9 दिसंबर 2011

चार क्षणिकाएँ !

(१ )

भ्रष्टाचार 
मुँह बाए खड़ा है,
हमारी उखड़ती  साँसों को गिनता,
जान के पीछे पड़ा है,
सब्र के आगे अड़ा है !!
साभार:गूगल बाबा 


(२)


नेता 
अब ऐसा विषय है,
सोचने में भी प्रलय है,
कह दिया कुछ जो इन्हें ,
सुकून का अंतिम  समय है,
हर तरफ पहरे हमारे 
और पहरों में भी भय है !!


(३ )


राजनीति
सबकी चहेती,
सबको इसी से प्यार है,
जो गुलाटी मार ले,
वह बची सरकार है !
देश है अब 'सेल ' पर ,
इससे न  सरोकार है ,
व्यापारी को दरकार है,
उसी की पैरोकार है !




(४ )

एक बूढ़े से
क्रांति की उम्मीद में हम
लगातार उसको ताक रहे हैं,
अँधेरी कोठरी में चंद जुगनू लिए 
हम झांक रहे हैं .
रोशनी जब चीरकर घुस आएगी ,
इस अँधेरे की तभी,
सचमुच में शामत आएगी !!






24 टिप्‍पणियां:

  1. कुछ न कुछ निष्कर्ष मिलेगा,
    पीड़ापथ उत्कर्ष मिलेगा।

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  2. वाह , क्रन्तिकारी विचार प्रस्तुत किये हैं ।

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  3. यी बच्चू कब से क्षणों में जीने लगे ...दुष्यंत कुमार का किरदार निभाने का इरादा है क्या ? :)
    छू रहे हैं उसी अर्श को .....

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  4. बहुत खूबसूरत प्रस्तुति |
    बधाई स्वीकारें ||

    जान के पीछे पड़ा है,
    सब्र के आगे अड़ा है !!

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  5. @ क्षणिका १-४ ,
    :)



    टीप से अलग ,
    संतोष जी इससे संक्षिप्त और क्षणिक टिप्पणी नहीं दे पाया :)

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  6. सभी क्षणिकाएं मौजूदा दौर पर सटीक बैठती है .....

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  7. देखन में छोटे लगें पर घाव करें गंभीर ...

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  8. चार क्षणिकाएं : चार क्रिया-प्रतिक्रिया :-

    1. मुंह बाए-सुजाए तो हम खड़े हैं
    भ्रष्‍टाचार वाले तो सबसे बड़े हैं


    2. फिर भी हरा हरा हो गया
    जिसे आप कहते अभय हैं
    वह गहरा और हरा हो गया


    3. राजनीति से करोगे प्‍यार
    तभी तो पीढि़यों को पाओगे संवार
    नेता बन अभिनेता फैलाता अंधकार

    4. जिसे आप जुगनू समझ रहे हैं
    वह हमारी आपकी सबकी आंखें हैं
    जिनमें से लालच चमक रहा है

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  9. चारों ही एक दूसरे को कोहनी मारती हुईं. वाह.

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  10. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ।
    मेरा शौक
    मेरे पोस्ट में आपका इंतजार है
    आज रिश्ता सब का पैसे से

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  11. रोशनी जब चीरकर घुस आएगी ,
    इस अँधेरे की तभी,
    सचमुच में शामत आएगी !!

    खूबसूरत प्रस्तुति |

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  12. अब अक्षणिका...
    (१)
    मृत्युशय्या के निकट जिस भ्रष्टाचार का ज़िक्र है
    उसे हमारे अंदर वाले अपने संबंधी की फ़िक्र है !

    (२)
    नेता को ताने कसने का यही उचित समय है
    भय कैसा ,बंदीगृह में उसका आरक्षण तय है !

    (३)
    सेल को ठेल ज़रा आगे बढ़ो , बात बने
    खेल में उसको हरा आगे बढ़ो ,बात बने !

    (४)
    कब तक बूढ़े कांधों में चढ, मेले की हसरत पालोगे
    अपने बच्चों को देखोगे गर खुद आसमान उठा लोगे !

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  13. @ प्रवीण पाण्डेय आपकी मनोकामना पूर्ण हो !

    @ मिश्राजी दुष्यंत कुमार की कवितायेँ आधुनिक काल की क्रांतिकारी रचनाओं में शुमार हैं....हम तो यूँ ही !

    @ अविनाश जी आपकी चतुर-रचनाएँ अवर्णनीय !

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  14. @ अली साब आपका पहला सन्देश भी बहुत कुछ कहता है ,दूसरी बार 'अक्षणिका' ने तो धमाल ही कर दिया.

    आप भी न ,निराला की तर्ज़ पर नए-अन्ये शब्द गढ़ते जा रहे हैं.'अक्षणिका'का ईजाद भी कुछ इसी तरह का लगता है.पहली बार सुना यह नाम !

    बहुत-बहुत आभार आपका. कई बार आपकी टीप मुख्य पोस्ट पर भारी पड़ती है !

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  15. चारों दम है। चारों से निकली बातों में दम है।

    कई बार :) इसको देखता हूँ तो सोच में पड़ जाता हूँ कि इसकी - कहां गई!:-)

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  16. बढ़िया है सरकार
    आज का अचार!!

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  17. अनुराग जी,राजपूत जी ,काजल जी ,ई पंडित जी ,देवेन्द्र जी और प्रवीण त्रिवेदी जी !

    समझने के लिए आभार !

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  18. इस पोस्ट के लिए धन्यवाद । मरे नए पोस्ट :साहिर लुधियानवी" पर आपका इंतजार रहेगा ।

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  19. संतोष जी ! सभी क्षणिकाएं सुन्दर और सटीक है...

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  20. आपकी चारों क्षणिकाये बहुत सुंदर लगी ,क्या बात है ...बधाई


    मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

    जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
    घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
    मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
    रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

    पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

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  21. सारी क्षणिकाओं में एक तीखा तेवर है, जो हमे सोचने विचारने का खुराक देती है।

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