20 सितंबर 2011

न जाओ सैंया,छुड़ा के बैंया !

आजकल पितर-पक्ष चल  रहे हैं !हिन्दू मान्यताओं के अनुसार कुछ बढ़िया या अच्छे काम इस समय नहीं किये जा सकते ! पर,ब्लॉग-जगत में कुछ ऐसा होने की घनघोर आशंका हो गयी है.इसलिए हम सभी को ऐसा न होने देने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा देना चाहिए !हम तो ब्लॉगिंग में रस और मज़ा लेने आये थे,वह मिलना शुरू ही हुआ था कि इसका मुख्य-तत्व 'मसखरापन'(नौटंकी से तौबा) गायब होने की मुनादी पीट दी गयी है !

ब्लॉग-लेखन में उस समय भयानक कोहराम मच गया जब मसखरेपन ने इस ज़मात से बाहर होने की घोषणा कर दी.जितने भी गंभीर-टाइप के ब्लॉगर हैं उनको तो साँप ही सूँघ गया ! अब लिखने-लिखाने के बाद फ़ुरसत के क्षणों को हम सब लोग कैसे समायोजित करेंगे,यह परेशान करने वाला सवाल उठ खड़ा  हुआ है.

मसखरेपन का सबसे बड़ा कष्ट टीपों को लेकर है.उसका मानना  है कि टीपें इतनी मसखरी और मारक हो गयी हैं कि अब हमारे ऊपर ही भारी पड़ने लगी हैं.अगर ऐसे ही चलता रहा तो पोस्ट में जो 'लौह-तत्व' है ,वह भी बर्फ की  मानिंद ठंडा और कुंद हो जायेगा !इस सबसे बचने के लिए हालाँकि उसने शुरूआती और अहतियाती कदम उठा रखे हैं फिर भी मुँहनोचवा-क़िस्म के लोग अपनी आदत से बाज़ नहीं आ रहे हैं.लौह-तत्व की संरक्षा के लिए बकायदा टीपों को छानने का इंतज़ाम है.इसमें केवल पारिवारिक-सदस्य अपना प्यार ,मनुहार उड़ेल सकते हैं.और हाँ,ज़रुरत के अनुसार पिता,माँ,और भाई की संख्या घटाई-बढ़ाई जा सकती है !


अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई लड़ रहे मसखरेपन ने मचान पर फिर चढ़ाई कर दी है,'सबते कठिन जाति अवमाना' का भी टोटका किया गया  है !उस पर विदेशी-आक्रमण भी लगातार हो रहा है तो कोई उसे छीलने में जोर का अट्टहास लगा रहा है,यह  हम सबके लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए.आखिर जब मसखरेपन का तत्व ही नहीं अस्तित्व में होगा तो हम सिरफिरे और नाकारा लोग अपनी टीपों में धार कैसे ला पाएँगे ?


अभी भी समय है.जिस तरह राजनीति में जबसे 'लालू-तत्व' गायब हुआ है,पत्रकारों और व्यंग्यकारों की कलम   निष्प्राण हो चुकी है,उससे कम गहरा संकट नहीं है इस मसखरेपन का जाना.इसलिए इन बुरे दिनों में इस तत्व को तिलांजलि देने पर हम क्यों तुले हुए हैं ? बार-बार ऊपर  चढ़ने से वह मचान या टंकी जो भी है,धंस जाए ,उसके पहले ही  इस अद्भुत व अनमोल तत्व को बचा लेना चाहिए ! क्या आप तैयार हैं ?



16 टिप्‍पणियां:

  1. @'लालू-तत्व'

    बढिया है.... वैसे ब्लॉग जगत में भी इसका आकाल सा है .

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  2. दीपक बाबा हैं सखे, काहे चिंता खाय |
    लोग टिप्पणी छानते, करकट रहे बराय |

    करकट रहे बराय, उन्हीं की मर्जी बाबू,
    मनमाफिक तो ठीक, नहीं तो करते काबू |

    तब भी दिल की चोट, करे बेमतलब बक-बक |
    अन्तर कर उजियार, जलाते रहिये दीपक ||

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  3. तुमसा न देखा ...बेलौस और दबंग... अच्छा नाम कमाओगे ब्लागिंग में गुरु ...यह आगाज और अंदाजे बयाँ! बलि बलि जाऊं !
    सटीक प्रेक्षण ....और सच कहने की ताकत जो लोगों से तेजी से दूर हो रही है -भैया भैवादी के चलते ..माई बाप के चलते ....दोषत दुश्मन के चलते लोग बस सच से परहेज करते चलते हैं .....
    ब्लॉग जगत खाला का घर न बने इसलिए यह तेवर जरुरी है ......साधुवाद !

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  4. ल जाने क्‍यों एक फिल्‍म का शीर्षक याद आ रहा है- ''जाने भी दो यारों''

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  5. इट इस बेरी खुर्रहट लेखन, आम लालू बोलता, आप बोलता कि लालू-तत्व गायब होने का?, आम नी मानता, ओ लालू-तत्व समथिंग नमकीन होके ब्लागरी में रहेगा, पब्लिक और नमक इस्क का छानेगा। रात भर जागा-जागा। आप को भी तो भाई नींद कहाँ आटा है! :))

    “ देख बतासा लोहे का
    खर्रा ढ़ाँचा लोहे का।
    हमरा साँचा मनई का है,
    ओकर साँचा लोहे का॥”

    लोहे की दुइ परजाति है। १- ढलवा , २- पिटवा ।
    देखना दिलचस्प होगा कि कौन परजाति देखात है? :))

    दै लाम दी की, फिल मिलब!

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  6. आपकी पोस्ट किस सन्दर्भ में लिखी गयी है पता नहीं पर आपकी चिन्तायें जायज हैं।

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  7. नौटंकी से तौबा ?

    'मसखरापन' 'नौटंकी' के अर्थ और अभिप्राय को सुस्पष्ट करने योग्य शब्द नहीं है !

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  8. दीपक बाबा और प्रवीण भाई आपका आभार !


    @Arvind Mishra बनारस वाले बाबा की जिस पर कृपा हो जाये,उसे किस बात की कमी है ! आपने दिल से सच्चाई को पहचाना व उससे मुँह नहीं मोड़ा, इसका आभार !

    @रविकर आपकी तुरन्ता-टीपें हर जगह चर्चित हैं,आभार !

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  9. @Rahul Singh आप किसको जाने की बात कर रहे हैं,मसखरेपन को या मसले को ?


    @अमरेन्द्र भाई ,आपने अपनी बिलकुल अलग शैली विकसित की है,इसका पेटेंटवा करा लीजियेगा नय मुश्किल होयगी !हाँ 'लोहे' से याद आया कि ई लोहा भी अब 'लोही' होइ गवा है !हमरे गाँव-दिहात मा 'लोही' जिद्दी को कहत हैं !आपका बहुतै अभार !

    @ali आप सहिये कह रहे हैं,पर हमको महसूस हुआ कि ई नौटंकी से ही ज़्यादा मसखरापन टपक रहा है,यहिलिये ऐसा लिख दिया! वैसे आप जैसों की ही सुविधा हेतु ( ) वाला विकल्प ही ठीक है !

    @ePandit पंडितजी ,आप इस बवाल को ना ही समझें,अपने तकनीकी-शोध पर ध्यान दें! आभार सहित !

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  10. सच है, लालू जी के बिना मजा तो कम हो गया है,
    विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  11. संरक्षण का नियम है, बस रूप बदलता है बाकी आता-जाता कुछ नहीं है।

    आता है न जाता है मन
    यहीं खडे इतराता है मन

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  12. जीवन में जो स्थिर है ......स्थिर रहने की चेष्ठा में ही रहता है .....और जो गतिमान रहता है ......वह गतिमान बने रहने की जद्दोजहद में लगा रहता है !

    हम आप समझते हैं कि किसी के आने जाने से कुछ अटक जाएगा ........ऐसी खुशफहमियों का क्या करें ...भैये ?
    जय राम जी की !

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  13. भीतर व्यंग्य की धार हो तो लालुओं की कमी नहीं.

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  14. लालूत्व शाश्वत है..कभी कम कभी ज्यादा!!

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