17 मई 2012

लेखक या ब्लॉगर होने के नाते !

 

अकसर ऐसा क्यों होता है कि हम समाज या मौज-मजे के लिए लिखते-लिखते व्यक्तिगत आक्षेपों या तुच्छ बहसों में आकर उलझ जाते हैं ? यह ऐसी संक्रामक बीमारी है कि हम इससे अछूते नहीं रह सकते।चाहे बड़े लेखक हुए हों,कवि या आज के ब्लॉगर ,सभी कभी न कभी इस अवस्था से दो-चार होते हैं।कुछ लोग ज़रूर थोड़े सयाने दिखते हैं जो इन बातों को नज़र-अंदाज़ करके निकल जाते हैं पर इससे पूर्णकालिक समाधान नहीं मिलता।

हम अगर इस भागमभाग ज़िन्दगी में थोड़ी देर आराम से सोचें कि हम क्यों और क्या लिखते हैं तो शायद कहीं ज़्यादा सार्थक बातें बाहर आएँगी और इस का उत्तर भी । ऐसा नहीं है कि हमारे लिखने भर से समाज या देश में क्रांति आ जायेगी पर  अगर इस लिखने से कहीं कुछ हलचल होती है,बहस शुरू होती है या खालिस मनोरंजन ही होता है तो भी संतोष की बात है।दिक्कत तब होती है ,जब आपके लेखन को नकारात्मक दिशा में मोड़ने का प्रयास होता है और आप इस जाल में फंसकर वही करने लग जाते हैं जो दूसरों का उद्देश्य होता है।

सबसे ज़रूरी बात लिखने के लिए यही है कि खुले मन से ,बिना किसी दुराग्रह के ,यदि हम कुछ लिख रहे हैं तो समाज और देश के लिए तो अच्छा होगा ही,हमें भी सुकून देगा । हम अपने अजेंडे पर ही कायम रहें और सार्थक व स्वस्थ लेखन करते रहें तो ही हमारा लिखना सही मायने में लिखना होगा।लिखने का मतलब केवल पन्ने और जगह भरने से व अपने बने रहने के लिए बिलकुल नहीं होना चाहिए। अगर लिखने वाले होकर भी इतनी-सी बात समझ में न आ पाए तो काहे के लेखक ?

यहाँ मैं इस बात पर ज़रूर ज़ोर देना चाहूँगा कि गंभीर-लेखन में बनावट या दोहरेपन से बचे रहना ज़रूरी है।हम लिखें तो खूब आदर्श, मानवता और संवेदना की बातें मगर असल ज़िन्दगी में हम इनसे कोसों दूर हों,तो फिर हम किसके लिए लिखते हैं ?यदि हम अपनी कही बातों को खुद अमल में नहीं ला पाते तो उसका असर भी नगण्य होगा और हम हँसी के पात्र होंगे ।हमारी लिखने और पढ़ने की योग्यता हमारे मुँह और कलम से निकले शब्दों से ध्वनित हो जाती है।एकबारगी मुँह से भले ही हम भूलवश कुछ अन्यथा निकाल दें पर लिखे हुए का अभिलेख होता है और इसमें हल्कापन बिलकुल उचित नहीं ।

लेखक या ब्लॉगर इसी समाज का हिस्सा हैं।हमारे बीच में विचारों को लेकर तो टकराहट होनी चाहिए पर यह टकराहट किसी के व्यक्तित्व को चोट पहुंचाए बिना ही हो।बड़े लेखक और कवियों के भी आपस में मनमुटाव होते रहे हैं पर वे इसे सद्भाव और आपसी संबंधों के खराब होने की हद तक  नहीं ले गए । अगर हम समाज को दिशा देने वाले बनते हैं तो समाज को वास्तव में अपने बड़प्पन से कुछ दें,न कि झूठे अहंकार में डूबे रहें।यह जिम्मेदारी लेखक या ब्लॉगर होने के नाते हम पर ज़्यादा है क्योंकि यही वर्ग उपदेशक भी अधिक है । कभी लिखने से मौका मिले तो इस विषय पर भी सोचें ।

 

39 टिप्‍पणियां:

  1. पर उपदेश कुशल बहुतेरे .......
    आप भी तो इसी बीमारी के शिकार हैं प्रभु ..अली सा की पोस्ट पर मिश्रा के नाम से की गयी टिप्पणी किस कोटि में रखेगें आप ?
    दरअसल हम जब आलोचनाएँ करते हैं तो खुद को ही बेहतर एक्सपोज करते हैं !

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    1. आपने एक हल्के-फुल्के अंदाज़ में की गई टीप को इत्ती गंभीरता से ले लिया,इसका हमें खेद है.मैंने यहाँ गंभीर-लेखन की बात उठाई है,आपके विचार इसके लिए अपेक्षित हैं.
      ..और हाँ,आपके द्वारा हमारी पिछली पोस्ट(बदलती रूचियाँ और दोस्त)पर की गई टीप को हमने बिलकुल हल्के-फुल्के अंदाज़ में ही लिया है.
      अली सा के यहाँ मेरी मुख्य टीप पहले है,उसी को मेरी मुख्य टीप माना जाय.आपको दुःख पहुँचाना मेरा उद्देश्य नहीं था !

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    2. ब्लॉगिंग आमने-सामने की बतचीत जैसे रियल टाइम तो है नहीं जहाँ ग़लतफ़हमी होने पर तुरत बात स्पष्ट की जा सके। बेनिफ़िट ऑफ़ डाउट भी यहाँ की ज़रूरत है और इंसान पहचानने की कला भी। दिन रात बगल से छुरियाँ चलाने वाले तीन पोस्ट में राम नाम ले लेते हैं तब तो भक्तजन निहाल हो जाते है तो दोस्तों की वैचारिक असहमति को बर्दाश्त करने में भी कोई बुराई नहीं है। मतभेद की एकाध टिप्पणी के बजाय मित्र के गुण प्रकाशित करने वाली अनेक टिप्पणियों, पोस्ट्स पर ध्यान दिया जाये तो बेहतर है।

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  2. पते की बात-
    करनी कथनी में समरूपता जरुरी |
    आभार ||

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  3. लेखन तो सभी सार्थक और समाजोपयोगी ही करने का प्रयास करते है।
    असल बात हमारे स्वभाव की कमजोरी का एक महत्वपूर्ण अवगुण उत्तरदायी है।
    अहंकार और मात्र अहंकार!!!
    १- शरूआत होती है इस अहंकार से कि मुझसे श्रेष्ठ विचार प्रस्तुत करने वाले तुम कौन?
    २- तुम्हारे तो इस विचार को अपनी टिप्पणी से तुच्छ साबित कर दूंगा।
    ३- अच्छा कभी तुमने मेरे विचार की अकाल हत्या की थी न?
    ४- तुमसे तो मैं कहीं उत्कृष्ट बुद्धिमान और रचनाकार हूँ।
    ५- मेरी आलोचना का प्रतिकार नहीं देख अब प्रतिशोध लूंगा।
    ६- मात्र महसुस करवाने का धैर्य मुझमें नहीं, तत्काल बदला!!
    ७- ईंट का जवाब ईंट से किया तो क्या विद्वत्ता? पत्थर से वह भी तीक्षण!!
    ८- कौन देखता है विचार सही है या गलत किन्तु बदला तो व्यक्तिगत मर्मभेदक!!

    मित्रों बौद्धिक क्षेत्र में, साहित्यक पंगत में, समाज सरोकार में, सज्जनों के बीच भी जब हम समाज को क्रांतिकारी विचार प्रदान करने की बात करते है और स्वयं अपने मामूलीओ से अहंकार पर नियंत्रण नहीं कर सकते? अपना विवेक जागृत नहीं रख सकते? कैसे विचारक है हम???

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    1. आभार सुज्ञ जी! आप सरीखे विचारवान लेखक की हम सब को आवश्यकता है। आलेख पहले ही पढ लिया था। यह टिप्पणी भी कोई कम नहीं है।

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  4. लेखक या ब्लॉगर इसी समाज का हिस्सा हैं.हमारे बीच में विचारों को लेकर तो टकराहट होती रहती है
    और होनी भी चाहिए,लेकिन कोई भी बातों का आदान प्रदान मर्यादित भाषा में होना चाहिए,......

    MY RECENT POSTफुहार....: बदनसीबी,.....

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  5. आमंत्रित सादर करे, मित्रों चर्चा मंच |

    करे निवेदन आपसे, समय दीजिये रंच ||

    --

    शुक्रवारीय चर्चा मंच |

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  6. बहस कब होती है ? और क्यूँ ? क्योंकि हम सिर्फ हर बात को काटना जानते हैं . आपने हमने सबने देखा है कि जब कोई घटना होती है तो कुछ लोग - जिनका उन घटनाओं से कोई सरोकार नहीं होता , कोई फर्क नहीं पड़ता - वे सब टायर जलाने के लिए खड़े रहते हैं . कुछ आतंक फैलाना है - यह उनकी प्रबल दिलचस्पी होती है तो मौका क्यूँ गंवाएं . उसीमें कोई धक्का दे देता है तो बात अपनी इज्ज़त की आ जाती है .... इज्ज़त की परिभाषा इतनी हल्की हो गई है कि तरस आता है . इतने सशक्त विरोधियों को देखकर लगता है कि जिस घर में किसी की बेटी की इज्ज़त का सवाल होता है तो तुम्हारा यह विकराल रूप कहाँ होता है ? तब सबकुछ व्यक्तिगत के दर्जे में होता है .
    लिखो , बढ़ो ---- क्यूँ आपस में ही फूट डालो , शासन करो की नीति अपना रहे !!!

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  7. अब स्वभाव में ही गंभीरता नहीं तो लिखें क्या............
    सो बच कर चलते हैं उन बातों से जिनमे अक्ल का इस्तेमाल हो.
    :-)

    सादर.

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  8. सार्थकता लिए हुए सटीक लेखन ।

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  9. बंदनी फिल्म में एक डाइलोग था

    सब ठीक ::: है ::::::::::::

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  10. यथासंभव शान्ति बनी रहे, पर शान्ति की विवशता लेखन में न घुस जाये।

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  11. प्रिंट मीडिया और ब्लॉग में अंतर हैं
    प्रिंट मीडिया में आम पाठक की राय तुरंत लेखक तक नहीं पहुचती
    किताब का बिकना / ना बिकना सिद्ध करता हैं की आप के पाठक कितने हैं
    ब्लॉग पर तत्काल आप को अपने लिखे पर टिपण्णी मिलती हैं .
    हिंदी ब्लॉग जगत में २००७ में आयी थी तब से लेकर अब तक पाया की ग्रुप बना कर लोग आक्षेप करते हैं या यूँ कहे आक्षेप करने के लिये ग्रुप बनाते हैं .
    किसी का लिखा सकारात्मक हैं या नकारात्मक हैं ये बहस का मुद्दा हो ही नहीं सकता क्यूँ नेगटिव और पोसिटिव सबके अपने होते हैं . आप को मेरी बात गलत लग सकती हैं मुझे आप की पर इस से आप की जीवन शैली , आप के परिवार , आप के चरित्र , आप के विवाहित / अविवाहित होने का क्या मतलब हैं . लेकिन यहाँ ऐसा ही होता हैं .
    बिना किसी का ब्लॉग शुरू से आखिर तक पढ़े , अपने कुछ मित्रो से उस ब्लॉगर के बारे में नेगेटिव / पोसिटिव राय बना कर उसके ब्लॉग पर जा कर कमेन्ट करना , जहां वो कमेन्ट करे वहाँ उसके विषय में अपशब्द कहना क्यूँ क्युकी आप के मित्र ने कहा की वो खराब हैं , क्या आपने बरतना जरुरी नहीं समझा ये सब करने से पहले

    हिंदी ब्लोगिंग को लोग कहां से कहां तक लेजाने की बाते करते हैं , सम्मेलन होते हैं , पीना पिलाना होता , तस्वीरे डाली जाति हैं और फिर टाय टाय फिस्स .

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  12. किसी मुद्दे पर विचार विमर्श , तर्क वितर्क होना सार्थक है . लेकिन व्यक्तिगत बहस में पड़ना किसी की सेहत के लिए ठीक नहीं होता . वैसे भी बहस का कोई अंत नहीं होता , न ही कोई निष्कर्ष निकलता है .

    सम्मान पारस्परिक होता है जैसे ताली दोनों हाथों से बजती है .
    हमने भी अपना ज्ञान बघार दिया :)

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  13. अब लिखने भर से किसी विशेष परिवर्तन की आशा व्यर्थ है, पर लिखते रहना हमारे लिए जरूरी है क्योंकि हम सभी जागरूक, पढ़े-लिखे इन्सान हैं और हम अपने विचारों को अपने तरीके से व्यक्त किये बिना नहीं रह सकते...सुन्दर प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई

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  14. जिस विषय को पढ़ा जा रहा है , टिका टिप्पणी उस पर की जाये , मगर प्रबुद्ध ब्लॉगर्स भी व्यतिगत आक्षेप लगाने से गुरेज नहीं करते . स्वस्थ वाद -विवाद आवश्यक है विचार को आगे बढ़ाने के लिए , होना भी चाहिए!
    जब किसी का नाम लेकर मुहब्बत के इज़हार से लेकर रिश्ता टूटने तक की खबर पोस्ट पर लिखी जायेगी तो बात व्यक्तिगत ना होकर सार्वजानिक हो जाती है , फिर आलोचना या प्रतिक्रिया से कैसे निरपेक्ष रहने की बात फिजूल है !

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    1. जी, इसके मूल में क्या है? शायद लोगों को यह अहसास ही नहीं है कि इंटरनैट पर लिखी बात सार्वजनिक है और संसार में हर प्रकार के लोग मौजूद हैं। कई तो शायद व्यक्तिगत हिसाब-किताब बराबर करने के ऐसे मौके ढूंढते रहते हैं। जिसके पीछे पड़ जायें उसे राम बचाये!

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  15. रश्मि जी से सहमत. और रचना से भी. इसको मैंने खुद महसूस किया है सिर्फ महसूस ही नहीं किया है बल्कि देखा भी है. विषय की आलोचना कीजिये व्यक्ति की नहीं. उसकी कलम की धार देखे और उसका सामाजिक सरोकार. पर ऐसा हो कब पता है? हम किसी को भी अगर हमारी कोई व्यक्तिगत राय है तो शब्दों से सारी सीमा पार कर जाते हें बगैर ये देखे कि खुद आपकी छवि कुछ अन्य लोगों के सामने उससे अधिक बुरी बन रही है जिसको आप नीचा दिखाने का प्रयास कर रहे हें.

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  16. ये तो बड़ी ऊंची पोस्ट हो गयी सिरीमानजी! :)

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  17. मैं लिखता इसलिये हूं कि…
    बहरहाल, सवाल फ़िर भी अपनी जगह बना हुआ है: मैं क्यों लिखता हूं? सच तो यह है कि इस पर मैंने कभी ज्यादा सोचा नहीं, क्योंकि जब-जब सोचा तो लिखना बन्द हो गया। अब इसका जवाब कुछ अनुमानों से ही दे सकता हूं। पहला तो यह कि लेखन-कर्म महापुरुषों की कतार में शामिल होने का सबसे आसान तरीका है। चार लाइने लिख देने भर से मैं यह कह सकता हूं कि मैं व्यास, कालिदास, शेक्सपीयर, तोल्सताय, रवीन्द्रनाथ ठाकुर और प्रेमचन्द की बिरादरी का हूं।
    इसके लिये सिर्फ़ थोड़े से कागज और एक पेंसिल की जरूरत है। प्रतिभा न हो तो चलेगा, अहंकार से भी चल जायेगा- पर इसे अहंकार नहीं लेखकीय स्वाभिमान कहिये। लेखकों के बजाय आप किसी दूसरी जमात में जाना चाहें तो वहां काफ़ी मसक्कत में करनी पड़ेगी; घटिया गायक या वादक बनने के लिये भी दो-तीन साल का रियाज तो होना चाहिये ही। लेखन ही में यह मौज है कि जो लिख दिया वही लेखन है, अपने लेखन की प्रशंसा में भी कुछ लिख दूं तो वह भी लेखन है।

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  18. बहुत सार्थक आलेख...विचारों में मतभेद स्वाभाविक है पर रचना पर प्रतिक्रिया करते समय व्यक्तिगत मतभेदों से दूर रहें और संयमित प्रतिक्रिया दें ...

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  19. यहाँ आकर थोड़ा बदल जाते हैं
    वैसे तो हम वैसे ही होते हैं
    जैसे जहाँ से हम यहाँ आते हैं ।

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  20. बात ये है जी कि अपने हिसाब से हर कोई सार्थक लेखन ही कर रहा है, ये अलग बात है कि दूसरे उसे किस नजर से देखते हैं|
    वैसे बात सोचने लायक है और सोचने पर फिलहाल कोई टैक्स भी नहीं है सो जरूर सोचेंगे और ढेर सारा सोचेंगे :)

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  21. लेखक, ब्लॉगर, सभी इंसान हैं, मानवीय खूबी-खामी से युक्त। अहम को चोट भी लग सकती है और लेखन दम्भ-भरा भी हो सकता है। सबकी भावनाओं का ध्यान रखने वाले को भी कई बार यह देखना पड़ता है कि यदि बोलना चुप रहने से ज़्यादा ज़रूरी है तब फिर वही किया जाये। कुछ लोग जल्दी आहत हो जाते हैं, कुछ जन्मजात आहत रहते हैं। कुछ किसी एक व्यक्ति को आहत करने का मोर्चा जमाये चल रहे हैं। किसी को प्रशंसा चाहिये, तो कोई किसी और की प्रशंसा से आहत हो जाता है। जिसका जैसा व्यक्तित्व उतनी उसकी सीमायें। लिखते रहिये। कई बार सही लिखा भी गलत समझा जाता है। कभी आकाश में बादल होते हैं कभी आँख पर काला चश्मा, कभी अमावस्या भी होती है। किसी को यह अंतर दिखते हैं, किसी को नहीं, और कोई ऐसा भी है जो देखने मेन अक्षम है। लिखते समय इतना ही ध्यान रहे कि हमारे ऊपर संसार की ज़िम्मेदारी नहीं है। इस असीम ब्रह्मांड में हम सा क्षणभंगुर .... किसे क्या सिखायेगा और क्या उपदेश देगा?

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    1. @ कभी आकाश में बादल होते हैं कभी आँख पर काला चश्मा, कभी अमावस्या भी होती है। किसी को यह अंतर दिखते हैं, किसी को नहीं, और कोई ऐसा भी है जो देखने मेन अक्षम है:-

      सोच रहा हूँ अगर तीनों काम एक साथ हो जाएँ तो क्या होगा?

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  22. @हमारे बीच में विचारों को लेकर तो टकराहट होनी चाहिए पर यह टकराहट किसी के व्यक्तित्व को चोट पहुंचाए बिना ही हो.

    - सामान्य लोगों का यही प्रयास रहता है लेकिन यदि किसी को चोटिल महसूस करने की बीमारी हो तो उसका इलाज तो उसे खुद ही कराना पड़ेगा।

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    1. सोने को कितना ही पीटो, ज्यों पीटो त्यों सघन होता है। पर भुरभरी रेत तो छूने मात्र से बिखर जाती है।

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    2. सुज्ञ जी, बहुत सुन्दर उपमा दी है आपने, आभार!

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  23. सभी साथियों का इस विमर्श में शामिल होने का आभार. हमें विमर्श करते समय यह ज़रूर ध्यान देना चाहिए कि ऐसी कोई बात न कह दी जाए जिससे निजी भावनाएं आहत हों,तबके सिवा जब वह हास्य में न कहा गया हो !

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  24. मैं तो साफ कहूं छपने के लिए लिखता हूं या लिखता हूं इसलिए छपता हूं। अब छपता क्‍यों हूं, इसे तो प्रकाशित करने वाले संपादकगण ही बेहतर से बतला सकते हैं। वैसे यह कार्य जिम्‍मेदार पाठक और ब्‍लॉगर भी कर सकते हैं। फिर जबर्दस्‍ती लिखा नहीं जाता। हां, किसी समाचार को पढ़कर उस पर अपनी टिप्‍पणी यानी लिखने के लिए ऑटोमैटिक सोच मोड में चला जाता हूं और लिखा जाता है। अब वह कविता हो, व्‍यंग्‍य हो - आखिर है तो सब शब्‍दों का समुच्‍चय ही। पढ़ने वालों को उचित लगे तो ठीक वरना तो नकार सकते हैं। मैं किसी से शिकायत करने नहीं जाता हूं पर यह अवश्‍य सीखना चाहता हूं कि क्‍या सुधार करूं कि सबको भला लगे और अच्‍छा संदेश मिले। लेखन एक जिम्‍मेदारी भरा कार्य है। इसे जिम्‍मेदारी समझने वालों तक ही सीमित रहना चाहिए पर अब यह इसलिए पॉसीबल नहीं है क्‍योंकि इंटरनेट से जुड़ा प्रत्‍येक शख्‍स अब एक जिम्‍मेदार लेखक और रचनाकार बनने का मुगालता पाल चुका है और इस गलतफहमी को स्‍वीकार भी नहीं करता है। आपने सोच के लिए अच्‍छे विषय पर कीबोर्ड का इस्‍तेमाल किया है। मैं तो सिर्फ खटराग में ही व्‍यस्‍त रहता हूं, उसमें से ही कभी कभी मनभावन राग निकल कर बाहर आ जाते हैं।

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  25. अच्‍छी अच्‍छी बातें लि‍खी हैं जी

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