21 दिसंबर 2012

हम मनुष्य हैं अभी !


शुक्र है अभी
कच्चा नहीं निगलते हम मानव-शरीर
मसलते हैं मांसल देह
खरोंचते हैं नाखूनों से
चबाते नहीं हड्डियाँ
पीते नहीं रक्त
भागकर छुप जाते हैं,
इस पहचान से
हम
मनुष्य हैं अभी  !
प्रलय का दिन
निश्चित नहीं है
हम उसे लाते हैं मन-मुताबिक
परमात्मा से नहीं डरते
हमसे  काँपती है मानवता
अपने पंजे फैला लिए हैं हमने ,
शुक्र है अभी
खुला आसमान बचा है
धरती भी नहीं फटी
सूरज चुआ नहीं अपने केन्द्र से
और भूमि-अभिलेखों में
हम मनुष्य हैं अभी !


देवेन्द्र पाण्डेय जी की कविता से प्रेरित होकर

20 टिप्‍पणियां:

  1. नहीं हुआ प्रलय..नहीं होगा यदि हम मनुष्य बने रहें।

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    1. ...आपका विशेष आभार .आपकी कविता पढ़कर ही निकली है यह !

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  2. हमारे देश में मानवता तो बची ही नहीं है।

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  3. देवेन्द्र पांडे की सद्य प्रकाशित ब्लॉग कविता की छाया है यहाँ -
    मनुष्य आज भी बेहतर है दीगर पशुओं से !

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    1. जी,उसी कविता से प्रेरित है यह.मैंने उन्हें बता दिया था पर यहाँ उल्लेख नहीं कर पाया .

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  4. प्रलय का दिन
    निश्चित नहीं है
    हम उसे लाते हैं मन-मुताबिक
    परमात्मा से नहीं डरते
    हमसे काँपती है मानवता

    फिर भी धरती फटी नहीं .... अभी मनुष्य हैं ... तीखी रचना ।

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  5. प्रलय का दिन
    निश्चित नहीं है
    हम उसे लाते हैं मन-मुताबिक
    परमात्मा से नहीं डरते
    हमसे काँपती है मानवता
    अपने पंजे फैला लिए हैं हमने ,
    शुक्र है अभी
    खुला आसमान बचा है
    धरती भी नहीं फटी
    ----------------------ये पंक्तियां परिस्थिति का खूब रोना रोती हैं।

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  6. शुक्र है,
    कि मनुष्य हैं हम,
    बने रहें,
    पतन से बचे रहें।

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  7. प्रलय का दिन
    निश्चित नहीं है
    हम उसे लाते हैं मन-मुताबिक
    परमात्मा से नहीं डरते
    हमसे काँपती है मानवता

    ....आज की सोच का सटीक चित्रण...

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  8. शायद इसी एक उम्मेद पर दुनिया कायम है...

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  9. हम मनुष्य हैं अभी ..... पर कितनी मात्रा में , यह सोचने को मजबूर भी हैं !

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  10. शुक्र है अभी
    खुला आसमान बचा है
    धरती भी नहीं फटी
    सूरज चुआ नहीं अपने केन्द्र से
    और भूमि-अभिलेखों में
    हम मनुष्य हैं अभी !

    वाह ! अति सुन्दर प्रस्तुति ... सादर.

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  11. बेहतरीन,तीखी अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,,,,



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  12. आज विश्‍वास हो गया है कि उम्‍मीद पर दुनिया कायम है। इसमें यम तो है पर वह उम्‍मीद का एक सनातन नियम है।

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  13. इन्सान सिर्फ एक ही डर से डरता है -- मौत के डर से ।
    इसमें कोई रियायत नहीं होनी चाहिए।

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