24 नवंबर 2013

बहुत कठिन समय है साहब !

बहुत कठिन समय है साहब,
पता नहीं कब,कौन पत्रकार तरुण
और ईमानदार केजरीवाल हो जाए,
सब कुछ दांव पर है,
पता नहीं कब कोई संत आसाराम
और राजनीति साहब हो जाए !
बहुत कठिन समय है साहब,
पता नहीं
कब कोई सामाजिक योद्धा
कार्पोरेट पत्रिका का संपादक
और कोई न्यायाधीश मुजरिम बन जाए !! 
बहुत कठिन समय है साहब ,
पता नहीं कब पहरेदार लुटेरा
और शासक वाचमैन हो जाए !!

3 टिप्‍पणियां:

  1. बस देखते रहिये,
    तथ्य भेदते रहिये।

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  2. वाह... उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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  3. इधर आपका ब्‍लॉग पता नहीं क्‍या प्रदर्शित करता हुआ खुल रहा था। चलिए खैर है कि वापस आ गए हैं।

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