पहले बता चुका हूँ कि ब्लॉगिंग का विधिवत श्रीगणेश प्रवीण त्रिवेदी जी के मार्ग-निर्देशन में हुआ.इसके बाद रफ़्ता-रफ़्ता यह सफ़र शुरू हुआ.इस दरम्यान मैंने कई ब्लॉग्स झाँके,टटोले और कहीं टिके भी ! मेरे ब्लॉग पर प्रवीण पाण्डेय जी का आना उल्लेखनीय रहा.मैं इस वज़ह से उनके ब्लॉग पर पहुँचा और बिलकुल अलग अंदाज़ ,स्टाइल का अनुभव महसूसा ! प्रवीण जी का ,हर टीप का उत्तर देना ,उन्हीं से सीखा,बाद में उन्होंने यह कर्म बंद कर दिया तो अपुन ने भी. अब हर टीप के बजाय ज़रूरी टीप का ही उत्तर देता हूँ !उन्होंने एक नवोदित-ब्लॉगर को जिस तरह नियमित रूप से (बिला-नांगा किये ) सहयोग किया ,इसका बहुत आभारी हूँ !
इस बीच ई पंडित से भी यदा-कदा तकनीक के बारे में बातें होती रहीं.निशांत मिश्र से भी परिचय हुआ .ज़बरदस्त ब्लॉगर अजय कुमार झा से भी संपर्क हुआ और मुलाक़ात हुई ! डॉ. अमर कुमार जैसे वरिष्ठ भी मेरे ब्लॉग पर आकर आशीर्वाद दे गए,जिससे बड़ी प्रेरणा मिली .इसी मिलने-मिलाने के क्रम में भाई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी से विशेष जुड़ाव हुआ और कई मुलाकातें भी !भाई अमरेन्द्र के संपर्क से श्रीयुत अनूप शुक्ल जी (फुरसतिया) से संपर्क सधा जो आगे जाकर एक क्रान्तिकारी घटना सिद्ध हुई ! मुझे अविनाश वाचस्पति जी से भी विशेष स्नेह मिला,इंदु पुरी जी जैसी लौह-महिला (असली वाली ) ने भी बड़ी शाबाशी दी.इन सबका भी विशेष आभार !
जैसा मैंने बताया कि फुरसतियाजी के माध्यम से जो संपर्क और जुड़ाव मुझे हुआ वाक़ई में उसने मेरी ब्लॉगिंग की सोच,शैली और रंग सब पर अहम् असर डाला.पहले मैंने ब्लॉगिंग को शौक़िया शुरू किया था बिलकुल श्वेत-श्याम की पुराने ज़माने की टीवी-स्क्रीन जैसा,पर उस एक संगत ने ब्लॉगिंग में कई तरह के रंग भरे और इसकी सेहत भी दुरुस्त करी ! औपचारिक लेखन से शुरुआत करने वाले एक नए कुदाड को ब्लॉगिंग के अखाड़े का एक खाया-पिया पट्ठा बनाने में इस गुरू ने अहम् रोल अदा किया.ये हमारे आदरणीय और हर कदम पर प्रोत्साहित करने वाले और कोई नहीं ब्लॉग-जगत के 'मर्द-ब्लॉगर' डॉ. अरविन्द मिश्र जी हैं.उनसे प्राप्त हुए अनुभव और बदलाव को बताने से पहले मैं यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि ब्लॉगिंग कोई अखाड़े का मैदान नहीं है और हम यहाँ कुश्ती लड़ने नहीं आये हैं,बल्कि हमारा प्रशिक्षण कुछ ऐसा हुआ कि हम बिना नफ़ा-घटा सोचे ,अपने भावों को निर्भीकता से प्रकट कर सकें !
जब मिश्रजी से हमारा संपर्क हुआ तो वह भी अप्रिय प्रसंग से ,पर बाद में तो हम ऐसे घुल-मिल गये कि हमने आपसी बोलचाल में औपचारिकता को भी तिलांजलि दे दी .मेरी बोलचाल में 'सुनो,देखो,चलो,करो...'आदि शब्द बैसवारा के अपने सहज-स्वभाव से उत्पन्न हैं,पर मिश्राजी को यह कतई नागवार गुजरा और इतना कि इस बहाने उन्होंने मेरा ''प्रमोशन ' भी कर दिया.मिश्राजी ने मुझे लिखने का ऐसा मन्त्र दिया कि ब्लॉगिंग मेरा नशा बन गया.कई पोस्टें उनकी प्रेरणास्रोत रहीं.उनके संपर्क में आने पर दोस्त अधिक और दुश्मन कम (बस दो,कृपया नाम न पूछियेगा) मिले.सतीश सक्सेना जी ,अनुराग शर्माजी , डॉ.दराल , देवेन्द्र पाण्डेय जी (बेचैन आत्मा ),पाबलाजी और अपने अली साहब जैसे वरिष्ठ ब्लॉगर उन्हीं के संसर्ग में मिले !
जो सबसे ज्यादा बात मुझे प्रभावित करती है वह यह की मिश्राजी का ब्लॉग केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है.यहाँ लेख के बाद बक़ायदा एक लम्बा संवाद चलता है जो कई बार बड़ा रुचिकर लगता है.दूसरी जगह इस वज़ह से लोग शायद ही बार-बार जाते हों कि अब 'इस' कमेन्ट का क्या उत्तर आया ! क्वचिदन्यतोsपि महज़ एक ब्लॉग नहीं बल्कि भरा-पूरा शिक्षण-संस्थान है,जहाँ सीखने वाले को अपनी भावनानुसार हर तरह की सीख दी जाती है.उनके पास ऐसा 'मसाला' है जिसे वे अपनी पोस्ट में तड़का देकर लंबे संवाद की नींव रख देते हैं !उनके लेखन में तंज,चिकोटी और चुटकी तीनों का भरपूर सम्मिश्रण है !
मैंने जो काम शौकिया शुरू किया था उसे दीवानगी की हद तक अरविन्दजी ने परवान चढ़ाया,जिसके लिए हमें 'घर' से शिकायत भी मिलती रहती है,पर अब यह सब मेरी रूटीन में आ चुका है.यह ऐसा अनोखा संपर्क है कि जिसमें किसी से मिले बिना ही आप उसके इस हद तक दीवाने हो जाएं ! अमूमन हमारे शौक भी एक जैसे हैं.मेहंदी हसन और मुन्नी बेगम के हम जहाँ कद्रदान हैं,वहीँ मिश्राजी इनके बड़े वाले 'फैन' ! हाँ ,अभी एक चीज़ से हम महरूम हैं.अभी मिश्राजी ने मुझे दोस्ती के खिताब से नहीं नवाज़ा है,इस पर वो कहते हैं कि इसका लाइसेंस केवल सतीश सक्सेना जी और अली साब के ही पास है. मैं फिर सोचता हूँ कि जिस तरह वे मुझसे घुलमिल कर बातें करते हैं,मेरी नालायकियों को नज़र-अंदाज़ करते हैं,वह दोस्ती के सिवा क्या हो सकता है ?बिलकुल 'गुन प्रकटे अवगुननि दुरावा' की तर्ज़ पर !
मुझे कई बार लगता है कि क्या इस आभासी-दुनिया में मात्र लिखने-लिखाने से भी कोई इतना अपना बन जाता है जो किसी की लेखन-शैली में मूलभूत अंतर ला देता है.अब मैं कहीं ज़्यादा आत्मविश्वास से कम्प्यूटर के की-बोर्ड से छेड़छाड़ करता हूँ,सहज महसूस करता हूँ,और जो बात सबसे मार्के की है कि खूब निचो-निचो के रस पीता हूँ ,मौका मिलते ही लेखों को पढता और टिपियाता हूँ.
ब्लॉग-जगत ऐसे ही अक्खड और फक्कड ढंग से अलख जगाने वाले लोगों की वज़ह से जिंदा और रस-युक्त है,नहीं तो इसे गंदला और मटमैला करने वालों की भी गिनती कम नहीं है. अरविन्द मिश्र जी से ,हो सकता है कई लोग कुछ बातों में असहमत हों,पर उनका ब्लॉग-जगत में होना हम जैसे प्रशंसकों से ज़्यादा उनके लिए अपरिहार्य है ! वे हैं तो वस्तुतः विज्ञानी लेकिन मानव-मनोविज्ञान पर उनकी ज़बरदस्त पकड़ है ! विज्ञान का उनका अलग से विज्ञान-ब्लॉग है !
मेरी ब्लॉगिंग को जहाँ प्रवीण त्रिवेदी जी ने ककहरा सिखाकर शुरू किया,उसे आदरणीय मिश्रजी ने परवान चढ़ाया,उसमें रंग मिलाया !अपने इस गुरू को सादर नमन और शुभचिंतक दोस्त को प्रेमालिंगन !
* अरविन्द मिश्रजी का चित्र उनकी घोर-आपत्ति के बाद बदला गया,क्योंकि उनको आशंका थी कि कुछ लोग उसे देखकर बिदक सकते हैं.
*जब मिश्र जी के चित्रों पर इतना कौतूहल हो रहा है ,सो हम यहाँ पर लिंक दे रहे हैं,जिससे दर्शनार्थी कृतार्थ हो लें !
इस बीच ई पंडित से भी यदा-कदा तकनीक के बारे में बातें होती रहीं.निशांत मिश्र से भी परिचय हुआ .ज़बरदस्त ब्लॉगर अजय कुमार झा से भी संपर्क हुआ और मुलाक़ात हुई ! डॉ. अमर कुमार जैसे वरिष्ठ भी मेरे ब्लॉग पर आकर आशीर्वाद दे गए,जिससे बड़ी प्रेरणा मिली .इसी मिलने-मिलाने के क्रम में भाई अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी से विशेष जुड़ाव हुआ और कई मुलाकातें भी !भाई अमरेन्द्र के संपर्क से श्रीयुत अनूप शुक्ल जी (फुरसतिया) से संपर्क सधा जो आगे जाकर एक क्रान्तिकारी घटना सिद्ध हुई ! मुझे अविनाश वाचस्पति जी से भी विशेष स्नेह मिला,इंदु पुरी जी जैसी लौह-महिला (असली वाली ) ने भी बड़ी शाबाशी दी.इन सबका भी विशेष आभार !
जैसा मैंने बताया कि फुरसतियाजी के माध्यम से जो संपर्क और जुड़ाव मुझे हुआ वाक़ई में उसने मेरी ब्लॉगिंग की सोच,शैली और रंग सब पर अहम् असर डाला.पहले मैंने ब्लॉगिंग को शौक़िया शुरू किया था बिलकुल श्वेत-श्याम की पुराने ज़माने की टीवी-स्क्रीन जैसा,पर उस एक संगत ने ब्लॉगिंग में कई तरह के रंग भरे और इसकी सेहत भी दुरुस्त करी ! औपचारिक लेखन से शुरुआत करने वाले एक नए कुदाड को ब्लॉगिंग के अखाड़े का एक खाया-पिया पट्ठा बनाने में इस गुरू ने अहम् रोल अदा किया.ये हमारे आदरणीय और हर कदम पर प्रोत्साहित करने वाले और कोई नहीं ब्लॉग-जगत के 'मर्द-ब्लॉगर' डॉ. अरविन्द मिश्र जी हैं.उनसे प्राप्त हुए अनुभव और बदलाव को बताने से पहले मैं यहाँ यह स्पष्ट कर दूँ कि ब्लॉगिंग कोई अखाड़े का मैदान नहीं है और हम यहाँ कुश्ती लड़ने नहीं आये हैं,बल्कि हमारा प्रशिक्षण कुछ ऐसा हुआ कि हम बिना नफ़ा-घटा सोचे ,अपने भावों को निर्भीकता से प्रकट कर सकें !
जब मिश्रजी से हमारा संपर्क हुआ तो वह भी अप्रिय प्रसंग से ,पर बाद में तो हम ऐसे घुल-मिल गये कि हमने आपसी बोलचाल में औपचारिकता को भी तिलांजलि दे दी .मेरी बोलचाल में 'सुनो,देखो,चलो,करो...'आदि शब्द बैसवारा के अपने सहज-स्वभाव से उत्पन्न हैं,पर मिश्राजी को यह कतई नागवार गुजरा और इतना कि इस बहाने उन्होंने मेरा ''प्रमोशन ' भी कर दिया.मिश्राजी ने मुझे लिखने का ऐसा मन्त्र दिया कि ब्लॉगिंग मेरा नशा बन गया.कई पोस्टें उनकी प्रेरणास्रोत रहीं.उनके संपर्क में आने पर दोस्त अधिक और दुश्मन कम (बस दो,कृपया नाम न पूछियेगा) मिले.सतीश सक्सेना जी ,अनुराग शर्माजी , डॉ.दराल , देवेन्द्र पाण्डेय जी (बेचैन आत्मा ),पाबलाजी और अपने अली साहब जैसे वरिष्ठ ब्लॉगर उन्हीं के संसर्ग में मिले !
जो सबसे ज्यादा बात मुझे प्रभावित करती है वह यह की मिश्राजी का ब्लॉग केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं है.यहाँ लेख के बाद बक़ायदा एक लम्बा संवाद चलता है जो कई बार बड़ा रुचिकर लगता है.दूसरी जगह इस वज़ह से लोग शायद ही बार-बार जाते हों कि अब 'इस' कमेन्ट का क्या उत्तर आया ! क्वचिदन्यतोsपि महज़ एक ब्लॉग नहीं बल्कि भरा-पूरा शिक्षण-संस्थान है,जहाँ सीखने वाले को अपनी भावनानुसार हर तरह की सीख दी जाती है.उनके पास ऐसा 'मसाला' है जिसे वे अपनी पोस्ट में तड़का देकर लंबे संवाद की नींव रख देते हैं !उनके लेखन में तंज,चिकोटी और चुटकी तीनों का भरपूर सम्मिश्रण है !
मुझे कई बार लगता है कि क्या इस आभासी-दुनिया में मात्र लिखने-लिखाने से भी कोई इतना अपना बन जाता है जो किसी की लेखन-शैली में मूलभूत अंतर ला देता है.अब मैं कहीं ज़्यादा आत्मविश्वास से कम्प्यूटर के की-बोर्ड से छेड़छाड़ करता हूँ,सहज महसूस करता हूँ,और जो बात सबसे मार्के की है कि खूब निचो-निचो के रस पीता हूँ ,मौका मिलते ही लेखों को पढता और टिपियाता हूँ.
डॉ. अरविन्द मिश्र |
मेरी ब्लॉगिंग को जहाँ प्रवीण त्रिवेदी जी ने ककहरा सिखाकर शुरू किया,उसे आदरणीय मिश्रजी ने परवान चढ़ाया,उसमें रंग मिलाया !अपने इस गुरू को सादर नमन और शुभचिंतक दोस्त को प्रेमालिंगन !
* अरविन्द मिश्रजी का चित्र उनकी घोर-आपत्ति के बाद बदला गया,क्योंकि उनको आशंका थी कि कुछ लोग उसे देखकर बिदक सकते हैं.
*जब मिश्र जी के चित्रों पर इतना कौतूहल हो रहा है ,सो हम यहाँ पर लिंक दे रहे हैं,जिससे दर्शनार्थी कृतार्थ हो लें !
बढ़िया रोचक सफ़र चल रहा है, हमारा भी सभी से मेल मुलाकात रहा है और अभी भी अच्छा चल रहा है, अभी कुछ दिन पहले पहली बार संजय बेंगानी जी को फ़ोन लगाया तो बोले कि कौन हैं, हमने अपना नाम बताया तो जिस आत्मीयता से उन्होंने बात की, जैसे हम बरसों से एक दूसरे को जानते हों।
जवाब देंहटाएंकिसी भी ब्लॉगर से बात हो, ऐसा लगता है कि बहुत पहले से मुलाकात हो, ब्लॉगिंग ने एक भरा पूरा परिवार दिया है।
वाह जी बल्ले बल्ले
जवाब देंहटाएं...तो अब प्रेमालिंगन का यह सार्वजानिक नुस्खा? -अब हम तो सरे राह धर लिए गए भाई .इतने प्रेम के आगे तो भगवान भी तड़ी बोल जायं मेरी क्या बिसात ? दोस्ती कोई बांड पेपर पर लिख के देने की बात तो नहीं होती ...हाँ 'सखी' बनने वाली दोस्ती हो तो बात दीगर है :)
जवाब देंहटाएंलेकिन ये मेरी चिड़ियाघर वाली फोटो (बहेलिया टोला बनारस) कहाँ से लाकर चेंप दिए महराज? ये तो बड़ी भयावह है -मेरी प्रेमिकाएं अगर बिदकी तो इसका ब्रह्मदोष आप पर ही होगा और आप उसकी भरपाई भी नहीं कर सकते लाख प्रेमालिंगनों के बाद/ बावजूद भी :)
बाकी गहन ब्लागिंग का अभी आपका चसका/नशा नया नया है ..मुआ यह जल्दी उतरता भी है -मेरी सलाह है इसके लिए आप किसी ऐसे ब्लॉगर की चेल्हहाई करते रहिये जिसने कम से कम ६-७ साल से ब्लागिंग के खूटें/खम्बे को कस कर थाम रखा है ,जैसे दूसरों के (अपने नहीं ) अनूप भाई ...उनमें अद्भुत ठहराव शक्ति देखी है हमने ....
इन बातों के दीगर आप एक अप्रतिम प्रतिभा सम्पन्न और सहृदय /मासूम (मेरी तरह :) ) के प्राणी हैं ..ईश्वर आपको बहुविध आनंदित रखें और ब्लागरी को आप एक नया प्रतिमान दें ...आपकी दोस्ती को अब किसी लाईसेंस की जरुरत नहीं ..वह तो जैसे इसी पोस्ट की मुहताज थी .. :)
आमीन!
दिल तो अब भी धड़कता है हर बात पर,
जवाब देंहटाएंक्या करें, उसने साँसें गिन के भेजी हैं।
हैप्पी ब्लॉग्गिंग जी, ब्लॉग, पोस्ट और दोस्ती तीनो सर ताज हैं जी वाह ताज !
जवाब देंहटाएंब्लॉग मर्द की फोटो से बिदकते लोगों के लिए तुलसीदास की एक चौपाई याद आ रही है .... .....परसु मोर अति घोर.
क्षमा भाई साहब एक ठो स्माइली लगाना भूल गया था :)
जवाब देंहटाएंब्लोगिंग का सफर यूँ ही निरंतर चलता रहे ..नशा गहराता रहे :)
जवाब देंहटाएंसफर जारी रहना चाहिए ..
जवाब देंहटाएंमिलते रहेंगे लोग !!
@अरविन्द जी खुले-आम आलिंगन दोस्तों के ही बीच होता है,एक-आध अपवाद छोड़कर !सखी वाला भाव आप को शायद ज्यादा सूट करता है :-)
जवाब देंहटाएंरही बात चित्र की तो वह हमने बदल दिया है पर 'लुक 'तो आप ही बदलोगे :-)
@ प्रवीण पाण्डेय जी सवा ' सेर' जी !
जवाब देंहटाएं@ संजीव जी कभी-कभी तो मिश्र जी का चित्र हमें भी डराता है :-)
इतनी देर से आया कि पहली वाली देख न पाया।
जवाब देंहटाएंमिश्र जी की कृपा से अपन भी वरिष्ठ ब्लॉगर में शुमार हो गये!
अंतर्जाल ज्ञान का भंडार है। शिष्य में सीखने की जैसी प्रवृत्ति होगी वैसी ही सोहबत वह पकड़ेगा। यह कोई निर्धारित क्लास तो है नहीं कि उसी गुरू के पास जाना है, उसी कक्षा में पढ़ना है। गुरू द्रोण को पाने के लिए एकलव्य सरीखा मन होना जरूरी है। अंतर्जाल से कुछ सीख पाने, गुणी बन जाने के लिए गुरू कम, शिष्य की ही श्रेष्ठता सिद्ध होती है। विनम्रता और गुरू श्रेष्ठ का भाव रखना अपन का पुनीत कर्तव्य तो बनता ही है।
क्वचिदन्यतोsपि महज़ एक ब्लॉग नहीं बल्कि भरा-पूरा शिक्षण-संस्थान है,जहाँ सीखने वाले को अपनी भावनानुसार हर तरह की सीख दी जाती है.उनके पास ऐसा 'मसाला' है जिसे अपनी पोस्ट में तड़का देकर लंबे संवाद की नींव रख देते हैं !उनके लेखन में तंज,चिकोटी और चुटकी तीनों का भरपूर सम्मिश्रण है !
...यह बहुत मार्के की बात कही है आपने। यहां लोग अपने मन का उगल कर चले जाते हैं और बाद में सोचते हैं कि अरे मैं चुप ही रहता तो क्या चला जाता! यह मिश्र जी के लेखन का चमत्कार ही है कि वे सभी से उसके मन की बातें लिखवा ही लेते हैं। मेरे जैसे संकेतों में अपनी बात कह कर कन्नी काट जाने वालों से भी।
...अब विराम देता हूँ। आज तो आपने भी मुझसे काफी कुछ लिखवा लिया।
ये सफर यों ही चलता रहे और नए -नए रिश्ते भी जुडते जाएँ ,यही हमसब की कामना है ..
जवाब देंहटाएंअरविन्द जी उन चन्द चिट्ठाकारों में हैं जो हमेशा मेरी चिट्ठियों पर टिपप्णी कर अपनी बात रखते हैं। उनके बारे में जान कर अच्छा लगा।
जवाब देंहटाएं@ देवेन्द्र जी जो चित्र हटाया है वह उनकी एक पोस्ट का है,हमने उसे इसलिए लगाया था कि कोई 'अलाय-बलाय'यहाँ आने की हिम्मत न करे !
जवाब देंहटाएंआप पहले से ही वरिष्ठ हैं और खूब व बढ़िया लिखते हैं !
ब्लॉगिंग के अपने सफ़र पर आपने उचित, सटीक और स्पषटता से प्रकाश डाला है। बेहद तरतीब और तरक़ीब से अपनी बात रखी है। आपकी लेखन शैली प्रभावित करती है।
जवाब देंहटाएं@ संतोष जी १ ,
जवाब देंहटाएंप्रवीण पाण्डेय जी की टिप्पणियां पढते हुए अक्सर ये ख्याल आता रहा कि जैसे कोई बच्चा जल्दी जल्दी ढेर सारे बच्चों के पास दौड़ दौड़ कर जाये और कंटाप पे देके चलता बने :)
@ संतोष जी २ ,
आपने जितने भी लिंक दिए हैं वे सभी हमारे प्रिय ब्लागर्स हैं पर निशांत जी का ट्रेक हमें बेहद पसंद है ! एक बात जो पल्ले नहीं पड़ी तनिक समझाइयेगा कि लौह तत्व की सत्यता पर आपने इतना जोर क्यों दिया है :)
@ संतोष जी ३ ,
प्रेमालिंगन के सौजन्य से आपके एक वक्तव्य का अर्थ जानने की इच्छा प्रबल है हो सके तो निहितार्थ की व्याख्या कीजियेगा ! आपने अरविन्द जी को उद्धृत करते हुए कहा कि ...
"सतीश सक्सेना जी,अनुराग शर्माजी,डॉ.दराल,देवेन्द्र पाण्डेयजी(बेचैन आत्मा),पाबलाजी और अपने अली साहब जैसे वरिष्ठ ब्लॉगर उन्हीं के संसर्ग में मिले"
अब ये 'संसर्ग' बोले तो ? :)
@ संतोष जी ४ ,
वरिष्ठ ब्लागर कहके आपने हमें कहीं का ना छोड़ा :)
इसलिए थोड़ा कहा बहुत समझियेगा :)
@ अली साहब
जवाब देंहटाएं१)प्रवीण पाण्डेय जी वाले नज़रिए पर ज़्यादा सही होगा कि वही कुछ कहें पर मैं जहाँ तक समझता हूँ कि बहुत सारी पोस्टों पर टीपने के बावजूद वे सब जगह पढ़ कर ही टीप देते हैं और बिलकुल नपे-तुले शब्दों में.कम शब्दों में अधिक कहना विशेषज्ञता ही कही जायेगी !
२)निशांत जी का ट्रैक बिलकुल ठीक है,अपन भी कभी-कभार शांति की तलाश में विचरने पहुँच जाते हैं !
३)'संसर्ग' का बिलकुल सीधा अर्थ लगाइए ,संतों की संगति !
४)आपको लिखने में वरिष्ठ कहा है,इससे आपके किसी को चाहने के अधिकार या औचित्य पर सवालिया निशान नहीं लगता है !
सच कहते हो संतोष जी ! स ब्लोगिंग ने मुझे भी एक परिवार दिया है.हिंदी की फिल्म में एक दो जन मेले में बिछुड़ते हैं.यहाँ तो लगता है पूरी ट्रेन ही कुम्भ के मेले में बिछुड गई थी अपनी.एक एक करके मिल रहे हैं अब सब.अपनों की फेहरिस्त में मैं भी हूँ जानकर खुशी हुई.और...ये जो उपमा,विशेषण मुझे दिया है मैं उसके कत्तई लायक नही .बाबु! यहाँ तो कोई गाना सुन लूँ या कोई माथे पर हाथ फेर दे.कृष्ण की बंसी का फोटो ही दिखा दे ये आंसू नही रुकते.काहे की लोह-महिला?
जवाब देंहटाएंअब अली भाई जैसे हम को ठोक पीट बजकर देखेंगे कि ई मिटटी की माधो कहाँ से लोहे की है. :P
हम तो भाग छूटेंगे भैया.
सन्तु दा ! आप खुद अच्छे इंसान हो बाबु! मालूम?
जे बात । मर्दे हमको जबरदस्त कह दिए हैं पहिले ही तो का कहें आपको , अरे आप जबरार ब्लॉगर हैं तब्बे हम जबरदस्त हैं । हैप्पी ब्लॉगिंग है जी हैप्पी वैरी हैप्पी
जवाब देंहटाएंअरविंद मिश्र जी की इस तस्वीर पर कोई प्रतिक्रिया?
जवाब देंहटाएंआज तो मुझे डॉ अरविन्द मिश्र से जलन हो रही है ....
जवाब देंहटाएंकाश हमें भी कोई संतोष त्रिवेदी जैसा दिलदार दोस्त मिले , जहाँ तक लाइसेंस का सवाल है अरविन्द जी के अगर आप मित्र लायक नहीं तो और कोई नहीं ....
बधाई आप दोनों कि मित्रता को ! आपकी श्रद्धा को नमन करता हूँ !
@अरविंद मिश्र जी की इस तस्वीर पर कोई प्रतिक्रिया?
जवाब देंहटाएंभयंकर ....
अरविन्द भाई ऐसे तो नहीं हैं .....
:-))
@ इंदु पुरी जी ,
जवाब देंहटाएंअरे नहीं :)
आप नहीं , संतोष जी से छेड़छाड़ है :)
उनसे पूछियेगा ज़रूर !
:) [छपने के बाद भी ग़ायब हो रही टिप्पण्यों को सन्क्षिप्ततम रखने की कला सीख रहा हूँ, जैसे जेबकतरी के लिये प्रसिद्ध नगरों की भीड़ भरी बस यात्राओंके दौरान बटुए में कम-से-कम पैसे रखने का प्रयास होता था]
जवाब देंहटाएंआपके पोस्ट पर आकर अच्छा लगा । मेरे नए पोस्ट शिवपूजन सहाय पर आपका इंतजार रहेगा । धन्यवाद
जवाब देंहटाएं@ इन्दुजी व झा साब का विशेष स्नेह मिलता है,आभार !
जवाब देंहटाएं@ राहुल जी ,नया चित्र भी मिश्रजी को विचित्र लग रहा है शायद ! आप ही बताएं आपको कैसा लग रहा है ?
@सतीश सक्सेना जी आपको मिश्र जी से जलन नहीं बल्कि यह अहसास ज़रूर हो रहा होगा कि आपका मित्र-चयन कितना उचित रहा.मित्र का मित्र वैसे भी मित्र होता है इस नाते भी हम आपके मित्र ठहरे,बकिया,गुरुमंत्र देने का नुस्खा ज़रूर मिसिरजी से पूछ लीजियेगा !
चित्र के बारे में कई तरह से सवाल उठ रहे हैं,हमने तो सुना है कि आपके पास एक पूरा अल्बम है मिश्रजी के चित्रों का,सो उसमें से एक-आध हमें भी ठेलियेगा !
स्नेह के लिए आपका आभार !
@ अली साब ई ल्यो, अब हम भी ज़नाब छेड़ने की चीज़ हो गए ! अरे साब ! कोई गज़ल वगैरह छेड़ो तो कोई बात बने !
जवाब देंहटाएं@ अनुराग शर्माजी पिछले कुछ दिनों से ब्लॉगर में काफी हलचल मची हुई है !
बहुत बढ़िया पोस्ट ! उम्दा प्रस्तुती!
जवाब देंहटाएंaapke vichar se poore iqtafaq...........basss.....
जवाब देंहटाएंkabhi 'karntikari' ghatna ka zikra ho jai.....
pranam.
संतोष जी , आपका ब्लोगिंग का सफ़र पढ़कर अच्छा लगा । हमें तो आप यू पी वालों की नौक झोंक और चहुलबाज़ी बहुत मज़ेदार लगती है । इस बहाने कुछ नए शब्दों का ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है ।
जवाब देंहटाएंअरविन्द जी का फोटो देखकर डरने की ज़रुरत नहीं । बहुल कोमल हृदय के स्वामी हैं ।
शुभकामनायें ।
मतलब आजकल महाराज .....ब्लॉग्गिंग गाथा लिख रहे! अच्छा है कि अपना मठ बनाने के लिए सभी मठों में पहले माथा टेका जाए ......और सबसे जरूरी बात कि आपने बिस्मिल्लाह हमसे किया .........जाओ महाराज जाओ ........भविष्य के महारथी और मठाधीश बनो ......ब्लॉग्गिंग के इतिहास में आपका नाम भी स्वर्णाक्षरों में दर्ज हो ........आप के भी दस-बीस ब्लॉगर-चेले हों और उनमे हम भी हों ........इससे ज्यादा और का कहें?
जवाब देंहटाएंबचे-खुचे आशीर्वाद और शुभकामनाये उडेलने के लिए फिर लौटते है ......जल्दी ही!!
@ डॉ. दराल शुक्रिया आपका !
जवाब देंहटाएं@ प्रवीण त्रिवेदी सही फ़रमाया हुज़ूर, ब्लॉग-जगत में भी कई मठ सक्रिय हैं और इनके अपने मठाधीश हैं,पर यदि आप स्वेच्छा से इन मठों पर रूचि के अनुसार सीखने आते हैं तो यह बुरा नहीं है.
सौभाग्य से मेरे मठ के मठाधीश में ऐसी कोई 'मठाधीशी-बू' नहीं है.ये अपने शिष्य को सहयोग करने में किसी प्रकार का 'बड़का-ब्लॉगर' का दंभ नहीं पालते !
आप जल्द सक्रिय हों,स्वागत है !
@भैया संतोष जी ,प्रवीण गुरु अकेले ही एक मठ हैं -हमारी चेलहाई तो तनिक बड़ी सी हो गयी है जिसमें भिक्षु भिक्षुनियाँ दोनों हैं !
जवाब देंहटाएंआप पहले वहीं सर नवाया करो क्योकि वे भी मेरे पहले टेक गुरु हैं !
गुरु को नमन !
प्रवीण जी और अरविन्द जी !
जवाब देंहटाएंआप दोनों ही हमारे गुरु हैं, एक तकनीक का दूसरा बिंदास लेखन-शैली का !
आभासी दुनिये के रिश्ते किसी से कम नहीं होते ... इस बात की पुष्टि है आपका ये लेख ...
जवाब देंहटाएं