29 मार्च 2012

कहाँ गए वो गाँव ?


गाँव,गिद्ध,गौरेया गायब
कोठरी,डेहरी,कथरी गायब,
अब तो सूखे साख खड़े हैं
कुआँ ते हैं पनिहारिन गायब !

गाँव किनारे वाला पीपल,
बरगद और लसोंहड़ा गायब,
मूंज,सनई कै खटिया,उबहनि
दरवाजे कै लाठी गायब !

बाबा कै बकुली औ धोती
अजिया केरि उघन्नी गायब,
लरिकन केर करगदा,कंठा
बिटियन कै बिछिया भै गायब !

नानी केरि कहानी गायब,
लोटिया अउर करइहा गायब,
अम्मा कै दुधहंडि औ भठिया,
बप्पा कै रामायन गायब !

आम्बन ते अम्बिया हैं गायब
चूल्हे-भूंजा ह्वारा गायब,
सोहरै,बनरा,गारी गावै-
वाली सुघर मेहेरिया गायब !

पइसन के आगे अब भइया
रिश्ते-नाते,रस्ते गायब,
शहर किहे हलकान बहुत
अब तो चैन हुँवों ते गायब !

53 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी रचना ने पुरानी यादें ताज़ा कर दीं...आज ये सब कहाँ है? आज की पीढ़ी तो शायद इनके नाम से भी परिचित न हो...बहुत मर्मस्पर्शी, भावमयी उत्कृष्ट रचना..

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  2. खा गए हम-तुम....आधुनिकता...मशीनीकरण...कंक्रीट जंगल...सब मिल कर लील गए ...

    बहुत भाव भरी रचना...
    सादर.

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  3. ये रची है जोरदार -अब बेचैन बाबू भी पुलकित हो जायेगें!
    वैसे अभी भी एकाध गारी गाने वाली दुलहिनें हैं -खानी है क्या ?

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    1. महराज....आपकी विरक्ति से हमें शक्ति मिली है.
      आपका आभार !

      अब गारी खाने का मन करता है सही में...!

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  4. ...... स्मृतियों की संवेदनाओं से सराबोर कविताएँ !

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  5. भाई जी , आपकी कविता को पढ़कर मुझे निदा फाजली याद आ गए और अपना गाँव भी !.........मै रोया परदेश में , भीगा माँ का प्यार . दुःख ने दुःख से बात की , बिन चिट्ठी ,बिन तार !

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  6. वाह ! ! ! ! ! बहुत खूब संतोष जी
    सुंदर भूली स्मृतियों को याद दिलाती रचना,बेहतरीन भाव प्रस्तुति,....

    MY RECENT POST ...फुहार....: बस! काम इतना करें....

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    1. आपकी बातें प्रेरणा प्रदान करती हैं !

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  7. लगता है , गाँव होकर आए हैं ।

    बचपन गायब , ज़वानी गायब
    तो भैया ये गाँव क्या चीज़ है !

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    1. डॉक्टर साब...गाँव गए काफ़ी दिन हुए,इसीलिए हुलस रहे हैं !

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    1. सलिल जी,
      आप जैसे गुरु सबको नसीब कहाँ ?
      प्रणाम और आभार !

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  9. लोक मंगल को संजोये प्रतिमानों की पहचान अब यादों में रह जाएगी .. भाव मई अभिव्यक्ति .... शुक्रिया जी

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  10. वाह! वाह! वाह! वाह! आज त तबियत मस्त हुई गई। अब जाके बेचैनी मिटी हिया की। ब्लॉग कS नाम सार्थक हुई गवा। बधाई दें कि आभार कहें कछु ना बुझात अहै। जै राम जी की।

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    1. आपकी बेचैनी कुछ कम हुई,यहिके खुशी है.आभार आपका ,ई प्रेरणा आप से ही लेता हूँ !

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    2. ब्लागर कै गुटबंदी आगे
      टिपिया-शर संधानै गायब
      संतोषी की कविता पढ़के
      आत्मा के बेचैनी गायब

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  11. बेजोड़ रचना। आज सच में गांव की हर पारंपरिक चीज़ प्रायः ग़ायब ही है।

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  12. सब कुछ गायब हो रहा है तो चैन तो गायब होना ही है .... बहुत अच्छी प्रस्तुति

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  13. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति....
    सादर।

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  14. आज आपके ब्लॉग पर बहुत दिनों बाद आना हुआ अल्प कालीन व्यस्तता के चलते मैं चाह कर भी आपकी रचनाएँ नहीं पढ़ पाया....पुरानी यादें ताज़ा हो गई बहुत बेहतरीन प्रस्‍तुति...!

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    1. संजय भाई कुशल से रहो,देर आये,दुरुस्त आये !!

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  15. किसी कवि ने लिखा था "कथरी तोहार गुण ऊ जानय जे करय गुजारा कथरी माँ" ,,, आज इस कविता की गहराई वही समझ पाएगा जिसने गाँव की इन प्रतिमानों को जिया है। अजिया की उघन्नी,बाबा की बकुली, बरगद, इनारा,खरिहान तमाम ऐसे स्मरण हैं जो कहीं न कहीं सीने मे आजीवन धड़कते हैं। आपकी इस कविता ने जैसे सबकुछ सजीव कर दिया। आपको बहुत बहुत साधुवाद...और बधाई

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    1. सही कहे लम्बरदार.....आज आपसे बात करने के बाद बड़ी खुशी और प्रेरणा मिली .यहिका दुसरका संस्करण भी जल्द जारी होयगा !
      आभार भाई !

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  16. दिल से सच्चाई, बातों से अपनापन भी गायब!!!
    हे इंसान तूने खुद को गायब करने की ठान ली है क्या???

    बहुत ही बढ़िया पंक्तियाँ लिखी हैं अपने सर!!!!

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    1. देवांशु भाई,दूर-देश में ये यादें और सताती हैं.
      आभार !

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  17. मन मोह लिया इस शानदार कविता ने। वाह!!!

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    1. सतीशजी,
      आपके लिखे को हम कित्ते दिनों से पढ़ रहे हैं,वही का असर हो सकता है,आभार आपके स्नेह का !!

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  18. सब गायब दिखा कर सब याद दिला दिये आपने, आपकी कविता सिद्धात्मक अवस्था में पहुँच रही है।

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    1. ...कहीं ऐसा तो नहीं हम अपना कोई सिद्ध-पीठ ही बना लें !

      आभार प्रवीण जी !

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  19. ओह! वण्डरफुल! इतना पावरफुल नोश्टाल्जिया तो ईर्ष्या का विषय है!

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    1. दादा प्रणाम !
      आपके आशीर्वाद का बहुत दिनों से इंतजार था .हम धन्य हुए .

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  20. इस रचना की उत्कृष्टता के बारे में कहने को शब्द नहीं हैं ....
    लाजवाब !

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    1. भाई जी ,आपकी टीप हमेशा प्रेरित करती है .यह सब आपकी संगतिका असर है !
      बहुत आभार !

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    2. सतीश भाई आप अपनी अभिव्‍यक्ति को शब्‍दों में नहीं, वाक्‍यों में, पैरे में, पूरे लेख में स्‍वर दे सकते हैं, दर्ज कर सकते हैं।

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  21. चकाचक है।
    गांव भी पूछता होगा-

    मोड़ा गायब,मोड़ी गायब
    गये कमावन शहर सबै अब
    पढे लिख सब बच्चा गायब।

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    1. अनूप जी ,गाँव की आवाज़ और उसका दर्द आपने महसूसा,अच्छा लगा !
      प्यार के लिए आभार !

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  22. गांव नहीं होते गायब
    नहीं खोती हैं स्‍मृतियां
    हम ही चले आते हैं
    छोड़कर खूब सारे सच
    जिन्‍हें समझते हैं दुख
    सुख की वासना में
    रसना का रस समझ

    कहीं कुछ नहीं हुआ है
    हम ही हुए हैं डिलीट
    या हो गए हैं हाइड
    और भ्रम में फंसे हैं
    गांव खो गया
    रिश्‍ते खो गए
    हम खुद ही भूल गए हैं
    बतलाओ न सबको
    संतोष भाई

    सबकी समझ बढ़ाओ साईं।

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    1. अविनाशजी,आप अंतर्यामी हैं ,पता नहीं कहाँ से कहाँ पहुँच जाते हैं,पाताललोक तक की खबर लाते हैं :-)
      आभार !

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    2. दृश्यबंधों को गतिमान ही रहना होता है ! हम स्वयं भी अपनी भूमिका में स्थिर नहीं होते और ना ही किसी विशिष्ट दृश्यबंध में फ्रीज़ हो सकते हैं !

      चिंतन / कल्पना के स्तर पर पिछले दृश्यबंध में रम जाना / अटक जाना अस्वाभाविक भी नहीं है !

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  23. सही कहत अहै बड़का भईया..यहि आधुनिकता के दौर मा सब कुछ गायब होत चला जात अहै.

    राज शुक्ल, अयोध्या फैजाबाद

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    1. राज भाई ,
      आपके प्यार का ,स्नेह का आभार !

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  24. भाई त्रिवेदी जी मैं प्रवीण जी से सहमत हूँ की आपकी कविता सिध्द हो चुकी है और अच्छी बात ये है कविता क्षेत्र से लगभग गायब हो चुकी बैसवारी को आपने अपने रचना कर्म का माध्यम बनाया है विषय भी लगभग वही है जो पुरे बैसवारे में बिखरा पड़ा है

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    1. महाराज !
      आप हमहू से बढ़िया लिख लेत हो,बस जुट जाओ एकदम से !!!

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  25. सोहरै,बनरा,गारी गावै-
    वाली सुघर मेहेरिया गायब !
    आनंद कि अनुभूति हुई पढ़ कर ...या शायद गाने याद कर ...
    अच्छी रचना है ...
    बधाई एवं शुभकामनायें ...!!

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  26. बहुत बढ़िया है भैया -
    अब हुवे गाँव उन्नाव -
    कहाँ मिले तब छाँव |||

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