19 अप्रैल 2014

झूठे वादों का मौसम है।

झूठे वादों का मौसम है,
तगड़ी घातों का मौसम है।

बीत गए वो सोने के दिन, 
काली रातों का मौसम है। 

पनघट पर खाली सन्नाटा,
उसकी यादों का मौसम है। 

और नहीं कुछ सूझे मन को, 
केवल बातों का मौसम है। 

आँखों में है एक समंदर, 
अब बरसातों का मौसम है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. अभी मौसम बहुत खतरनाक है देश की राजनितिक व सामाजिक व्यवस्था का. सजग रहने की जरुरत है.

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  2. मौसम ये भी बीत जाना था
    ऋतु ऋत का इक बहाना था

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