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27 फ़रवरी 2013

खत,जो कभी पहुँच नहीं पाए !(१)

स्कूल के दिनों में ,जब मैंने एक पर्ची पर लिखकर तुम्हारा नाम पूछा था तो तुमने उस पर झट से अपना नाम लिखकर उसी कागज का गोला बनाकर मेरी ओर फेंका था.तुमने मेरा भी नाम जानना चाहा था,यह जानकर ही मैं ख्यालों में खो गया था.जब मुझे होश आया तब तक मास्टरजी कक्षा में आ चुके थे और इस तरह हमारा पहला संपर्क अधूरा रह गया था.


जब भी मास्टरजी श्याम-पट में कुछ लिखते,मैं तुम्हारे बालों को निहारता .तुम कनखियों से कभी-कभी मुझे देखती तो मैं बल्लियों उछल जाता.तुम्हारे हाथ की लिखावट आकर्षक थी और मेरी बहुत साधारण. मास्टरजी जब इमला बोलते तो हम दोनों के बराबर अंक आते.इस बहाने कक्षा में हम दोनों ही खड़े होते और साथी इस पर भी कहानियां बनाते.मुझे तो खुशी इस बात की होती कि किसी बहाने मेरा नाम तुम्हारे साथ जुड़ा तो !


एक बार किसी लड़के ने कुछ बच्चों की कॉपियों में तुम्हारा और मेरा नाम एक साथ लिख दिया था.बात धीरे-धीरे मास्टरजी तक पहुंची और इसके लिए मुझे ही दोषी बनाया गया.मैंने पहली बार तुम्हारे नाम के दो डंडे अपने हाथ में खाए थे .शुरू में तुम्हें भी लगा था कि शायद मैंने कुछ किया हो पर बाद में उस लड़के के पकड़े जाने पर वह बात खत्म हो गई थी .सच में,मुझे मार का कोई रंज न था,बस मुझे तुम्हारी रुसवाई नागवार लगी थी.


मैंने तुमसे कभी सीधी बात नहीं की थी पर जिस दिन तुम स्कूल नहीं आतीं थीं ,मेरा मूड खराब रहता,कुछ भी नहीं अच्छा लगता.मैं नहीं जानता कि मेरे स्कूल न आने पर तुम्हें कभी ऐसा लगा हो ?मैं किसी न किसी बहाने तुम्हारी खैर-खबर ज़रूर ले लेता था.


स्कूल की घंटी बजने पर सभी बच्चे खुश होते पर मैं तुमसे बिछड़ने को लेकर अकसर उदास हो जाता.मुझे याद नहीं आता ,जब तुम्हें मैंने उदास देखा हो.तुम्हारा चेहरा हर समय खिलखिलाता रहता और मुझे लगता कि यह सब तुम मेरे लिए करती हो.

क्या कभी तुमको भी मुझसे अलग होने का अहसास हुआ था ?

 

22 फ़रवरी 2013

गज़ल

न चराग रहे घर में,
न सुकूँ बचा शहर में !

मोहब्बत आई, गई हुई
नफ़रत रुके जिगर में !

हमने करी वफ़ा पर
आए नहीं नज़र में !

अपना मक़ाम तय है
अब भी हैं वे सफ़र में !

ज़िंदगी देती नहीं कुछ
सीख देती है डगर में !

हम दर्द को लेते छुपा,
जी रहे सबके ज़हर में ! 



 

14 फ़रवरी 2013

यूँ दबे पाँव आया वसंत !



यूँ दबे पाँव आया वसंत !
हरियाली की चादर ओढ़े
धूप गुनगुनी साथ लिए,
मंद पवन से द्वार बुहारे
पुलकित मन ,श्रृंगार किये ,

पट खोल दिए दोनों तुरंत !
यूँ दबे पाँव आया वसंत !!

नयनों से धार बही झर-झर
काजल बह गया अश्रु बनकर ,
सामने दिखे मेरे प्रियतम
बरबस लिया उन्हें अंक भर ,

मिल रहे प्रिया से आज कन्त !
यूँ दबे पाँव आया वसंत !!

 

बुड्ढों का कैसा हो वसंत !


जिनके मुरझाये चेहरे हैं
कानों से थोड़ा बहरे हैं,
आँखों की ज्योति बुझी-सी है
जिनके जीवन का निकट अंत !

बुड्ढों का कैसा हो वसंत !!

वे मरे-मरे से रहते हैं
सूने नयनों से कहते हैं,
'तुम यूँ आलिंगन-बद्ध रहो
हम भी कोई नहीं संत’!
बुड्ढों का कैसा हो वसंत !!

दिल के सारे अरमान लुटे
नहीं कोई मोहिनी पटे
पिचके गालों के गढ्ढों में
चुम्बन को आतुर नहीं दन्त !
बुड्ढों का कैसा हो वसंत !!

यार मनाओ खुशी आज
छेड़ो जीवन के मधुर साज ,
हम अपनी संध्या-बेला में
तुम कूदो बछड़े बन उदन्त !

बुड्ढों का कैसा हो वसंत !!


*सुभद्रा कुमारी चौहान से क्षमायाचना सहित

5 फ़रवरी 2013

मौसम और वो !

उसका मिजाज मौसम-सा , 
हमको हर बार दगा देता है !

मिलने को बुलाता है मुझको 
गलत हर बार पता देता है ।

कहने को कुछ नहीं होता,
जल्द एतबार जता देता है ।

रूठ कर महफिल से गए, 
मेरा कुसूर बता देता है ।

वो स्याह है,रोशन है  वही,
मेरे दिल को जला देता है ।