16 सितंबर 2011

टंकी-आरोहण नहीं नौटंकी है यह !

हमने अपने बचपन में नौटंकी का आनंद खूब लिया था. उत्तर प्रदेश की  यह लोकरंजक शैली अब लुप्त प्राय है,पर इसी को फिर से ब्लॉग-लेखन के ज़रिये जिंदा रखने की अद्भुत मिसाल सामने आई है !

ब्लॉग-लेखन में आये हमें अभी ज्यादा अरसा  नहीं बीता.आने का उद्देश्य अपने मन के अन्दर के भावों की सहज अभिव्यक्ति और एक छोटा-मोटा झंडा फहराने का शौक था.शुरू किया तो बहुत ज़्यादा उत्साहवर्धक परिणाम नहीं निकले.दो-चार टीपों तक के लिए तरसना पड़ रहा था,जिसमें अभी भी कोई बहुत उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है और न होने की गुंजाइश दिखती है.हमने भी कुछ 'स्वान्तः सुखाय' और कुछ समाज-हित का भरम समझकर लिखते रहे.

अचानक ही जैसे मेरी तन्द्रा भंग हुई और इसमें ब्लॉग-लेखन का ऐसा चेहरा भी दिखाई दिया जो जिसे किसी भी सूरत में ब्लॉगिंग नहीं कहा जा सकता है.मैंने यह ब्लॉग आरोप-प्रत्यारोप या किसी की व्यक्तिगत निंदा के लिए नहीं बनाया था पर पिछले दिनों ब्लॉग-जगत में कुछ ऐसी हरकतें की जा रही हैं जिन्हें न चाहते हुए भी कहना पड़ रहा है क्योंकि लगातार गलत चीज़ों को देखते हुए भी अनजान बने रहना कम से कम किसी रचनाकार  का कर्म नहीं है.मुझे बहुत पीड़ा के साथ कुछ तल्ख़  बातें उद्घाटित करनी पड़ रही है ,उम्मीद करता हूँ कि सुधीजन यह विवशता समझेंगे !


ब्लॉग-जगत की लौह-महिला के ब्लॉग पर  यह् पोस्ट पढ़ें और उसमें आई हुई टिप्पणिया देखें तो इस ब्लॉगिंग से ही 'घिन' का भाव पैदा हो जायेगा. वह ब्लॉग 'आत्म-प्रशंसा' का मठ और गाली-गलौज  का उत्पादन-केंद्र बन गया है.जी भरकर वरिष्ठ ब्लोगर्स को गरियाया जाता है,पर विरोध करने के लिए यदि आप चाहें तो उसमें सफलता संदिग्ध है क्योंकि यदि उसमें  कही गयी बातों से आपकी सहमति नहीं है तो आपकी टीप अस्तित्व में ही नहीं आएगी.'मीठा-मीठा गप्प और कड़वा-कड़वा थू' की तर्ज़ पर माडरेशन का सहारा उस ब्लॉगरा को लेना पड़ता है ,बावजूद इसके कि वह स्व-घोषित लौह-महिला है ! ख़ासकर, इसी पोस्ट में मेरी एक टीप प्रकाशित की गयी और बाद वाली नहीं !


यह सारी पोस्ट एक-आधी अधूरी टीप को लेकर लिखी गयी और इसी बहाने घटिया टीपों को इस पोस्ट में जगह दी गई .डॉ.अरविन्द मिश्र जी और अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी को नाम लेकर व्यक्तिगत खुंदक निकाली जाने लगी.जिसका मैंने बिलकुल संयत शब्दों में प्रतिवाद किया,पर मेरे अलावा कई अन्य वरिष्ठ ब्लागर्स  को बातें कहने से रोका गया और  उन के कथित भाई के द्वारा अभद्र टीपें वहां तो की ही गयीं डॉ. मिश्र के ब्लॉग पर भी की  गईं.यहाँ चालाकी देखिये कि उस वीर-महिला ने खुद तो माडरेशन लगा रखा है और डॉ. मिश्र के यहाँ नहीं है,जिसका अपने हितों के तईं भरपूर इस्तेमाल किया गया.लेखन से आनन्द की जगह ज़हर फैलाया  जा रहा है !


इस पोस्ट से पहले जो पोस्टें लिखी गईं  उनमें टीपों के लिखने पर ही खिल्ली उड़ाई गयी,उन्हें बद्बूदार कहा गया क्योंकि जो टीपें विरुदावली की श्रेणी में नहीं आतीं उनमें से उनको बदबू आती है.लगातार पिछली पोस्टों को देखा जाए तो कहीं भी सार्थकता नहीं है !यह इस बात का प्रमाण है कि उनका लेखन  किस दिशा और दशा में है? ब्लॉग-लेखन में टीपों  या तंज को इस रूप में परिभाषित किया जा रहा है.नए आदर्श और प्रतिमान गढ़े जा रहे हैं इसलिए भी मेरा लिखना आवश्यक हो गया ,फिर भी उस असभ्य ढंग से लिखी गई पोस्ट और उस पर की गयी अशालीन टीपों को मैं मैं यहाँ नहीं लगा रहा हूँ,वहीँ पर वह गंदगी रहे ,यही उचित है.


लौह-महिला का दाँव  इस पोस्ट के  लिखने और उनके तथाकथित भाई द्वारा खूब गरियाने के बाद भी अपेक्षित समर्थन नहीं मिलने के कारण जब खाली जाता दिखाई दिया  तो उन महोदया ने अपने स्त्रीत्व की दुहाई दी और अपने लेख के अंतिम होने की घोषणा कर दी.इस उम्मीद में कि ब्लॉग-जगत में कोहराम मच जायेगा ! पर, हाय ! ऐसा भी  न हो सका .इस बीच इसी पोस्ट में 'रक्षाबंधन' का पर्व भी मनाया गया और उनके जाने से 'असहाय' और 'अनाथ' हो जाने वाले चंद लोगों के मान-मनौवल के बाद चंद घंटों बाद ही विधिवत पुनरागमन हुआ ! घोषणा यह होती है कि अब बिलकुल नए अंदाज़ में अवतरण होगा !


हँसी आती है इस आयोजन पर !डॉ. अरविन्द मिश्र ने ऐसे आयोजनों को 'टंकी-आरोहण' का नाम दे रखा है.इसका आशय है कि जब भी अपनी पोस्ट पर टीपों का अभाव होने लगे तो यह फार्मूला 'हिट' है! पर मैं समझता हूँ यह 'टंकी-आरोहण' नहीं पूरी नौटंकी है ! जिसमें ब्लॉग-लेखन के साथ खिलवाड़ किया जाता है.पात्र भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं.यह नौटंकी ख़त्म नहीं हुई है,'नई' ऊर्जा के साथ फिर से मण्डली बैठ गयी है और हम नए तमाशे के लिए तैयार रहें !क्या यही ब्लॉग-लेखन का उद्देश्य है ?


इतने पर भी एतराज नहीं है. आप स्वतन्त्र हैं,अपने ब्लॉग पर खूब खेल खेलें पर और यदि किसी से कोई आपत्ति है,जमकर गरियायें मगर यह क्या कि गालियाँ दे-देकर लिहाफ़ में दुबक जाएँ और आपके 'भक्त' आपको यह कहें कि 'लौह-महिला का ख़िताब ऐसे ही नहीं मिला है !'आलोचना सुनने की ताब और माद्दा दोनों होना  चाहिए !


 अपनी आलोचना से घबराकर न मैं टंकी में चढ़ने जा रहा हूँ और न मैं टेसुए बहाकर सहानुभूति अर्जित करना चाहता हूँ.यदि आपको लगता है कि वास्तव में ब्लॉग-लेखन को हम कहाँ ले जा रहे हैं तो ज़रूर अपनी चिंता,सहमति,असहमति व्यक्त करें और हाँ,मैं बहुत मजबूत और बलशाली तो नहीं हूँ पर मेरा आत्मविश्वास इतना ज़रूर है कि हम अपने ब्लॉग पर माडरेशन का ताला नहीं लगाकर  बैठे हैं !शालीन लहजे में तर्कपूर्ण बात या तंज का भरपूर स्वागत है !




17 टिप्‍पणियां:

  1. दुनिया रंग रंगीली बाबा। टंकी-आरोहण हिन्दी ब्लॉग-जगत में कोई नया फ़िनॉमिना नहीं है। कई लोग कई बार चढ चुके हैं, कइयों ने तो टंकी तक बाक़ायदा लिफ़्ट लगा रखी है, जब दिल किया, चढ-उतर लिये।

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  2. अरे अभी तक बस अनुराग जी की एक टीप ही है ...कब प्रकाशित किया बन्धु इसे आपने ..लगता है सामने के ग्लोब के उस पार बसे अनुराग जी को ही यह पहले से नजर आ गया हो ....
    संतोष भाई यह क्या किया आपने? स्वतः हिटलिस्ट में आ गए .....हम तो ऐसे अत्याचारों के तीर कलेजे पर झेल ही रहे थे .....
    यह तो सही है कि खुद की निजी पीड़ा को समस्त नारी ब्लागरों से जोड़ने के मुहिम की हवा निकल गयी है बाकी कई भाई बन्धु नए जोश उमंग वाले ब्लॉगर और कुछ पंच किस्म के लोग 'विष कुम्भं पयोमुखम' का राज नहीं जानते ....ब्लागजगत एक कम्युनिटी भी है -यहाँ लम्बे समय तक आप अपने को छुपाये मुखौटा लगाए नहीं रह सकते ,असलियत तो खुल ही जानी है एक दिन -अब वहां कोई भी सेंसबल महिला ब्लॉगर या पुरुष ब्लॉगर नियमित नहीं है ...हाँ गाहे बगाहे सदाशयता लोग हाजिरी दे आते हैं -मात्र नारी के प्रति एक दिखावटी रहमदिली के कारण .....बाकी तो निहित भावना वशीभूत लोगों की जमघट वहां है ..कुछ 'भाई' नुमा और कुछ .....अब क्या कहूं ?
    वहां हमेशा एक आदमी प्रमुखता से इमोशनल फंदे में आ जाता है -एक एथिरल इन्फीनिया हुआ करते थे-दुनिया के प्रेम की अंतिम किताब लिख रहे थे मगर बड़े बेआबरू होकर गली निकाला दे दिए गए .....कई नाम है -खुद स्वर्गीय अमरकुमार जी को यहाँ बहुत झेलना और अपमानित होना पड़ा था ..ज्ञानदत्त जी को जब वे आयी सी यू में भी भर्ती थे अंतिम प्रणाम कह दिया गया था (ईश्वर उन्हें शतायु बनाए ) और तभी मैंने इन्हें कटुवचन अवश्य कहे मगर जिस शब्द का आरोपण है वह मेरा नहीं था ....यद्यपि क्रोध में ऐसे शब्द कह भी दिए जाते हैं मगर उनका वह शाब्दिक अर्थ अभिप्रेत नहीं होता ..मगर यह ग़दर तभी से शुरू हो गयी .....
    और हमीं नहीं ब्लॉग जगत के एक दर्जन से ज्यादा सम्मानित लोग हैं जिन्हें वहां अपमानित होना पड़ेगा ..अगर कोई सूची मागेगा तो विकीलीकस से अनुरोध किया जाएगा ..मैंने अपने अभी बमुश्किल पिछले पांच वर्ष वर्ष के जीवन में ही दर्जनों नारियों का गहन प्रेक्षण किया है -अनुभवों से इत्मीनान से साझा करूँगा ...मगर इंसा न देखा ...इनके लिए और इनकी बुद्धि के आगे सारे इनकी समझ से हिन्दी ब्लॉगर लल्लू पंजू हैं ..जो समझ गए ठीक बाकी जो न समझे वे दीवाने हैं .... और कुछ गौण लोग हैं या तो निकाले का फरमान सुनकर भी सौ सौ जूते खायं तमाशा घुस के देखें टाईप लोग हैं या फिर उनके कुछ और हिडेन सरोकार हैं ..वहां भ्रमित राष्ट्रीयता ,बी जे पी अजेंडे और हिन्दू धर्म का गला दबा देने वाले अधकचरे ज्ञान के लोगों का जमावड़ा है ..ऐसी जमातें हमेशा अदब और इतिहास के साथ खिलवाड़ करती आयी हैं -हाँ कालान्तर में उनका कोई नामलेवा नहीं होता .....

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  3. कह रहीम कैसे निभे, बेर केर को संग....

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  4. किसी के पीछे या किसी के आगे निकलने की मिमंषा ही इस तरह के रुख को जन्म देती है ! सभी लगन से ब्लोगिंग करें ! स्वक्ष लिखे - यही सही है !

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  5. ऐसा करना इनकी राजनीति का हिस्सा है। दिव्या जी को उपदेशिका बनने से पहले अपने चतरित्र को दुरुस्त करना चाहिये। दागदार चरित्र उपदेश देने के काबिल नहीं होते।

    बहुत से लुंठित ब्लागर दिव्या जी के ट्रैप में फंसे हैं, जिनपर दया आती है। यह मानिये कि हिन्दी ब्लोगिंग में कुछ भी ठीक-ठाक नहीं है, सब ठीक-ठाक का भ्रम है।

    फिर भी दिव्या जी के छद्म के अनावरण की आवश्यकता बनी हुई है, इस दिशा में कुछ करना ही होगा, कम-से-कम अपनी तरफ से जवाब-देही बनती है। चाहे कुछ फरक पड़े चाहे नहीं।

    दुखद है बड़े मठाधीसों का ऐसा आयोजन जिसमें दिव्या जी जैसी किसी थर्ड क्लास की ब्लागर को इतना परिवेश को विषाक्त करने का मौका मिलता है। इस बार यह आग मठाधीस अनूप शुक्ल ने लगायी है। अनूप जी बेशक अच्छा लिखते हैं, पर क्षुद्र संकीर्णताओं से ऊपर नहीं उठ सके हैं, सतीश सक्सेना जी के संदर्भ में मैने उनसे निवेदन किया था कि यह सब अच्छी बात नहीं है, पर आज भी अनूप जी ऐसी अनुचित गतिविधियाँ बदस्तूर जारी रखे हैं। अनूप जी - हिन्दी ब्लागरी के वर्तमान परिवेश को देखते हुये - बेशक बड़े ब्लागर कहे जा सकते हैं, पर आदमी छोटे हैं।

    आपने यह पोस्ट लिखकर अपना जी हल्का किया, ठीक ही किया। अंधों को कुछ न दिखे तो इसमें किसी का कोई दोष नहीं, और हिन्दी ब्लागरी में सक्रिय अंधों की संख्या बहुत है।

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  6. अब तो ऐसी स्थिति आ गई है कि हम अपनी आचार संहिता ख़ुद बना कर उसका पालन करते हैं। किसे उपदेश दें, और क्यों?
    सब यहां एक से एक विद्वान हैं।

    आपकी मर्यादित शैली अच्छी लगी।

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  7. bare logon ki bari baten o hi log jane.............

    lekin, vayktigat akshep evam ap-shabd.......ke liye koi kisi ko protshahan nahi deta.....

    aisi kisi bhi 'parishtiti' me vaykti-vishesh ka
    virodh/alochna apne 'alpagyata' 'laghuta' ke karan sath hi 'sabhi blogger' ko ek samjhne ke
    karan nahi kar pate hain.

    iska matlab ye nahi hum 'kisi ka' 'kisi ke liye'
    kisi ke dwara "chaplusi" karte hain............

    Dr. arvind mishra vs. dr. zeal zen ke mamle me
    dono paksh saman roop 'abyvharik' hue hain....
    lekin bhartiya sanskriti ke kai aur formule ke
    tarah 'nari' hone ka sahaj 'sahanubhooti' mila
    hai......

    2008 se blog padhte hue hamne ............
    anoop shukla vs. a/b/c/.....z.....tak ke 'episode' dekhete hue ek moulik abhi abhi
    taza-taza sher'

    "jab bhi, jisne chaha oospar chadh liye....
    lout ke jane laga to larkharata gaya"

    sadar.

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  8. कहां से कहां पहुंच गई बातें.

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  9. आपने एक पोस्ट लिखी दिव्या जी को लेकर
    दिव्या जी ने लिखी आपको लेकर.
    मेरी प्रार्थना है कि यदि एक दूसरे को आरोपित प्रत्यारोपित
    न करते हुए ,हमारा लेखन यदि सकारात्मकता का ही पोषण करे
    तो ही ब्लॉग जगत और हम सब की भलाई है.

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  10. बेहद अफ़सोस जनक स्थिति है यह !

    अपमान चाहे किसी का हो, निंदनीय है ! अपमान करने वालों को यह याद रखना चाहिए कि उनका अपमान भी किया जा सकता है !
    जो दूसरों के अपमान करते हिचकते नहीं हैं उन्हें अपने अपमान के समय रोना नहीं चाहिए !

    ब्लॉग जगत में अपने प्रभामंडल को बड़ा साबित करना है तो कलम उठाइये और लिखते जाइए , पाठक फैसला कर देंगे कि आप कितने विद्वान् हैं !

    व्यक्तिगत निंदा और आरोप प्रत्यारोप के लेख लिख कर हम लोग अपनी मानसिकता जग जाहिर कर रहे हैं !

    यह लेख और टिप्पणियां अमिट हैं , आने वाली पीढियां भी इसे पढ़ेंगी तब शायद हमें अपने ऊपर शर्म आये कि हमने लेखन के नाम पर क्या प्रकाशित किया था !

    अगर कोई हमें पसंद न आये तो मत पढ़िए उसे ....बस इतना काफी है न कि ताल ठोक कर दूसरे को ललकारते रहें ...

    और यहाँ भीड़ भी कैसी है जो बिना दूसरे का पक्ष समझे एक तरफ खड़े होकर हाय हाय करने लगते हैं ऐसे लोगों को इंसान कहा जाए अथवा कुछ और ....

    यहाँ कोई किसी को नहीं पढता ...सिर्फ पढ़ाने में दिलचस्पी रखी जाती है !

    कमजोर व्यक्तित्व के लोग बड़ा प्रभामंडल देखते ही, तालियाँ बजाने, उसकी शरण में दौड़ लेते हैं ! बड़ी चौपाल पर तालियाँ बजाने वाले अपनी पहचान बनाने में अक्सर कामयाब हो जाते हैं !

    बस यही उद्देश्य था जो पूरा हो गया !

    समाज का नुकसान कितना किया है इन्हें इससे कोई वास्ता नहीं !

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  11. सतीश जी ने हमारे भी मन की बात कह दी ।
    शायद हम इतने अच्छे से नहीं कह पाते ।
    शक्रिया सतीश जी ।

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  12. .
    .
    .
    "यह पब्लिक है, सब जानती है
    हर टंकी-नौटंकी को पहचानती है"

    चलने दो यार... सब चलता है... ब्लॉगवुड की खासियत ही यही है कि बॉलीवुड की तरह ही यहाँ सत्यजित रे भी होंगे, राज कपूर भी, गुरूदत्त भी और सुभाष घई भी... और इन्हीं सब के बीचों-बीच आई एस जौहर, रामसे ब्रदर्स और दादा कोंडके की दुकानें भी चलती-चमकती मिलेंगी, उनके अपने ग्राहक हैं... खाली पीली इस मामले में ज्यादा सोच के अपना टाईम नहीं खोटी करने का... मस्त रहो और लाइट लो यार... दूर खड़े हो मजे लिया करो नौटंकी का... कभी-कभी के लिये अच्छा टाइमपास तो यह है ही... ;))




    ...

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  13. शीर्षक के शब्द विशेष से भयावह संकेत उत्सर्जित हो रहे हैं !

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  14. आप सभी महानुभावों को अपनी चिंता प्रकट करने का आभार ! हाँ,दिव्याजी को ज़रूर उत्तर देना चाहूँगा क्योंकि उन्होंने एक टीप को ही अपनी पोस्ट बना डाली है,चूंकि वहाँ टीप करना आपने बंद कर रखा है इसलिए यहीं पर मुखातिब हूँ :

    दिव्याजी,
    सबसे पहले तो आभार आपका , आपने मुझ पर 'कवर-स्टोरी ' छापकर अपनी तरह मुझे भी 'इंटरनैशनल ' बना दिया !
    आपने यह सवाल उठाया है कि बदबूदार टीपें देने वाला अब बदबूदार पोस्ट भी लिखने लगा,भई ! गज़ब की 'घ्राण-शक्ति' है आपकी ! आपको अपनी पोस्ट पर लगी अशालीन टीपें सुगन्धित लग रही हैं और तंज मारती मेरी टीप से आपको बदबू आ रही है !ऐसा कोई उदहारण नहीं दिया आपने !

    दूसरी बात ,आपने आपको फॉलो करने के विषय में आपने बताई है तो इस पर आप बिलकुल दुरुस्त हैं .हाँ,स्पष्टीकरण मैं दे देता हूँ .१२ सितम्बर की पोस्ट देखकर जो 'बदबूदार-टिप्पणियों' के विषय में थी ,लगा की आप जिस तरह का लेखन कर रही हैं उसमें हमारे लिए कोई जगह नहीं है,फिर जब आपने दूसरी पोस्ट में मेरी टीप को प्रकाशित किया तो मैंने सोचा कि आप कम से कम अभिव्यक्ति की आज़ादी की पक्षधर हैं तो मैंने फिर से फॉलो कर लिया ,पर जल्द ही यह धारणा भ्रम में बदल गई क्योंकि मेरी एक सामान्य टीप को आपने बैन कर दिया.ऐसे में जब आप अपनी पोस्ट में लगातार आग उगल रही हों और दूसरों को ज़वाब का मौका भी न मिलता हो तो फिर से अन -फॉलो कर दिया.और हाँ,मजे की बात यह है कि 'बदबूदार-पोस्ट' के लेखक की फोलोवर आप अभी भी बनी हुई हैं.इस अतिरिक्त सहृदयता के लिए आभार !

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  15. चलने दो यार... सब चलता है... ब्लॉगवुड की खासियत ही यही है कि बॉलीवुड की तरह ही यहाँ सत्यजित रे भी होंगे, राज कपूर भी, गुरूदत्त भी और सुभाष घई भी... और इन्हीं सब के बीचों-बीच आई एस जौहर, रामसे ब्रदर्स और दादा कोंडके की दुकानें भी चलती-चमकती मिलेंगी, उनके अपने ग्राहक हैं... खाली पीली इस मामले में ज्यादा सोच के अपना टाईम नहीं खोटी करने का...

    ...वाह! कितना सही लिखा है!!

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  16. बात चाहे जितनी तल्खी से हो भरी
    कहने का माद्दा तो हो सलीके भरा !

    ~दुनाली फतेहपुरी

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