24 जून 2011

प्रार्थना


हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से,
साभार :गूगल प्रभु
मैं तो कब से आस लगाये बैठा हूँ नट-नागर से !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो इस जीवन के सागर से !!

तेरी ही महिमा से जग का,होता है संचालन,
ऊँच-नीच का भेद भुलाकर करते सबका पालन ,
कर दो कृपा-दृष्टि ऐ भगवन ,अभय-स्वरूपी वर से !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से !!

 सारे जग में खेल है तेरा,तू है कुशल मदारी,
खाली झोली भर दो सबकी ,हे भोले-भंडारी.
मुक्ति दिला दो हे प्रलयंकर,इस शरीर- नश्वर से !

हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से !!




विशेष:अकसर अकेले में गुनगुनाया करता हूँ !
रचना काल:०८/०९/१९९०,फतेहपुर

11 टिप्‍पणियां:

  1. सारे जग में खेल है तेरा,तू है कुशल मदारी,
    खाली झोली भर दो सबकी ,हे भोले-भंडारी.
    मुक्ति दिला दो हे प्रलयंकर,इस शरीर- नश्वर से !

    मनभावन रचना .....!

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  2. हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से


    भाई ये प्रार्थना तो आप सभी के लिए कीजिए।
    यानि हे प्रभु हम सबको पार लगा दो, इस जीवन के सागर से

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  3. सर जी, आजकल अकेले होने का लाभ उठाइये और अपनी रचना को स्वर देकर पोस्ट में लगाइये.

    उत्तम गीत/भजन

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  4. तेरी ही महिमा से जग का,होता है संचालन,
    ऊँच-नीच का भेद भुलाकर करते सबका पालन ,
    कर दो कृपा-दृष्टि ऐ भगवन ,अभय-स्वरूपी वर से !

    हे प्रभु मुझको पार लगा दो,इस जीवन के सागर से !
    bahut aadhyatmak prastuti

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  5. आपके साथ हमने भी इसे गुनगुनाया।

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  6. बहुत खूब, वाकई गुनगुनाने लायक ! !शुभकामनायें आपको !!

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  7. बहुत खूब !
    आपकी प्रार्थना सफल हो .......हाँथ उठाकर यही कामना है ......हमारी !
    जय जय !

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