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28 जनवरी 2012

हम वो परिंदे हैं !

उनकी याद भी अब उनकी तरह नहीं आती,
कोई खुशी अब खुशी की तरह नहीं आती !(१ )


हमने मौसम की तरह,उनका इंतज़ार किया,
पतझर के बाद भी ,बासंती-हवा नहीं आती ! (२)


वे खूब खुश रहें ,अपने जहान में,
हमें तो अब दुआ भी,देनी नहीं आती !(३)


शाख़ से गिर गए हम वो परिंदे हैं,
आस्मां न हाथ आया,ज़मीं नहीं सुहाती !(४)


बीते हुए लम्हों को पकड़ने की ज़िद में, 
ख़ुशी न रोक सका,ज़िन्दगी चली जाती !(५)


यह भी देखें:

अपने अली साहब को यह ग़ज़ल भेजकर सम्मति ली थी ,
उनने तीसरे शेर में कुछ यूं तबदीली की,हालाँकि मैंने अपना 
वाला वर्ज़न ज्यों का त्यों रखा है ताकि उसका भाव हमारा हो !

दुआ ये दिल से वो शादाब हों आबाद हों अपने जहान में,
लुटे से हम ज़रुर हैं फिर भी ,लबों पे बद्दुआ नहीं आती !
--अली सैयद
और यह देखिये मेरी हिमाकत:
दुआ ये दिल से वो ,आबाद हों अपने जहान में,
लुटे तो हम ज़रूर हैं,पर बद्दुआ नहीं आती !

25 जनवरी 2012

किसका है गणतंत्र ?

हम अपने गणतंत्र के बासठ-साला ज़श्न की तैयारी में हैं. राजपथ पर बहुरंगी छटाएँ बिखरने भर से टेलीविजनीय -चकाचौंध तो पैदा की जा सकती है  पर इस पर इतराने जैसी कोई बात नहीं दिखती है.तकनोलोजी के क्षेत्र में हमने बहुत उन्नति की है और आर्थिक-मोर्चे पर भी हमारा दमखम खूब दिखता है पर इतने अरसे बाद भी क्या वास्तव में जिस उद्देश्य को लेकर हमने अपना सफ़र शुरू किया था,उसे हासिल कर लिया है ? संविधान में आम आदमी को सर्वोपरि माना गया था,वह आज कहाँ खड़ा है ? ऐसे में ज़ाहिर है ,इस सफ़र को शुरू करने वाले तो ज़रूर अपने उद्देश्य में सफल हुए हैं क्योंकि तब से लेकर अब तक उन लोगों की सेहत बराबर सुधर रही है,जबकि इस तंत्र में देश और उसका गण टुकुर-टुकुर केवल उसकी ओर ताके जा रहा है !

किसी भी देश के लिए उसका संविधान-स्थापना दिवस बहुत महत्त्व का होता है और होना चाहिए. ऐसे  दिवस मनाये जाने या उल्लास प्रकट करने से ज्यादा हमें आत्म-मंथन व भूले-बिसराए हुए संकल्पों की याद के लिए होते हैं,पर हो रहा है इसके उलट ! सरकारी दफ़्तर औपचारिक कार्यक्रम कर लेते हैं,अखबारों में लम्बे विज्ञापन आ जाते हैं और इस 'उत्सव' के बहाने खजाने से हाथ साफ़ कर लिया जाता है.हम ऊपरी चमक-दमक को पेश कर विकसित होने का मुलम्मा अपने ऊपर चढ़ा लेते हैं.कुछ को लगता है कि इस तरह आम आदमी पर  भी थोड़ी देर के लिए विकसित होने का नशा तारी हो जाता है.

हमारी राजनीति गण के प्रति संवेदित न होकर इस तंत्र के फेर में उलझी हुई है.अपने ही लोगों को अपना शत्रु घोषित कर दिया जाता है.भ्रष्टाचार को एक आवश्यक अंग मान लिया गया है.उसे हटाने पर जोर दिया जाता है,न कि ऐसी व्यवस्था लागू करने पर कि वह आ ही न सके ! जो इस खेल के खिलाड़ी हैं,उन्हें ही यह ज़िम्मा सौंपा गया है कि वे देखें कि खेल साफ़-सुथरा हो ! अजब-सा सिस्टम बन गया है कि अपराधी निश्चिंत है और भुक्त-भोगी डरा-सहमा.राज्य चाहे तो कानून उसके हिसाब से चलेगा,जिस पर और जब चाहे तभी लागू होगा.ऐसा चयन ,ऐसी सोच आम आदमी में विद्रोह को उकसा रही है.ऐसे लोगों को देश के खिलाफ बताया जा रहा है.

राजनीति में अवमूल्यन का असर साहित्य में भी आ रहा है.अब लोग प्रेम-काव्य रचने के बजाय 'जूता-पुराण' लिखने में उत्सुक हैं. लेखक या कवि समाज की माँग और रूचि समझता है इसलिए वह अब गंभीर लेखन के बजाय ऐसी विषय-वस्तु को अपने पाठकों के लिए ज्यादा मुफीद समझता है.हमारा राजनैतिक प्रभु-वर्ग अभी भी यदि किसी मुगालते में रहता है तो उसे गणतंत्र के असली लक्ष्यों और अपनी ज़िम्मेदारी को समझना होगा,अन्यथा हम बासठवां या हजारवां गणतंत्र भी इस तरह के सवालों के घेरे में मनाएंगे !यह भी ज़रूरी नहीं है कि गण हमेशा चुप्पी साधे अपना चीर-हरण होते देखता रहे ! यह कैसा और किसका गणतंत्र है जिसमें एक तरफ राजनेता और अधिकारी दोनों हाथों से अपनी जेबें भर रहे हैं,कुर्सी पाने के लिए आम आदमी को  जाति,धर्म के नाम पर लड़ा रहे हैं और दूसरी ओर वह आदमी अपनी दो-रोटी के जुगाड़  में  ही लगा हो ?

21 जनवरी 2012

मौसमी हैं बादल !

चुनाव के वक्त हिन्दू होते हैं,मुसलमान होते हैं,
फ़िर पाँच साल तक ,हम इंसान होते हैं !

सालों बाद उनने  हमें गौर से जाना ,
हम उन्हीं के मंदिर के भगवान होते हैं !

सब राज-पाट ले लो, इक अंगूठे के लिए,
बस थोड़े दिनों के वे , जजमान होते हैं !

रख के भी क्या करोगे,जो है तुम्हारे पास,
रखने वाले हर दम, धनवान होते हैं !

आपकी नजदीकियाँ ,अब समझ आई हमें,
बहुत दिनों तलक, हम नादान होते हैं !

हर तरफ से उठ रही , आज ये आवाज़,
हमारी भी जिंदगी के अरमान होते हैं !

इस बदलती रुत ने ,समझा दिया हमें,
मौसमी हैं बादल,मेहमान होते हैं ! 




18 जनवरी 2012

स्त्री,पुरुष और बाज़ार !

  स्त्री हमेशा से पुरुष के लिए एक पहेली रही  है.वह कभी किसी रहस्य-सी लगती है,कभी लगता है कि उसके आर-पार सब कुछ दिखता  है.पुरुष स्वभावतः उसकी ओर खिंचा चला जाता है.यह आकर्षण आखिर किन वजहों से होता है ? क्या इसके लिए केवल विपरीतलिंगी होना ही महत्वपूर्ण कारण है ? पुरुष की स्त्री-मुग्धता केवल उसकी दैहिक सुन्दरता पर ही क्यों निर्भर होती है ? क्या हर जगह स्त्री के दिखने भर से वह मुख्य-धारा में आ गई है ?कुछ ऐसे ही प्रश्न हैं ,जिन पर हमें गंभीरता से विवेचन करने की ज़रुरत है.

अमूमन सुन्दर नाक-नक्श वाली स्त्री को देखकर पुरुष  सहजता से  उसकी ओर आकृष्ट हो जाते हैं.प्रथम-द्रष्टया  यह कारक इतना प्रभावी होता है कि स्त्री की बाकी खूबियाँ या तो गौण हो जाती हैं या उन्हें  दिखाई नहीं देतीं ! स्त्री की इस 'उपयोगिता' को खुद स्त्री ने और आधुनिक बाज़ार ने बखूबी पहचाना है.यही वज़ह है कि वह  बकायदा एक उत्पाद के तौर पर देखी और परखी जा रही है.ऐसा नहीं है कि इस धारा के अलावा स्त्री की और कोई धारा या दिशा नहीं है पर जिस वज़ह से समाज का पूरा मनोविज्ञान और अर्थ शास्त्र बन-बिगड़ रहा है ,उसकी ही बात यहाँ पर हो रही है.


विपरीत-लिंग होने से स्त्री की ओर पुरुष का झुकाव सहज है और होना भी चाहिए,पर यहाँ गौर-तलब बात यह है कि इस प्रक्रिया में उसका मूल्यांकन गलत हो रहा है.कई बार दैहिक-सुन्दरता के मोह में हम बहुत गलत चुनाव कर लेते हैं.पहले भी सुदर्शन स्त्रियों का 'उपयोग' करके व्यक्तिगत हित साधे गए हैं और आज भी इसमें ज़्यादा अंतर नहीं आया है.इस सबके पीछे आख़िर कौन-सा मनोविज्ञान काम करता है ? यही कि कोई भी इससे आसक्त होकर मुख्य बात या काम को भूल जाये ,स्त्री के वास्तविक गुण गौण हो जाएँ ? उसे क्या एक मार्केट-टूल नहीं समझा गया है ?

एक स्त्री के लिए इससे अधिक पीड़ादायक बात क्या होगी जब  उसे उसकी सीरत नहीं सूरत के आधार पर पहचान मिले,जाना जाये !कई स्त्रियाँ जिनमें औरों से कहीं अधिक कौशल(स्किल) और बुद्धिमत्ता है,पर वे आधुनिक 'पहचान' से अनभिज्ञ या रहित हैं तो  इस नकली और बाजारू दुनिया में उनकी जगह आखिरी पंक्ति  में होती है. जिस स्वाभिमानी स्त्री को  इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता,उसके लिए  सारे दरवाजे बंद हों,ऐसा भी नहीं है. वह जीवन के हर क्षेत्र में अपनी निपुणता प्रमाणित कर चुकी है ! प्राचीन काल में 'कालिदास' और 'तुलसीदास' के बनने के पीछे विदुषी महिलाओं का ही हाथ रहा है और आज यह काम कहीं ज़्यादा हो रहा है ! एक सफल आदमी के पीछे औरत का हाथ होना यूँ ही नहीं स्वीकार किया गया है पर ऐसी स्त्रियों की चर्चा आज नहीं के बराबर है !

आख़िर, स्त्री आज बाज़ार की क्यों हर उस चीज़ को विज्ञापित करने पर अपना मौलिक और चिर-स्थाई गुण भुला दे रही है ?वह बाज़ार और समाज की माँग के आगे नत-मस्तक-सी हो गई है. इसमें केवल स्त्री भर का दोष नहीं है.हमने इतने सपने पाल लिए हैं,जिनको पूरा करने के लिए उनके पीछे आँख मूँदकर भागे जा रहे हैं . कारपोरेट सेक्टर  स्त्री का भरपूर इस्तेमाल  कर रहा है.औरत की देह हमेशा से आदमी की कमजोरी रही है और तात्कालिक लाभ के लिए इसे भुनाने पर कुछ को ज़रा भी हिचक नहीं होती. यह बात हमारा समाज,बाज़ार और यहाँ तक कि स्त्री भी समझती है !स्त्री का 'वह' तत्व जब चुक जाता है या ढल जाता है तो वह पुरुष और बाज़ार दोनों ले लिए बेकार हो जाती है.

स्त्री के दैहिक-रूप  से इतर उसके पास बहुत कुछ है.अगर इस बिना पर उसका साथ किसी पुरुष से होता है,तो स्त्री को उस रिश्ते पर गर्व होता है,उसका आत्मबल मज़बूत होता है.यह प्रक्रिया या रास्ता थोडा कठिन ज़रूर है पर चिर-स्थायी होता है.बाज़ार में वह देह के बजाय अपने आतंरिक गुणों के बल पर भी  छा सकती है.स्त्री जिस दिन पुरुष या बाज़ार की ज़रुरत के मुताबिक अपने को ढालना बंद कर देगी,वह उसका असली मुक्ति-दिवस होगा ! वह खिलौना या उत्पाद बनना पसंद करेगी अथवा एक अलहदा किरदार ?

15 जनवरी 2012

चुनावी क्षणिकाएं !

( कांग्रेस  )

राहुल जी को जल्दी है,
खतम  करनी है रेस,
सीटी बजने से पहले ही
दौड़ गई कांग्रेस !!

( भाजपा )

आओ-आओ
जो भी आओ,
अगड़ा-पिछड़ा ,तगड़ा आओ,
भाई-बिरादर टिकट कटाओ ,
जीत न पाओ,फिर सो जाओ !!

( सपा )

अबकी घूम रहे अखिलेश,
हवा भर रहे नेताजी.
जैसे-तैसे सत्ता पायें,
फिर से हों  गुंडे राजी !!

( बसपा )

माया अपना जन्मदिन मनाएं,
हम सब देते ढेर  दुआएं,
खूब कमाएँ,
यदि लौट के आयें !!

12 जनवरी 2012

चुनावी-दोहे !

साभार:गूगल बाबा 
दिन में सपने देखते ,अब गाँवों  के लोग !
नेता रोटी खायेंगे,छोड़ के छप्पन-भोग !!

बुत में परदा डालते,बनते हैं नादान !
सारे अच्छे काम हैं,घूँघट में आसान !!

सबने हाँका दे दिया,चलो गाँव की ओर !
वोट मिलेगी जाति की ,चूसेंगे हर पोर !!

बोरे भर वादे लिए,थैली भर संकल्प !
फिर से छलने आ गए,रहा न पास विकल्प !!



10 जनवरी 2012

विज्ञान सेमिनार में ब्लॉगर-मिलन !

अपने नियमित वार्तालाप के चलते कल जब डॉ. अरविन्द मिश्र जी को फोन लगाकर पूछा कि आप कैसे हैं,कहाँ हैं तो उन्होंने रहस्यमयी आवाज़ में फुसफुसाते हुए बताया,"यहीं दिल्ली में". एक बारगी कानों को भरोसा नहीं हुआ पर फिर तसदीक करने पर मैं बड़ा प्रसन्न हुआ.उन्होंने बताया कि अचानक विज्ञान के अंतर्राष्ट्रीय सेमीनार  में  शामिल होने वे बनारस से हवाई रास्ते से दिल्ली आ गए हैं और अगले तीन दिनों तक यहीं रहेंगे. इस बीच भारी व्यस्तता के बावजूद हमारी उनकी बात होती रही. मैं उनसे पहली मुलाक़ात के लिए बेसबरा हुआ जा रहा था.
ब्लॉगर चाय-पार्टी में बाएं से जाकिर अली ,दर्शन लाल बवेजा,डॉ. अरविन्द मिश्र,
मैं और  निमिश कपूर जी (ब्लॉगर नहीं)



आज दोपहर मैं और अविनाश वाचस्पतिजी कम्प्यूटर सम्बन्धी कुछ काम से नेहरू प्लेस में मिले तो उन्होंने भी फोन पर मिश्राजी से बात करी और जाने का मन बनाया,पर   बाद में वे अपने स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से मेरे साथ पूसा में हो रहे सेमिनार में न जा सके,मैं अकेले ही फुर्र हो लिया !
डॉ. अरविन्द मिश्र,दर्शन जी और जाकिर जी फुरसतियाते   हुए !

दिल्ली के बिलकुल बाहरी छोर पर बहुत ही सुंदर स्थान पर  NASC  का काम्प्लेक्स बना हुआ है.मैंने  हाल में टहलते हुए अरविन्दजी को दूर से ही देख लिया और झट से उनकी बगल में जाकर खड़ा हो गया.वे भी मुझे देखते ही उछल पड़े और  साथ खड़े यमुना नगर (हरियाणा) से आये दर्शन लाल बवेजा जी और लखनऊ से ज़ाकिर अली 'रजनीश' जी से मेरा परिचय कराया.मजे की बात यह रही कि मिश्र जी से भी मेरा आमने-सामने परिचय पहली बार हो रहा था. 

बस...फिर हम सब बाहर प्रांगण में आ गए और मिश्र जी ने दूरंदेशी दिखाते हुए सलाह दी कि जाते हुए सूरज की रौशनी में फोटू-सोटू ज़रूर हो जायं ताकि यह सेमीनार छोटे-मोटे ब्लॉगर-मिलन की तरह यादगार हो जाए !फिर तो,दर्शन जी,जाकिर जी और एक कर्नाटक के सज्जन तथा एक मोहतरमा को इस फोटो- सेशन में शामिल कर लिया गया.किसी के कैमरे तो किसी का मोबाइल चमकने लगा,हम सब इत्ती सर्दी में भी फूल के कुप्पा हुए जा रहे थे.
डॉ. मिश्र की जकड़न में हम  !


अंदर आने पर चाय व कॉफ़ी का आनंद लिया गया.इसके बाद बैठकर ब्लॉग-जगत की पिछली-अगली बातें की गयीं.डॉ.अमर कुमार याद किये गए.मिश्राजी ने कुछ नाजुक मसलों को भी छेड़ा,जिस पर खूब  ठहाके लगे.इसे ब्लॉगिंग की अनिवार्यता बताया गया.वहां किस विषय पर सेमिनार किया जा रहा है,इस पर ज्यादा चर्चा तो न हुई ,हाँ,शाम को होने वाले कार्यकर्म,"ट्रेडिशन तो ट्रांजिशन" पर ज़रूर कुछ बातचीत हुई. मिश्र जी ने ट्रेडिशन को शुद्धता और शुचिता से जोड़ा जबकि मैंने इसे कठोर व ट्रेडिशन को लोचदार बताया. इस कार्यक्रम में प्रसिद्द कत्थक  नृत्यांगना   नम्रता  पमनानी की प्रस्तुति रही,जिसे थोड़ी देर देखकर ,व्यस्तता के चलते मैं वापस आ गया.

क्या करूँ,दर्शनजी,जाकिर जी या मिसिर जी को छोड़कर मैं वापस तो आ गया,पर दिल वहीँ रख आया.वे अभी बारह जनवरी तक वहीँ हैं,हो सकेगा तो फिर जाऊँगा !

अस्वस्थ होने के बावजूद आज (११ जनवरी  २०१२) अविनाश वाचस्पति जी मेरे साथ जाने को उद्यत हुए और हम सबने वहां खूब आनंद लिया .उसका भी चित्र दे रहा हूँ !


बाएं से सदाबहार मैं,सदा गुलजार अविनाशजी,
सदा खुशगवार मिसिरजी  और नेकदिल जाकिर  जी !

8 जनवरी 2012

ई पवित्र होने का मौसम है भाई !


कुहरा और बरसात के मारे हम आज चौपाल मा तनिक देर से पहुँचे। जाते ही बदलू काका ने हमें घेर लिया और लगा दी झड़ी सवालों की। "सुने हो मास्टर जी ! ई भाजपा को का होइ गवा है ? अभी कुछ रोज पहिले तक यहिके नेता लोग अन्ना बाबा के गुन गावत फिरत रहे। अब सब भूलि गए का ?" मैंने लगभग अनजान बनते हुए पूछ ही लिया , "काका ! काहे इत्ता परेशान हौ ? का बात है ?" काका फुल जोश में बोले जा रहे थे, "ई बसपा के नेता हाल-फ़िलहाल तक बहिनजी के साथ मलाई पर हाथ साफ कर रहे थे, खूब लूट-लाट मचाई और इहाँ तक कि कुछ लोगन का टपकाय भी दिहेन पर अब भाजपा में शामिल होइ के अगड़ा-पिछड़ा और अन्याव का रोना रो रहे हैं। सबसे मजेदार बात तौ यह है कि भाजपा वाले कहि रहे हैं कि ऊ कुच्छौ गलत नाहीं किये हैं।"

मैंने उन्हें सांत्वना देने की कोशिश करते हुए समझाया ,"काका ! अब जमाना काफ़ी बदल चुका है और राजनीति भी। जब डाकू रत्नाकर अपना मन बदल कर महर्षि वाल्मीकि बन सकते हैं, हिन्दुओं का बड़ा ग्रन्थ लिख सकते हैं तो ये छोटे-मोटे धंधे करके अपने परिवार का पेट पालने वाले नेता क्यों नहीं बदल सकते ? इनके बदलने से अगर कोई पार्टी शुद्ध हो रही हो , सत्ता के नजदीक आकर लोगों की सेवा के लिए बेताब हो तो इसमें हर्ज़ ही क्या है ?"







काका मेरी बात से मुतमईन न लगे। मैंने उन्हें और पौराणिक उदाहरण  दिए। काका सुनो, "जब भगवान राम को लंका में बुराई पर अच्छाई की जीत चाहिए थी तो उन्होंने विभीषण को अपनी ओर मिलाया ताकि बुराई को ख़त्म करने में मदद मिल सके। अब वही काम राम के भक्तों वाली पार्टी कर रही है तो यह एक आदर्श स्थापित हो रहा है। आप नाहक परेशान हैं। इस पार्टी के लोगों ने यह भी कहा है कि उनके यहाँ जो भी आता है,पवित्र हो जाता है,बिलकुल पतितपावनी गंगा की तरह !"

काका ने फिर प्रतिवाद किया, "अभी दो दिन पहले ये सब संसद में हंगामा मचाय रहे कि मज़बूत लोकपाल लाना बहुतै ज़रूरी है और अन्ना बाबा का हमरा फुल सपोट है,तो उसका क्या ?" हमने कहा, "काका ! ई लोकपाल तो तभी जाँच करेगा न , जब कोई घपला-घोटाला होगा। सो, उसकी उपयोगिता को प्रमाणित करने के लिए पहले कुशल भ्रष्टाचारियों की भर्ती भी तो ज़रूरी है। बाद में जाँच शुरू होते ही वे उन्हें हटाकर डंके की चोट पर पाक-साफ भी बन जायेंगे। आखिर पार्टी विद डिफरेंट भी तो दिखना ज़रूरी है। जो भी सेवा कार्य या देश हित करना है, वह सत्ता में आये बिना कैसे हो सकता है ? सो, कुर्सी के लिए थोड़ा एडजस्टमेंट करने मा का बुराई है ?" 




अब तक बदलू काका हमारी बातों से सहमत हो गए लग रहे थे, हम फिर से मिलने का वादा करके घर चले आए क्योंकि शाम के समाचारों में क्या पता ...... कोई फिर पवित्र हो गया हो ?

5 जनवरी 2012

सरदी,सड़क और कोहरा !

दोपहर बीत जाने के बाद 
कोहरा और घना हो चला था
मैं कब तक सेल में बंद रहता 
थोड़ी ही देर में 
ढके आकाश के नीचे ढका था,
रास्ते पर चल  चुका था !


चल रहा था फुटपाथ पर ,
क्योंकि सड़क  पर आदमी नहीं,
गाड़ियाँ  चलती हैं,
यह मुझे अख़बार से मालूम हुआ था !
थोड़ी दूर बढ़ने पर 
कान बांधे,मूँगफली की ढेरी पर  
मटकी से धुआँ निकालते
एक आदमीनुमा गट्ठर से मैंने कहा,
'भाई,अठन्नी की दे दो '
उसने कहा,'बस ,छू लो !'
मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ 
मैंने पाँच का पत्ता आगे बढ़ाया
मूँगफली लेकर आगे बढ़ आया !


अब ,
घना कोहरा,दिल्ली की सड़क,
गरम मूँगफलियाँ और हम !
सब एक साथ थे
जेब में हाथ थे .
थोड़ा आगे बढ़ने पर 
लालबत्ती का अहसास हुआ ,
उसकी लालिमा भी जैसे बिला गई हो हमारी तरह ,
फिर भी रह-रह कर दमक रही थी,
किसी बुजुर्ग की ज़िम्मेदारी की तरह !


मैंने आव न देखा ताव,
सड़क को रुका हुआ देखकर 
अपना वज़न आगे किया,
फुर्र से एक लम्बी गाड़ी ने 
बिल्ली की तरह रास्ता काट दिया,
काले-सफ़ेद शीशों के बीच से 
एक गोलमटोल आकृति ने हड़का ,
'अबे ! दिखता नहीं है क्या ?'
मैं सन्न था,सुन्न था ,
क्या बोलता !
हाथ में पकड़ी हुई मूँगफलियाँ 
साथ छोड़ चुकी थीं.
तभी मैंने कंधे पर एक गरम हाथ महसूसा,
'बेटे,आप ही देखकर चला करो,
इनके पास तो देखने,चलने,
यहाँ तक कि जीने की भी मशीने हैं !
हम,आप तो बस इन्हें देखने के लिए हैं.'


मैं जब तक कुछ बोलता,
एक बुज़ुर्ग आगे जा चुके थे.
मैं चल रहा था,
सोच भी थोड़ा रहा था.
'ये तो मौसम का कुहरा है,छँट जायेगा,
पर,
जिनके दिमाग शीशों में बंद हैं,
संवेदनाओं की खाल पर बर्फ जमा है ,
वो किस गर्मी से पिघल रहे हैं ?
बाहर के कोहरे से भी ज्यादा धुंध 
क्या कभी वे हटा पाएंगे,
उन शीशों और उस कोहरे के पार 
कभी देख पाएंगे ?'

1 जनवरी 2012

गया साल ,नया साल

१) 

न गए का ग़म 
न आने वाले का ख़ैर-मक़दम

 २)

नए साल में 
नई खाल में 
जुज्झि करेंगे लोकपाल में 
आरक्षण में ,संघवाद में,
संसद में सब नाच करेंगे 
फिर से अपनी सुर-ओ-ताल में 

३)

गए और नए 
दोनों का आभार है,
गए ने जहाँ 
कई नए मिलाए ,
नाकुछ रहे जो 
वो अलगाए !
नए में सब पुराने रहेंगे,
चाहे नए जितने बनेंगे !
पुरनिया तो थाती हैं,पक्के संघाती हैं !


अब देखिये अपने अली साहब की दुआएं !
(३१/१२/२०११ को आखिरी आती हुई मेल में )


ना तो आज जिंदगी का कोई  आख़िरी  दिन है,
और ना ही कल पहला होने वाला है .
...बस दुआओं के ख्याल से 
कुछ लम्हें फिक्स कर रक्खे हैं !
सो दुआ ये कि
आप खुशहाल-ओ-आबाद रहें 
लम्हें आपके इशारे पर थिरकते रहें 
और वक्त आपकी मुट्ठी में क़ैद रहे !!