31 मई 2013

मृत्यु और जीवन !



(1)मृत्यु

घिन आती है ऐसे समाज से
जहाँ हक की लड़ाई
जमीन और जंगल के बहाने
जान लेने पर उतारू है।
जिस जमीन पर गिरता है पानी
वहां बहाया जाता है रक्त।
फसल में धान और सरसों की जगह
लहलहाती हैं लाशें।
उर्वर मानव-समाज को
बंजर कर रहे जमीन की तरह
... अपनी पीढ़ियों को उजाड़कर
बना रहे हैं ठूँठ
जंगल और समाज को।
बच्चों के हाथ में
गेंद नहीं बम हैं
फिर भी नई सदी के
क्रांतिकारी हम हैं।
 
 
 
 
 
(2)जीवन

जेठ दुपहरी आम ताकते
झूला डाले बीच बाग में।
पेंग मारते,ऊपर जाते
बड़ी दूर थे गुणा-भाग से।
सांप-सीढ़ी और चन्दपो
खेल दोस्तों संग जमाते।
पड़-पड़ गिरते आम,
डाल जब जोर हिलाते।
जाने कहाँ गए वो दिन,
धरती,अम्बर औ उपवन।
मिल पाते तो जी सकते फिर
वो जीवन,वो प्यारा बचपन।।



 

11 टिप्‍पणियां:

  1. अब वो शाम दोपहरी, हवा हो चुकी है. मानवता शर्मसार है.

    लगता है कि ये ऐसी आग है जिसको बुझाने का माद्दा किसी के पास भी नहीं है.:(

    रामराम.

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  2. समय के अंतराल को इन दोनों कविताओं ने बखूबी उभारा है !

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  3. जेठ दुपहरी आम ताकते झूला डाले बीच बाग में। पेंग मारते,ऊपर जाते बड़ी दूर थे गुणा-भाग से।............बहुत अच्‍छा जीवन दिया है आपने।

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  4. sundar jivan darshankarati ... bahut sundar aur sarthak prastuti ....

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  5. दमन और अन्याय पे बोलें
    नाम कमायें , जिंदाबाद !
    देश का खाएं,जय दुश्मन की
    गद्दारों की ,जय जयकार !
    सारे देश में,फ़ैल चुके हैं,चीनी भाई, जिंदाबाद !
    धन के भूखे,दमन पे रोयें,माओवादी जिंदाबाद !

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  6. गेंद और बम से क्रांतियां कभी नहीं आया करतीं
    उछलकूद कर शहर गांव की माया भरमाया करती

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  7. वही बाग है
    वही आम है
    बच्चे बड़े हुए!

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  8. सब के सब पुनर्जन्म को मानते हैं, तभी इस जीवन का मूल्य नहीं समझते हैं।

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  9. जाने कहाँ गए वो दिन,
    धरती,अम्बर औ उपवन।
    मिल पाते तो जी सकते फिर
    वो जीवन,वो प्यारा बचपन।।--बचपन की यादें -सुन्दर प्रस्तुति
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  10. एक बार और दर्शन दें प्रभो , ताऊ पर आपके कमेन्ट का जवाब इंतज़ार में है !

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