22 अक्तूबर 2010

प्रणय -गीत

मेरे जीवन की प्रथम-किरण,
         मेरे अंतर की कविता हो,
हृदय अंध में डूब रहा ,
        प्रज्ज्वलित करो तुम सविता हो !

मम भाग्य-विधाता  तुम्हीं  हो,
       तुम बिन जीवन है पूर्ण नहीं,
मेरे अंतर-उद्गारों को ,
      साथी ! करना तुम चूर्ण नहीं !


प्रेरणा तुम्हीं हो कविता की,
      मेरे मानस की अमर-ज्योति,
सत्यता तुम्हारे सम्मुख है,
     नहीं तनिक भी अतिशयोक्ति !

मेरे जीवन की डोर तुम्हीं,
    अपने से अलग नहीं करना,
प्यार तुम्हीं से केवल है,
      अंतर्मन में मुझको रखना !!



विशेष :पहला गीत,रचना-काल-१०/०६/१९८७
 स्थान-फतेहपुर(उ.प्र.)

3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम की आत्ममयी व सरल अभिव्यक्ति।

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  2. हाय रे !
    कविताई की ऐसी प्रेरणा से हम क्यों महरूम हैं?

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  3. @प्रवीण पाण्डेय काश ! प्रेम-पथ इतना सीधा-सपाट होता !फिर तुलसी बाबा लिख गए हैं;'मोह न नारि,नारि के रूपा'तो हममें से ही किसी को आगे आना पड़ेगा !

    @प्रवीण त्रिवेदी पछताओ मत महाराज!जिनको प्रेरणा मिली है,वे कौन-से आबाद हैं ?

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