13 फ़रवरी 2012

उनका है हर दिन बसंती !

आज से पहले न था
दिल में ,नहीं बाज़ार में ,
बौरा गया हर आदमी
अब अचानक प्यार में !!(१)
साभार: वेलेंटाइन डे

साल भर तकते रहे
हम निगाहे-यार में ,
एक भी कोना न पाए
उनके प्रेमागार में !!(२)

आज के दिन देख लें
हुस्न की तलवार में
धार कितनी है बची,
जाती हुई बहार में !!(३)

फूल कुछ मुरझा गए हैं
इंतज़ार-ए-यार में ,
एक दिन का प्रेम-उत्सव,
लुट गया व्यापार में !!(४)

उनका है हर दिन बसंती
हमें 'राशनिंग ' प्यार में ,
अच्छा है दिन एक बीते
बरस नहीं,मनुहार में !!(५)

20 टिप्‍पणियां:

  1. सही समीक्षा की है कविता में!

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  2. मस्त है। शुरू में ही कुछ खटक रहा है..

    आज से पहले न था
    दिल में ,नहीं बाज़ार में

    कहना क्या चाहते हैं?

    आज से पहले तो था
    दिल में, नहीं बाजार में

    या..

    आज से पहले न था
    दिल में न ही बाज़ार में

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    1. पाण्डेय जी ,मेरा यहाँ यह कहने का आशय यही है कि आज से पहले न दिल में और न बाज़ार में प्रेम ज़ोर मार रहा था,अनायास इस एकदिनी मौसम में उग आया है !इसीलिए दिल के आगे कॉमा लगाके दोनों बातों को यक-सा करने की कोशिश की है !

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    2. जो नहीं कविता हुई अब प्यार के व्यापार में
      टीपना अपना कठिन इस टिप्पणी के वार में
      लेके अपना गुरूज भाला जो देविंदर चल पड़े
      कांपने ब्लागर लगे उनकी हर एक हुंकार में

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    3. अली सा..

      अरे रे रे..काहे शर्मिंदा कर रहे हैं! कोई हुंकार नहीं..। हम तो संदेह व्यक्त कर अपनी समझ बढ़ा रहे हैं। ब्लॉगिंग का यही तो सबसे बड़ा लाभ है कि तत्काल लिखे पर प्रतिक्रिया मिल जाती है और संदेह मिट जाता है। बस शर्त इतनी सी है कि प्रश्न स्वस्थ मन से हो और उत्तर भी खुल कर आये।

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    4. संतोष जी..

      तब तो मेरे खयाल से आपको ऐसे ही लिखना था...

      आज से पहले न था
      दिल में न ही बाज़ार में

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    5. बिलकुल दुरुस्त ! आभार आपका !

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  3. सुन्दर अभिव्यक्ति,भावपूर्ण.
    आभार

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  4. ये किस पर और किसके लिए है ...जो कहकर खिसक लिए हैं!

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  5. अवसर की है आज प्रतीक्षा..वर्ष व्यर्थ हो निकल रहा है।

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  6. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  7. फूल कुछ मुरझा गए हैं
    इंतज़ार-ए-यार में ,
    एक दिन का प्रेम-उत्सव,
    लुट गया व्यापार में !!(४)

    अच्छा व्यंग है ...बाजारवाद ने न जाने किस किस किस्म के दिन बना दिये हैं :):)

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  8. बहुत ही सुन्दर,
    बहुत ही बेहतरीन रचना है....

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  9. बहुत सुंदर और सटीक अभिव्यक्ति..

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  10. फूल कुछ मुरझा गए हैं
    इंतज़ार-ए-यार में ,
    एक दिन का प्रेम-उत्सव,
    लुट गया व्यापार में

    बहुत सुंदर

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  11. सच में अचानक ही लोगों को एक दिन प्रेम याद आता है। प्रेम तो एक एहसास है, आजकल लोग उसे बाजार में तलाशते हैं। अच्छी कविता संतोष जी।

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  12. हौसला-अफ़जाई के लिए सभी साथियों का आभार !

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    1. फूल कुछ मुरझा गए हैं
      इंतज़ार-ए-यार में ,
      एक दिन का प्रेम-उत्सव,
      लुट गया व्यापार में !!(४)

      ये कटाक्ष है या मन के भाव ...
      प्रेम करने वालों के लिए तो हर दिन वेलेंटाइन ही होता है ...

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