26 सितंबर 2012

रचना जब विध्वंसक हो !


जब चुप्पी इतनी क़ातिल है,
लब खोलेंगे तब क्या होगा ?

 
जब छूछे नैन बरसते हैं,
भर आएँगे तब क्या होगा ?

 
अल-सुबह से छाई वीरानी,
शब आ जाने पर क्या होगा ?

 
बंजर धरती दहके हरदम,
बादल बरसेंगे,क्या होगा ?

 
रचना जब विध्वंसक हो,

साहित्य-सृजन तब क्या होगा ?

 
लिए आइना फिरते हरदम,
खुद झांकेंगे तब क्या होगा ?

 

40 टिप्‍पणियां:

  1. चना चबा डालेंगे सब
    मिल

    चना राजमा न बन सकेगा

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  2. सवाल में ही जवाब छुपे हुए हैं ...
    बहुत ही खूब |

    सादर |

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  3. लिए आइना फिरते हरदम,
    खुद झांकेंगे तब क्या होगा ?
    ..........बहुत खूब, लाजबाब !

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  4. संतोष त्रिवेदी को मैं सरल ह्रदय समझता हूँ ...

    यह पोस्ट इस कथन से मेल नहीं खाती
    :(

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    1. सतीश जी,
      मैं तो सरल ह्रदय हूँ पर समाज की दुष्प्रवृत्तियों पर हमारा ज़ोर नहीं है ।
      ....आप इसमें राजनीति से लेकर समाज व सृजन की झलक देख सकते हैं ।

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  5. बेहतरीन.....
    आखरी पंक्तियाँ विस्फोटक...

    सादर
    अनु

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  6. ऊर्जा धार देती है और धार से ऊर्जा प्राप्त होती है।

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    1. लगता है कमेंट को विस्तार देना पड़ेगा। लीजिए अब कमेंट को यूँ पढ़िेये...

      आपकी ऊर्जा आपकी रचना को धार देती है। रचना की यह धार आप पर उलट कर प्रहार करती है। फिर इसी धार से आप ऊर्जा प्राप्त करते हैं। लगता है यह चक्कर चलता रहेगा।:)

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    2. यह धार का शून्‍यकाल है

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  7. रचना जब विध्वंसक हो,
    साहित्य-सृजन तब क्या होगा ?.... विध्वंसक सोच कभी भी सृजन नहीं कर सकते

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  8. उत्कृष्ट प्रस्तुति शुक्रवार के चर्चा मंच पर ।।

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  9. रचना में सरल हृदय की जटिलता नज़र आ रही है . :)

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  10. विध्वंसक-निर्माण का, नया चलेगा दौर ।

    नव रचनाओं से सजे, धरती चंदा सौर ।

    धरती चंदा सौर, नए जोड़े बन जाएँ ।

    नाला नदी समाय, कोयला कोयल खाएं ।

    होने दो विध्वंस, खुदा का करम दिखाते ।

    धरिये मन संतोष, नई सी रचना लाते ।।

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    1. ....यही प्रयास है रविकर जी,
      आभार ।

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    2. नदियाँ चढ़ें पहाड़, कोयला कोयल खाएं

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    3. रविकर जी अगर यह कर दें कि कोयला कौए खायें तो ?

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  11. उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  12. हमारे बड़े भाई एवं पूज्य श्री सतीश सक्सेना ने इसी काफिये पर शायद बहुत पहले एक गीत लिखा था... आज आपकी कविता को पढते हुए बस उन्हीं की याद आती रही.. बहुत सुन्दर!!

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    1. ...अच्छा है इसी बहाने विशुद्ध गीतकार की याद तो आई !

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  13. चलिए सलिल भाई, सतीश जी के कथन से न मेल मिले परंतु उनके गीत के काफिये से तो मिलीभगत हो ही रही है। जय हो हिंदी ब्‍लॉगिंग की।

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  14. है क्या पास में करने को
    रचना को अगर कोई फोड़ने
    को जा रहा हो
    विध्वंसक बना रहा हो
    चुप रहते हों जहाँ सभी
    वहाँ एक शब्दों का बम
    कहीं बना रहा हो
    दिखता नहीं फिर भी
    कहीं कोई मरता हुआ
    शब्दों के तीर कोई
    कितना ही चला रहा हो !

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  15. विचारात्‍मक भाव लिए हर पंक्ति... आभार

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  16. लिये आईना घूमेंगे तो
    शरमा जायेंगे और क्या होगा ।
    जबरदस्त प्रस्तुति ।

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  17. सही प्रश्न उठाती ओजपूर्ण रचना |
    कृपया इस समूहिक ब्लॉग में आए और इस से जुड़ें|
    काव्य का संसार

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  18. लिए आइना फिरते हरदम,
    खुद झांकेंगे तब क्या होगा ?

    सामने दर्पण के जब तुम आओगे ,
    अपनी करनी पे बहुत पछताओगे .

    बहुत बढ़िया रचना हर पंक्ति एक चित्र उकेरती है इसका उसका ...

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  19. यह रचना तो हिट हो गयी आपकी !

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  20. chehara to vo ab apna dekhte nahi, bs aayeeno pe ungli uthate hai

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  21. लिए आइना फिरते हरदम,
    खुद झांकेंगे तब क्या होगा ?

    ....वाह! लाज़वाब प्रस्तुति...

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  22. वाह...हर पंक्ति शानदार है....
    पहली पंक्ति से --
    लिए आइना फिरते हरदम,
    खुद झांकेंगे तब क्या होगा ?

    लेकर अंत तक...

    जब चुप्पी इतनी क़ातिल है,
    लब खोलेंगे तब क्या होगा ?

    शानदार!!

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  23. क्या खूब!
    आखिरी पंक्तियाँ तो बेहतरीन हैं..

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  24. रचना जब विध्वंसक हो,
    साहित्य-सृजन तब क्या होगा ?
    बहुत खूब!

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