दर्द अब निकलता नहीं
महसूसता भी नहीं,
उपजाया जाता है चेहरे पर
खेत में फसल की तरह
और काट लिया जाता है पकते ही .
नकली दर्द खबर बनता है
ऊँचे दाम पर बाज़ार में बिकता है,
उस पर और रंग-रोगन कर
परोस दिया जाता है
सभ्य समाज में चर्चा के लिए .
दर्द अब पीड़ा नहीं बनता
न ही मोहताज़ होता किसी हाथ का
अपने काँधे पर रखे होने का,
साहित्य का हिस्सा बनकर वह,
सम्मान-समारोहों में मालाएं पहनता है
इस तरह दुःख और दर्द को हम नहीं
बाज़ार भोगता है !
महसूसता भी नहीं,
उपजाया जाता है चेहरे पर
खेत में फसल की तरह
और काट लिया जाता है पकते ही .
नकली दर्द खबर बनता है
ऊँचे दाम पर बाज़ार में बिकता है,
उस पर और रंग-रोगन कर
परोस दिया जाता है
सभ्य समाज में चर्चा के लिए .
दर्द अब पीड़ा नहीं बनता
न ही मोहताज़ होता किसी हाथ का
अपने काँधे पर रखे होने का,
साहित्य का हिस्सा बनकर वह,
सम्मान-समारोहों में मालाएं पहनता है
इस तरह दुःख और दर्द को हम नहीं
बाज़ार भोगता है !