह धूल ठहरी हुई है जैसे मेरे दिमाग में !

फिर भी ,प्रवीण पाण्डेय की यह पोस्ट   पढ़कर करीब दस साल बाद दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी गया और  पुनः सदस्य बना.अज्ञेयजी की आत्मकथा 'शेखर एक जीवनी' पढने की इच्छा बहुत दिनों से थी,पर वह उस समय वहाँ भी न मिली.अचानक हिंदी के प्रसिद्द आलोचक राम विलास शर्मा की आत्मकथा 'अपनी धरती अपने लोग' दिखाई दी और मैंने उसे तुरत लपक लिया .यह तीन खण्डों में है जिसका शुरूआती भाग अभी पढ़ रहा हूँ.शर्माजी हमारे बैसवारा के ही रहने वाले थे ,इसलिए इसमें अतिरिक्त दिलचस्पी हुई.वास्तव में बेहद रोचक और देसज-शब्दों की प्रचुरता लिए हुए यह पुस्तक बहुत रुचिकर लग रही है .इसके बारे में फिर कभी विस्तार से !


इस बीच मेरे परम सुह्रद डॉ.अरविन्द मिश्र  कई बार मुझे नई पोस्ट के लिए प्रेरित कर रहे थे,मुझे अपना लेखकीय-धर्म याद दिला रहे थे,सो अपने मन को सान पर चढ़ाकर पैना करने की कोशिश में जुट गया ! पुरानी डायरियों के पन्ने उलटे,तो कई रचनाएँ  आज मुझे बड़ी हलकी लगीं,फिर भी झाड़-पोंछकर जो बच रहा ,वह आपके  रूबरू है !


                                          आ  जाओ तुम 

साँस आखिरी,आस आख़िरी,
आ  जाओ तुम ,सलाम आख़िरी !


ये निगाहें,तुम्हें ही ताकतीं,
स्याह ज़िन्दगी में,रोशनी -सी झांकती,
थक गया हूँ मैं,इंतज़ार में,
पी रहा हूँ ये, जाम आख़िरी !!

मिल नहीं सके, तो ना सही,
तमन्ना भी अब,और ना रही,
तन की नहीं,प्यास नज़र की,
बुझा जाओ तुम,है काम आख़िरी !!

ज़ुदा जो रहे ,अब तलक मुझसे,
कुछ भी नहीं  हैं,शिकवे-गिले तुमसे,
कर रहा हूँ अर्ज़,तसलीम तो करो,
मान जाओ तुम ,है  कलाम  आख़िरी  !!

साँस  आखिरी ,आस आख़िरी,
आ जाओ तुम ,सलाम आख़िरी !!


रचना काल : १०/१०/१९८९  ,फतेहपुर 


अगर यह बेमतलब लगे तो हमारी पसंद की यह ग़ज़ल तो सुन ही लो ,मुन्नी बेग़म की दिलकश आवाज़ में !







18 सितंबर 2011

ग़ज़ल जैसा कुछ !

बातों में है  गज़ब की ज़ुम्बिश,      ,
जानें कहाँ कहर बरपेगा ?१!

सूखी धरती के दामन में,
जाने कब बादल बरसेगा ?२! ,

कौन बचा तेरी गिरफ़्त से,
कृत्रिम-हंसी कब तक ओढ़ेगा ?३!

तेरी सोहबत में ये जाना,
क़ायदा कोई नहीं चलेगा !४!

तेरी नफ़रत इतनी प्यारी,
चाहत को कैसे परखेगा ? ५!

फूलों का गुलदस्ता 'चंचल',
कब जीवन का हार बनेगा ? ६!



ग़ज़ल लिखना तो एक दिखावा है,
अस्ल में तो राग-ए-हसन सुनाना है........सुनिए 
 

12 जुलाई 2011

बदला हुआ मौसम !

अब नींद भी किश्तों की तरह आती है,
सावन की तरह झूम के नहीं आती है !

हम जानते थे उनके दिल में बैठे हैं,
मेरी सूरत  भी उन्हें याद नहीं आती है !

बारिश के महीने में कैसी ये तपिश,
बदले हुए मौसम की तरह आती है!

अब मुझे हँसने की इतनी आदत है,
रोती हुई सूरत को हँसी आती  है !

उनकी हर बात मुझे जँचती  है,
यही बात नहीं उनको नज़र आती है !


23 दिसंबर 2008

ताला*

सारे शहर में अब तो लग चुका है ताला ।
निकलने का जब वक्त है तो बंद है ताला। ।

ये गाँव -शहर सब वीरान हो गए,
दहशत तो और भी है,देख के ताला।

गली,चौबारे जो फूलों से महकते थे,
लुट गए हैं सब बता रहा है ताला।

इंसान के बदले मंडरा रहे हैं गिद्ध ,
घर हुए निर्जन जता रहा ये ताला।

बस्ती उजाड़कर 'वे'जंगल बना रहे,
रोकनेवालों के मुंह में बंद है ताला।

ख़ामोश क्यों बैठा ख़ुदा ,ये खेल देखकर,
अरसा बीत गया ,कब खुलेगा ताला?


*शीर्षक दल्यान सिंह (मित्र) की प्रेरणा से

दूलापुर (06-09-1989)


2 दिसंबर 2008

हमारा पड़ोसी

बेवज़ह ही आजकल ,हमसे पड़ोसी जल रहे,
वे हमें जला रहे या ख़ुद जल रहे।

एक हम हैं कि दोस्ती का भर रहे हैं दम ,
वो हैं कि मसल्सल हमको मसल रहे।

दोस्ती का हमने ,हरदम बढ़ाया हाथ,
हमसे गले मिलके फिर कुचल रहे।

बदनीयती की भी एक, हद होती है यार,
मजबूर होके हम भी हद से निकल रहे ।

वक्त है अभी-भी ,रुख बदल लो 'चंचल' ,
हम भी वरना अपना रुख बदल रहे।


फतेहपुर --15-04-१९९०