26 अप्रैल 2013

बदलता मौसम !



दिल्ली का मौसम बदला है।
आदम से शैतान भला है।।
 

तुमने अपना तीर चलाया।
अब तक कितनी बार छला है।
 


खुले-आम घूमते शिकारी।
अपनों से हारी अबला है।।
 


ये मौसम भी बदलेगा ।
घटा घिरी है,पवन चला है।।


 
जाने सब कुछ,फ़िर भी नादाँ
कच्ची उमर ,जुर्म पहला है ।।

 
हम कुछ समझ नहीं पाते
नए ज़माने का मसला है ।।

 
तू उसकी बातों पर मत जा
मछरी ताके ,वो बगुला है ।।

 
छोर आसमां का छू लेंगे
उड़ने को अब दिल मचला है ।।

 
धीरे-धीरे तिमिर छटेगा

कल का दिवस सुनहला है ।।

 




38 टिप्‍पणियां:

  1. इस अंधियारे से मुक्ति मिले, यही आशा है |
    अर्थपूर्ण,समसामयि पंक्तियाँ

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  2. वाह वाह....
    बहुत सुन्दर..
    तू उसकी बातों पर मत जा।
    मछरी ताके ,वो बगुला है ।।
    लाजवाब...
    और आख़री शेर भी बहुत बढ़िया..

    सादर
    अनु

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  3. धीरे-धीरे तिमिर छंटेगा ।
    कल का दिवस सुनहला है ।।.......बहुत आशावान पंक्तियां।

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  4. कुछ ज़्यादा ही तुकबंदी नहीं हो गई ? :)

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    1. ....तुकबंदियों की सम्भावना से ही कवि बने रहने की सम्भावना बनी रहती है :)

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    2. कवि तो अतुकांत भी होते हैं, अलबत्ता शायर को तुक्का ज़रूरी है।

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  5. आखिरी पंक्ति खटक रही है संतोष भाई
    "पहले से कुछ तो सुधरा है !" इस तरह की हो तो फिट लगेगी !

    शुभकामनायें कवि को !

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    1. ...आखिरी पंक्ति ने मुझे भी परेशान किया है।

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  6. इतने पाप किये हैं उसने,
    क्या अगला है क्या पिछला है!
    अब ईमान कहाँ पाओगे,
    मन का सागर छिछला है!
    सही जा रहे हैं माट्साब!!

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  7. घोर तिमिर में आशाओं को पल्लवित करता कवि.....

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  8. इसी उम्मीद में हैं जी .... कि धीरे-धीरे तिमिर छटेगा

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  9. तू उसकी बातों पर मत जा।
    मछरी ताके ,वो बगुला है ।।
    लाख समझाओ कोई नहीं मानता
    बौराया ये जग सारा है!

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  10. दुबारा पढ़ी है , बहुत सुंदर है , बधाई

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