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26 सितंबर 2012

रचना जब विध्वंसक हो !


जब चुप्पी इतनी क़ातिल है,
लब खोलेंगे तब क्या होगा ?

 
जब छूछे नैन बरसते हैं,
भर आएँगे तब क्या होगा ?

 
अल-सुबह से छाई वीरानी,
शब आ जाने पर क्या होगा ?

 
बंजर धरती दहके हरदम,
बादल बरसेंगे,क्या होगा ?

 
रचना जब विध्वंसक हो,

साहित्य-सृजन तब क्या होगा ?

 
लिए आइना फिरते हरदम,
खुद झांकेंगे तब क्या होगा ?

 

25 सितंबर 2012

गाँठ पड़ना ठीक है !


गाँठ जो है
तेरे मेरे बीच,
बाँधती भी है
अलगाती भी है।

गाँठ जो खुलती है
तेरे मेरे बीच,
राह बढ़ती है,
तन्हा छोड़ जाती है ।

गाँठ गर पड़ती नहीं
तेरे मेरे बीच,
एक-दूजे की अहमियत
समझ में आती नहीं ।

गाँठ का बँधना सदा
पक्का नहीं होता,
इतनी कसावट में भला
सहजता टिक पाती कहीं ।

 

22 सितंबर 2012

दूरियाँ !



गोपाल चतुर्वेदी और लालित्य ललित के साथ !




देखता हूँ
आसमान के तारों को
एक निश्चित अंतराल में टिमटिमाते हुए
यहाँ ज़मीन पर
नियमित रूप से
हमारा कुछ भी नहीं है !
दूर तक फैले गगन में
कितना कुछ है पंख पसारने को,
यहाँ दिल से दिल की दूरी भी
नपी-नपाई होती है !


विशेष:चित्र का रचना के साथ कोई साम्य नहीं है !

20 सितंबर 2012

बिगड़ती शिक्षा प्रणाली !


इस समय शिक्षा देश के ज़रूरी जेंडे से लगभग बाहर हो चुकी है।मंहगाई और भ्रष्टाचार हमारा जो नुकसान कर रहे हैं वह तो कम हो नहीं रहा,एक महत्वपूर्ण मुद्दे से भी समाज और सरकार का ध्यान हटा दिया गया है ।सरकार,अभिभावक,शिक्षक और छात्र ,शिक्षा को लेकर बिलकुल अलग सोच रख रहे हैं।हम यहाँ पर सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा की बात कर रहे हैं क्योंकि अभी भी बड़ी आबादी अपने बच्चों को यहीं भेज रही है।सरकार के लिए जहाँ यह विषय अन्य मदों की तरह एक मद है,अभिभावकों के लिए दायित्व है,शिक्षकों के लिए एक पेशा है वहीँ छात्रों के लिए एक खानापूरी करने जैसा कर्म बन गया है।
 
दर-असल,आज की पढ़ाई ज्ञान व बोध केन्द्रित न होकर परिणाम व रोज़गार-केन्द्रित हो गई है । यही वज़ह है कि विद्यालयों में पढ़ाई का माहौल नदारद-सा है।सरकार कागज़ों में परिणाम को लेकर चिंतित है तो अभिभावक बच्चों के रोज़गार को लेकर। शिक्षक अपना नौकरीय दायित्व निभा रहे हैं वहीँ छात्र परीक्षाओं के खौफ से रहित होकर शिक्षण-समय में विद्यालय के बाहर टहलते मिलते हैं। वर्तमान प्रणाली में उनके मन में न शिक्षकों के प्रति आदर बचा है और न अनुशासन का डर।वे सिगरेट ,पान मसाला ,शराब जैसे दुर्गुणों के शिकंजे में फँसते जा रहे हैं और शिक्षक चाहकर भी कुछ अधिक कर नहीं पाते।उल्लेखनीय है कि इन छात्रों के अधिकतर अभिभावक इस सबसे अनजान रहते हैं। वे इतने जागरूक भी नहीं हैं कि नियमित रूप से यह देख सकें कि उनके बच्चे विद्यालय में क्या करते हैं।अब तो छात्रों को डांटने से भी शिक्षक परहेज करते हैं।कई बार शिक्षक चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते क्योंकि उन्हें नियम-कायदों का हवाला दिया जाता है। क्या अभिभावकों की तरह शिक्षक उन्हें डांट भी नहीं सकता ? क्या एक तरह से वह उनका अभिभावक नहीं है ?
 
इसके अलावा कक्षा में जो मुख्य मुश्किलें आती हैं वह बहुत महत्वपूर्ण हैं।लगभग हर कक्षा ६०-७० की संख्या वाली होती है,जिसमें बैठने की उचित व्यवस्था नहीं होती और यदि किसी प्रकार बच्चों को बैठा भी दिया जाता है तो अनुशासन नहीं बनता।शिक्षक पढ़ाने की जगह कक्षा में उठते शोर को ही नियंत्रित करने में अपनी ऊर्जा खर्च कर देता है।ऐसे में उसे बहुत कम समय मिलता है जिसमें वह अपनी बात उन तक पहुँचा पाता है।बच्चों के लिए बने बनाये पाठ्यक्रम को पूरा करने से बेहतर यह है कि उन्हें शिक्षा के असली उद्देश्य की जानकारी दी जाय और उन्हें यह बताया जाय कि परीक्षा उत्तीर्ण करने से ज़्यादा ज़रूरी है यह समझ आना कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा ।यह भी कि जो पुस्तकों में लिखा है वह उनके व्यावहारिक जीवन के लिए भी ज़रूरी है।परीक्षा पास करना या न कर पाना ज्ञान या बोध प्राप्त करने से बिलकुल अलग है।

आज के प्रतिस्पर्धी माहौल को देखते हुए भी उन्हें पढ़ाई के प्रति एक नियमित योजना बनानी होगी।नशे और मोबाइल की लत से उन्हें दूर होना होगा,लेकिन ,अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तब भी वे दोषी नहीं हैं क्योंकि वे तो ठहरे नाबालिग़ !इस ओर सबसे अधिक ध्यान सरकार को देना चाहिए पर वह बच्चों में निशुल्क पुस्तकें,वर्दी,वजीफा आदि बाँटकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती है।अभिभावक भी साल में तीन-चार बार पैसे पाकर मस्त रहते हैं !हमारी आने वाली पीढ़ी कैसी बनने वाली है,यह शिक्षा ही निर्धारित करती है।अगर समय रहते समाज और सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो बड़े भयावह परिणाम आने वाले हैं !

10 सितंबर 2012

शब्दों पर पहरे !




न कुछ बोलो
न कहो कुछ
शब्दों पर हैं पहरे,
उठाओ न नक़ाब
शरीफ हैं चेहरे
बनो तुम सब
हम जैसे
 अंधे-बहरे !
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8 सितंबर 2012

तुम्हारी गंध तुम्हारे रूप से अधिक भाती है !

तुम्हारी एक झलक पाने के लिए
गली के आखिरी छोर तक
नज़रें घुमाता हूँ,
हवा के झोंके के साथ
तुम्हारे दुपट्टे का एक कोना
दिखते ही छुप जाता हूँ |

हर पल देखना चाहूँ
अपने ख़्वाब में,
तुम्हारी बेखबरी में,
सामने आते ही
निहारता हूँ आसमान की ओर,
पकड़ना चाहता हूँ
दुपट्टे  से भेजी हवा को,
बस तुम्हें देखना भूल जाता हूँ |

तुम्हारी गंध
तुम्हारे रूप से
अधिक भाती है,
तुम्हारे शरीर से अधिक
तुम्हारे अहसास रुचते हैं हमें
तुम्हें पाकर भी
तुम्हें छोड़ जाता हूँ |

क्या तुम भी मुझे
महसूस करती हो ,
अपने रूप में,
अपनी गंध में ,
पास गुजरती हवाओं में
पहचानती हो भीड़ में
ठहरती हो एक पल के लिए
सुनती हो मेरी सदा
रखती हो जवाब
जो अकसर पूछता हूँ  ?

 

5 सितंबर 2012

गुरु,चेला और गुरुघंटाल !

आज शिक्षक-दिवस की गहमा-गहमी है .शिक्षक जी मगन हो रहे हैं.कम से कम तीन सौ पैंसठ दिन में एक दिन ऐसा है जब उन्हें किसी अनहोनी की आशंका नहीं है.घर और बाहर उन्हें 'फूल' नहीं समझा जायेगा बल्कि कुछेक चेले उनको ही ज़बरिया फूल दे देंगे,भले ही वे कागज में बने हों.

आज गुरूजी को सबसे बड़ी तसल्ली है कि उन्हें कक्षा में अपने सर्वशक्तिमान छात्रों से मुठभेड़ नहीं करनी पड़ेगी.आज के दिन बच्चे ही कक्षाओं में पढ़ाते है.वैसे गुरूजी को अंदर की बात पता है कि वे कौन-सा पूरे साल पढ़ाते हैं.बच्चे ही कक्षाओं को अपने नियंत्रण में रखते हैं.वे तो बस बच-बचाकर कक्षा से निकल आते हैं.बच्चों में यह गज़ब का आत्मविश्वास बताता है कि हमारी शिक्षा-प्रणाली अभूतपूर्व रूप से विकसित हो गई है.
गुरूजी को इस बात का दुःख ज़रूर रहेगा कि वे आज बच्चों को खाना-पीना,नकदी,वर्दी,पुस्तकें आदि मुफ़्त बांटने वाले अहम कार्यों से वंचित रहेंगे.रही बात जनगणना और वोटर-लिस्ट बनाने जैसे महत्वपूर्ण कार्य तो सरकार जी बाद में पूरा करा ही लेंगी.

कुछ नमकहलाल शिक्षकों को आज सरकार जी की ओर से सम्मानित भी किया जाता है.इस अवसर पर उन्हें अपनी सेवाओं को लेकर घनी आत्म-संतुष्टि होती है.बाकी शिक्षकों के कुढने से उनका यह सुख और बढ़ जाता है.

इस अहम मौके पर ऐसे बड़े गुरुओं को हम सादर नमन करते हैं जिन्होंने हज़ार ख़तरे सहकर हमें इत्ता खतरनाक बनाया.साथ ही हम पढ़ाई  के इतर गुरुघंटालों को साष्टांग दंडवत करते हैं जिनकी कृपा के बिना हम अपना अस्तित्व नहीं बचाए रख सकते हैं. गुरूजी से ज़्यादा अहमियत गुरुघंटालों की है क्योंकि यदि गुरूजी नाराज़ हो जांय तो पैर छूकर उनका विष  उतारा जा सकता है पर गुरुघंटाल की नाराज़गी हमें जाति-बिरादरी से बाहर कर सकती है.वे चाह लें तो हमारी चाकरी भी छीन लें और हमें टंकी पर चढ़ने को मजबूर कर दें .गुरूजी खुश होंगे तो ज़्यादा से ज़्यादा कोरा आशीर्वाद देंगे मगर गुरुघंटाल यदि प्रसन्न हो जांय तो घर में मेडल रखने की जगह नहीं मिलेगी.इसलिए इनकी महिमा सबसे बड़ी है.

इसलिए गुरु जी आज सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं.उनके चेले भी प्रसन्न हैं कि वे ही असली गुरु हैं.गुरुघंटाल यह सब देखकर प्रसन्न हैं क्योंकि साल के सब दिन उनके हैं !

1 सितंबर 2012

परिकल्पना के विविध रंग !

हम कुछ नहीं कहेंगे !
 
जाकिर,रवीन्द्र और हरीश --कुछ रोड़ा है क्या ?
 
 
निवेदिता ,शिखा  व रमा द्विवेदी -हम तो मगन हैं !
 
 
अविनाश,सुभाष राय-देखिये हम लम्पट नहीं हैं !


योगी अरविन्द -कारवाँ गुजर गया,गुबार देखते रहे...


रवीन्द्र-पुंज --हम भी हैं जोश में !


रवीन्द्र--नया प्रभात  !


पूर्णिमा--अमावस खत्म हुई !


उद्भ्रांत -ब्लॉगर न हों आक्रांत !

 
सरदार,असरदार,ख़बरदार !



सिद्धेश्वर,रतलामी,रतन सिंह -समझ रहे हैं सब !

 
प्रेम,प्रवीण,संजय भास्कर-मास्टर अभी भी हैं हम !
 
 
स्मृतियों में लखनऊ ....


आलोचक वीरेंद्र यादव-कुछ सोचने दो !


यह अपनी सहज मुद्रा है  !


इस्मत जैदी-तरन्नुम में गाइए !


मत चूको चौहान...!
 
 
सुधाकर अदीब,सुशीला पुरी -साहित्य का साथ !
 
 
हम ब्लॉगर ही नहीं नेता,शास्त्री,कवि और योगी भी हैं !
 
 
शैलेन्द्र सागर-अहमियत पहचानी !
 
 
राकेश कुमार -रंगमंच है यह भी !
 
 
गुड़ और चीनी के बीच चाय !


सम्मान-समारोह की झलकियाँ !

यहाँ भी देखें !