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18 जनवरी 2012

स्त्री,पुरुष और बाज़ार !

  स्त्री हमेशा से पुरुष के लिए एक पहेली रही  है.वह कभी किसी रहस्य-सी लगती है,कभी लगता है कि उसके आर-पार सब कुछ दिखता  है.पुरुष स्वभावतः उसकी ओर खिंचा चला जाता है.यह आकर्षण आखिर किन वजहों से होता है ? क्या इसके लिए केवल विपरीतलिंगी होना ही महत्वपूर्ण कारण है ? पुरुष की स्त्री-मुग्धता केवल उसकी दैहिक सुन्दरता पर ही क्यों निर्भर होती है ? क्या हर जगह स्त्री के दिखने भर से वह मुख्य-धारा में आ गई है ?कुछ ऐसे ही प्रश्न हैं ,जिन पर हमें गंभीरता से विवेचन करने की ज़रुरत है.

अमूमन सुन्दर नाक-नक्श वाली स्त्री को देखकर पुरुष  सहजता से  उसकी ओर आकृष्ट हो जाते हैं.प्रथम-द्रष्टया  यह कारक इतना प्रभावी होता है कि स्त्री की बाकी खूबियाँ या तो गौण हो जाती हैं या उन्हें  दिखाई नहीं देतीं ! स्त्री की इस 'उपयोगिता' को खुद स्त्री ने और आधुनिक बाज़ार ने बखूबी पहचाना है.यही वज़ह है कि वह  बकायदा एक उत्पाद के तौर पर देखी और परखी जा रही है.ऐसा नहीं है कि इस धारा के अलावा स्त्री की और कोई धारा या दिशा नहीं है पर जिस वज़ह से समाज का पूरा मनोविज्ञान और अर्थ शास्त्र बन-बिगड़ रहा है ,उसकी ही बात यहाँ पर हो रही है.


विपरीत-लिंग होने से स्त्री की ओर पुरुष का झुकाव सहज है और होना भी चाहिए,पर यहाँ गौर-तलब बात यह है कि इस प्रक्रिया में उसका मूल्यांकन गलत हो रहा है.कई बार दैहिक-सुन्दरता के मोह में हम बहुत गलत चुनाव कर लेते हैं.पहले भी सुदर्शन स्त्रियों का 'उपयोग' करके व्यक्तिगत हित साधे गए हैं और आज भी इसमें ज़्यादा अंतर नहीं आया है.इस सबके पीछे आख़िर कौन-सा मनोविज्ञान काम करता है ? यही कि कोई भी इससे आसक्त होकर मुख्य बात या काम को भूल जाये ,स्त्री के वास्तविक गुण गौण हो जाएँ ? उसे क्या एक मार्केट-टूल नहीं समझा गया है ?

एक स्त्री के लिए इससे अधिक पीड़ादायक बात क्या होगी जब  उसे उसकी सीरत नहीं सूरत के आधार पर पहचान मिले,जाना जाये !कई स्त्रियाँ जिनमें औरों से कहीं अधिक कौशल(स्किल) और बुद्धिमत्ता है,पर वे आधुनिक 'पहचान' से अनभिज्ञ या रहित हैं तो  इस नकली और बाजारू दुनिया में उनकी जगह आखिरी पंक्ति  में होती है. जिस स्वाभिमानी स्त्री को  इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता,उसके लिए  सारे दरवाजे बंद हों,ऐसा भी नहीं है. वह जीवन के हर क्षेत्र में अपनी निपुणता प्रमाणित कर चुकी है ! प्राचीन काल में 'कालिदास' और 'तुलसीदास' के बनने के पीछे विदुषी महिलाओं का ही हाथ रहा है और आज यह काम कहीं ज़्यादा हो रहा है ! एक सफल आदमी के पीछे औरत का हाथ होना यूँ ही नहीं स्वीकार किया गया है पर ऐसी स्त्रियों की चर्चा आज नहीं के बराबर है !

आख़िर, स्त्री आज बाज़ार की क्यों हर उस चीज़ को विज्ञापित करने पर अपना मौलिक और चिर-स्थाई गुण भुला दे रही है ?वह बाज़ार और समाज की माँग के आगे नत-मस्तक-सी हो गई है. इसमें केवल स्त्री भर का दोष नहीं है.हमने इतने सपने पाल लिए हैं,जिनको पूरा करने के लिए उनके पीछे आँख मूँदकर भागे जा रहे हैं . कारपोरेट सेक्टर  स्त्री का भरपूर इस्तेमाल  कर रहा है.औरत की देह हमेशा से आदमी की कमजोरी रही है और तात्कालिक लाभ के लिए इसे भुनाने पर कुछ को ज़रा भी हिचक नहीं होती. यह बात हमारा समाज,बाज़ार और यहाँ तक कि स्त्री भी समझती है !स्त्री का 'वह' तत्व जब चुक जाता है या ढल जाता है तो वह पुरुष और बाज़ार दोनों ले लिए बेकार हो जाती है.

स्त्री के दैहिक-रूप  से इतर उसके पास बहुत कुछ है.अगर इस बिना पर उसका साथ किसी पुरुष से होता है,तो स्त्री को उस रिश्ते पर गर्व होता है,उसका आत्मबल मज़बूत होता है.यह प्रक्रिया या रास्ता थोडा कठिन ज़रूर है पर चिर-स्थायी होता है.बाज़ार में वह देह के बजाय अपने आतंरिक गुणों के बल पर भी  छा सकती है.स्त्री जिस दिन पुरुष या बाज़ार की ज़रुरत के मुताबिक अपने को ढालना बंद कर देगी,वह उसका असली मुक्ति-दिवस होगा ! वह खिलौना या उत्पाद बनना पसंद करेगी अथवा एक अलहदा किरदार ?

74 टिप्‍पणियां:

  1. जिन स्त्रियों के पास केवल शक़्ल होती है उनके लिए अंग्रेज़ी में एक शब्द है blonde ....

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  2. बातें तो सही हैं, लेकिन पोस्‍ट के पहले दो पैरे पढने के बाद लगता है कि इस पोस्‍ट के अस्तित्‍व में आने के लिए भी कोई न कोई स्‍त्री ही जिम्‍मेदार है। अगर हमें उसका नाम पता चल पाता, तो इस पोस्‍ट के बारे में ज्‍यादा गहराई से विचार व्‍यक्‍त किये जा सकते हैं।

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    1. अली सा'ब के रास्ते चल पड़े!
      जय हो !

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    2. ज़ाकिर साहब, फिलहाल स्त्री अपनी एक पहचान के लिए ही जूझ रही है ,उसी के बारे में सोचना होगा !

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  3. बात सही है... सोचने वाली है.. मगर आज सुंदरता के साथ-साथ उसे सुन्दर तरीके से इस्तेमाल करने वाला दिमाग भी ज़रूरी हो गया है!! एक बैलेंस!!

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    1. अक्ल के साथ शक्ल को यदि सोने पे सुहागा कहा जाये तो फिर औरत एक 'मटीरियल' बन जाती है.

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  4. मन की कमजोरियों का लाभ उठाया जाय या उत्पाद की गुणवत्ता पर जोर दिया जाये।

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  5. बहुत कुछ समाहित हो गया स्त्री के बहाने इस पोस्ट में .....लेकिन निर्णय अपना - अपना नजरिया अपना अपना ...!

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    1. ...मगर फर्क जिन पर पड़ता है,उन्हें तो समझना ही होगा.यहाँ नज़रिए का कम ,हालात का ज़िक्र ज़्यादा है.

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  6. एक और संवाद


    अनैतिकता बोली नैतिकता से
    मंडियों , बाजारों और कोठो
    पर मेरे शरीर को बेच कर
    कमाई तुम खाते थे
    अब मै खुद अपने शरीर को
    बेचती हूँ , अपनी चीज़ की
    कमाई खुद खाती हूँ
    तो रोष तुम दिखाते हो
    मनोविज्ञान और नैतिकता
    का पाठ मुझे पढाते हो
    क्या अपनी कमाई के
    साधन घट जाने से
    घबराते हों इसीलिये
    अनैतिकता को नैतिकता
    का आवरण पहनाते हो
    ताकि फिर आचरण
    अनैतिक कर सको
    और नैतिक भी बने रह सको

    http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2008/01/blog-post_9446.html

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    1. समाज और बाज़ार इस खेल में इसलिए लगा है कि एक का मनोरंजन हो रहा है,दूसरे की झोली भर रही है,औरत सीढियाँ चढ़कर भी गिर रही है.

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    2. क्षमा करे औरत नहीं गिर रही हैं ये समाज गिर रहा हैं जो औरत को देवी तो मान सकता हैं इंसान नहीं . क्या सही हैं क्या गलत हैं १८ वर्ष की उम्र के बाद ये सोचने का अधिकार हर लिंग को बराबर हैं .

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    3. रचना जी ,यहाँ बात आम औरत के बारे में नहीं है.जो झूठे ग्लैमर के आगे समर्पण-मुद्रा में हैं,उनके लिए कहा जा रहा है क्योंकि इसका प्रभाव पूरे समाज में है !

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    4. जो झूठे ग्लैमर के आगे समर्पण-मुद्रा में हैं,


      हर औरत की अपनी लड़ाई हैं
      झूठे ग्लैमर में औरत ही नहीं पुरुष भी फसा हैं
      ना जाने कितने पुरुष मॉडल अपने देह को बेचते हैं , शाहरुख़ खान जैसे लोग स्टेज पर कहते हैं की वो कंडोम बेचना चाहते हैं और उनकी वो जगह खाली हैं वहाँ के लिये उनको विज्ञापन नहीं मिला हैं , अक्षय कुमार जैसे लोग रैम्प पर अपनी बीवी से अपनी जींस की जिप खुलवाते हैं जींस का विज्ञापन करने के लिये और हम सब ताली बजाते हैं
      वही अगर प्रियंका चोपरा शराब के विज्ञापन में आती हैं तो हम हल्ला मचाते हैं

      पुरुष समाज अगर नैतिकता की बात करता हैं तो पहले नैतिक खुद बने

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    5. @झूठे ग्लैमर में औरत ही नहीं पुरुष भी फसा हैं

      मैंने कब उसे बरी किया है ?
      क्या स्त्री केवल इसलिए वो सारे काम करे कि उसे पुरुष की बराबरी करनी है,चाहे जैसे कृत्य हों ?
      क्या मेरे विचार केवल एक पुरुष के नज़रिए से देखना उचित है ?
      अगर पुरुष होकर हम आत्म-मंथन को तैयार हैं तो स्त्री क्यों नहीं?
      क्या केवल नारीवाद का झंडा लेकर चलने पर ही हम उसके प्रवक्ता बन सकते है ?
      मेरी मुख्य चिंता बिना हल्ला मचाये अपनी,समाज की कमजोरियों को बताना है और स्त्री इस समाज का अंग है !
      किसी पुरुष के लिखने और बोलने भर से क्या नैतिकता आ जाती है ?
      अपनी कमजोरी को मानना भी बहादुरी है !

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    6. नारीवाद का झंडा लेकर चलने पर ही हम उसके प्रवक्ता बन सकते है ?


      नारीवादी नहीं नारी सशक्तिकरण की ध्वजवाहिका हैं आज की नारी

      नारी सशक्तिकरण का मतलब नारी को सशक्त करना नहीं हैं ।

      नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का मतलब फेमिनिस्म भी नहीं हैं ।

      नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का मतलब पुरूष की नक़ल करना भी नहीं हैं , ये सब महज लोगो के दिमाग बसी भ्रान्तियाँ हैं ।

      नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट का बहुत सीधा अर्थ हैं की नारी और पुरूष इस दुनिया मे बराबर हैं और ये बराबरी उन्हे प्रकृति से मिली है। नारी सशक्तिकरण या वूमन एम्पोवेर्मेंट के तहत कोई भी नारी किसी भी पुरूष से कुछ नहीं चाहती और ना समाज से कुछ चाहती हैं क्योकि वह अस्वीकार करती हैं की पुरूष उसका "मालिक " हैं । ये कोई चुनौती नहीं हैं , और ये कोई सत्ता की उथल पुथल भी नहीं हैं ये "एक जाग्रति हैं " की नारी और पुरूष दोनो इंसान हैं और दोनों समान अधिकार रखते हैं समाज मे ।

      बहुत से लोग "सशक्तिकरण" से ये समझते हैं की नारी को कमजोर से शक्तिशाली बनना हैं नहीं ये विचार धारा ही ग़लत हैं । "सशक्तिकरण " का अर्थ हैं की जो हमारा मूलभूत अधिकार हैं यानी सामाजिक व्यवस्था मे बराबरी की हिस्सेदारी वह हमे मिलना चाहिये ।

      कोई भी नारी जो "नारी सशक्तिकरण " को मानती हैं वह पुरूष से सामजिक बराबरी का अभियान चला रही हैं । अभियान कि हम और आप {यानि पुरूष } दुनिया मे ५० % के भागीदार हैं सो लिंग भेद के आधार पर कामो / अधिकारों का , नियमो का बटवारा ना करे ।

      नारी पुरूष एक दूसरे के पूरक हैं , इस सन्दर्भ मे उसका कोई औचित्य नहीं हैं क्योकि वह केवल नारी - पुरूष के वैवाहिक रिश्ते की परिभाषा हैं जबकि नारी -पुरूष और भी बहुत से रिश्तो मे बंधे होते हैं जहाँ लिंग भेद किया जाता हैं ।


      "नारी सशक्तिकरण " पुरूष को उसके आसन से हिलाने की कोई पहल नहीं हैं अपितु "नारी सशक्तिकरण " सोच हैं की हम तो बराबर ही हैं सो हमे आप से कुछ इसलिये नहीं चाहिये की हम महिला हैं । नहीं चाहिये हमे कोई इसी "लाइन " जिस मे खडा करके आप हमारे किये हुए कामो की तारीफ करके कहे "कि बहुत सुंदर कम किया हैं और आप इस पुरूस्कार की हकदार हैं क्योकि हम नारी को आगे बढ़ाना चाहते हैं " । ये हमारे मूल भूत अधिकारों का हनन हैं ।


      "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक नारियाँ किसी की आँख की किरकिरी नहीं हैं क्योकि वह नारी और पुरूष को अलग अलग इकाई मानती हैं , वह पुरूष को मालिक ही नहीं मानती इसलिये वह अपने घर को कुरुक्षेत्र ना मान कर अपना कर्म युद्ध मानती हैं ।


      "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक महिला चाहती हैं की समाज से ये सोच हो की " जो पुरूष के लिये सही वही नारी के लिये सही हैं ।

      "नारी सशक्तिकरण " के लिये जो भी अभियान चलाये जा रहे हैं वह ना तो पुरूष विरोधी हैं और नाही नारी समर्थक । वह सारे अभियान केवल मूलभूत अधिकारों को दुबारा से "बराबरी " से बांटने का प्रयास हैं ।

      "नारी सशक्तिकरण " को मानने वाले ये जानते हैं की इस विचार धारा को मानने वाली नारियाँ फेमिनिस्म का मतलब ये मानती हैं की हम जो कर रहे हैं या जो भी करते रहे हैं हमे उसको छोड़ कर आगे नहीं बढ़ना हैं अपितु हमे अपनी ताकत को बरकरार रखते हुए अपने को और सक्षम बनाना हैं ताकि हम हर वह काम कर सके जो हम चाहे । हमे इस लिये ना रोका जाये क्युकी हम नारी हैं
      http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2011/01/blog-post_08.html

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    7. @अपनी कमजोरी को मानना भी बहादुरी है !

      ये कह कर आप ने अपनी पोस्ट की हर बात को खुद ही निरस्त्र कर दिया क्युकी अगर आप पुरुष के रवये को उसकी कमजोरी कह कर , बहादुरी बता रहे हैं तो ये क़ोई नयी बात कब हुई . हमेशा से यही कहा जाता हैं पुरुष कमजोर हैं भटक जाता है , पति अगर विवाह से बाहर भी जाए तो पत्नी को बच्चो की खातिर ही सही उसे माफ़ करना चाहिये

      संतोष जी इतनी पुरानी बात पर नया विमर्श करवाने से क्या कुछ हासिल हो सकता हैं
      पुरुष को अपनी कमजोरी पर खुद अंकुश लगाना होगा और अगर पुरुष ये मानता हैं स्त्री उस जैसा बनना चाह रही हैं तब तो ये और भी जरुरी हो ही जाता हैं

      आप से पहले हिंदी ब्लॉग जगत में ऐसे ही लेख सारथी ब्लॉग , अमन का पैगाम ब्लॉग , मिथिलेश दुबे ब्लॉग , सत्यार्थमित्र ब्लॉग और भी ब्लॉग जो अब मिट भी चुके पर आ चुके हैं सब में एक तरफा स्वस्थ बहस हो रही हैं और हमेशा की तरह नारी कटघरे में खड़ी हैं

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  7. जीवन में नियमन का महत्व तो है पर नियमन कहीं ना कहीं दबाव भी डालता है !
    इन्ही दबावों का परिणामी फल है यह सब ......!

    स्त्री विमर्श में घुसपैठ के लिए बधाई!
    आगे का रास्ता जाने कब समझ आई!!

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    1. यह सोचने का जिम्मा हमारा ही है क्योंकि इस खेल के खिलाडी भी तो हम ही हैं !

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  8. http://wohchupnahi.blogspot.com/2010/01/blog-post.html

    a very valuable link mr trevedi i hope you will like reading it because this is the truth of our society about woman

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    1. शुक्रिया...ज़रूरत इस बात की है कि हम जो करते हैं और जो सोचते हैं,उसमें यकसा होना चाहिए !

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    2. रचना जी ,आपके द्वारा दिए गए लिंक पर मेरे यह विचार यहाँ भी:

      स्त्री-विमर्श करना क्या महज़ स्त्रीवादियों के लिए ही है ?इस समाज में यदि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं तो किसी भी तरह की चूक या गलती के लिए दोनों एक-दूसरे को कह या टोंक सकते हैं.
      किसी भी स्त्री का स्वतंत्र होना या उसे किसी नियम में बांधना किसी पुरुष का काम नहीं है,लेकिन जिन वजहों से समाज प्रभावित होता है,उस को कहना उनके मामलों में दखल नहीं है.
      अधिकतर पुरुष बातें करते हैं स्त्रीवादी,दिखाना चाहते हैं आधुनिक समाज के पैरोकार,पर वास्तव में जो वे सोचते हैं क्या ऐसा ही निजी जीवन में करते भी हैं? समाज की हकीकत यही है कि पुरुष स्त्री की दैहिक-सुंदरता से ज़्यादा मुग्ध होता है,बनिस्पत उसके मौलिक गुणों के. यही बात स्त्री के लिए अगर कही जाती है कि उसे अपने को पहचानना है तो कहीं से यह पुरुष-सत्ता का दंभ या नैतिकता का पाठ नहीं लगना चाहिए !

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    3. @स्त्रीवादियों
      इस शब्द का मतलब ही क्या रह जाता हैं अगर सब इस विषय पर खुल कर मंथन करे , क्यूँ नारी सशक्तिकरण पर लिखने , बराबरी की बात करने वालो को को नारीवादी का तमगा पहना दिया जाता हैं , क्यों नारीवादी शब्द महज एक गाली की तरह प्रयुक्त होता हैं क्यूँ नियम , शील की बात औरत के लिये ही मान्य हैं
      -----------
      @यदि स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक माने गए हैं

      यही सबसे बड़ा भ्रम हैं , हमारे समाज ने स्त्री पुरुष को पूरक नहीं पति पत्नी को पूरक माना हैं
      स्त्री और पुरुष को पूरक मानने का मतलब होता हैं की हर विपरीत लिंगी एक दूसरे से दैहिक स्तर पर सम्बन्ध बना सकता हैं क्या ये संभव हैं ?? पूरक की परिभाषा केवल और केवल पति पत्नी तक सिमित हैं

      ---
      लेकिन जिन वजहों से समाज प्रभावित होता है,उस को कहना उनके मामलों में दखल नहीं है.

      समाज में अगर नारी को बराबरी का दर्जा नहीं मिला हैं अगर समाज में पुरुष का अहोदा बड़ा बना दिया गया हैं , और अगर समाज में रोल को सही नहीं डिफाइन किया गया हैं तो पुरुष का बोलना तब उचित हैं जब बराबरी हो जाए जब तक तराजू का बैलेंस सही नहीं होता तब तक नारी पर ये तंज कसना की वो बाज़ार में उतर गयी हैं गलत हैं सजा का हकदार ये समाज हैं जिसने ऐसा करने का प्रावधान खोल दिया हैं
      -----
      यही बात स्त्री के लिए अगर कही जाती है कि उसे अपने को पहचानना है तो कहीं से यह पुरुष-सत्ता का दंभ या नैतिकता का पाठ नहीं लगना चाहिए !

      बड़ा सिंपल हैं
      आप कहते हैं स्त्री को पहचानना होगा
      मै कहती हूँ वो पहचान चुकी हैं , वो जान चुकी हैं की वो बराबर हैं , वो जान चुकी हैं की संविधान और कानून में उसकी स्थिति क्या हैं , उसको सही और गलत पता हैं
      पुरुष महज ये चाहता हैं की "पुरुष का सही " नारी को "सही " लगे
      पुरुष चाहता हैं की नारी विद्रोह करे तो उससे पूछ करे , उसके हिसाब से करे
      पुरुष चाहता हैं की नारी "सोचे " पर "सोच " पुरुष की हो
      ये बदल रहा हैं और इस बात को पचाने में पुरुष का हाजमा ख़राब होता लग रहा हैं

      नारी के पास अपनी सोच का एक नज़रिया हैं पुरुष को उस नज़रिये से अब देखना होगा ना की अपने नज़रिये को स्थापित करना होगा .

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    4. अगर आप ध्यान से यह पोस्ट पढ़ें तो पाएंगी कि पुरुषों की आलोचना ज़्यादा की गई है.बिना किसी पूर्वाग्रह के स्वस्थ बहस करने में क्या कोई हर्ज है?

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    5. नहीं आप ने पुरुषो की आलोचना करके स्त्री को सही रास्ते पर चलने की शिक्षा मात्र दी हैं . इस तरह की स्वस्थ बहस केवल एक तरफ़ा हो सकती हैं . स्वस्थ बहस तब होगी जब आप पहले उनको सुधारने की सही रास्ते पर चलने की सलाह दे जो गलत रास्ते पर सदियों से चल रहे हैं .
      ये हमेशा बहस इस बात पर ही आ कर अटकती हैं की स्त्री के लिये सही रास्ता क्या हैं , होना चाहिये क्युकी समाज का भला स्त्री के सही रास्ते पर चलने से हैं क्या समाज का भला पुरुष के सही रास्ते पर चलने से नहीं होगा . तो विमर्श की पहली सीढ़ी हैं नैतिकता का पाठ पुरुषो के लिये

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    6. आपके स्त्री-हितों के प्रति जागरूकता का प्रशंसक हूँ,पर जितना आपके विचारों का महत्व है उतना ही मेरे भी !

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  9. मुझे तो लगता है और यह मेरा निजी अनुभव भी रहा है कि सच यह कि पुरुष मनोहर निरखत नारी .......ज्ञानशील पुरुष नारी के और गुणों को भी मद्दे नज़र रखते हैं -यह भी मेरा अनुभव रहा है कि ज्यादातर सुंदर औरतें सीरत से भी सुन्दर होती हैं एंड वाईस वर्सा..जबकि असुंदर मनुष्य प्रायः भीतर से बहुत सुन्दर होते हैं-आप अपना ही उदाहरण ले लीजिये :)

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    1. हमें अपनी कमजोरियाँ पता हैं,पर इसके लिए हमीं अकेले क्यों दोषी ? इस बदलते समाज और बाज़ार का असर तो हम पर भी पड़ेगा ही !

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  10. सीधी सी बात यह है हर कोई किसी भी चीज का भरपूर फायदा उठाना चाहता है. अब जितनी भी मिस ..... बनती हैं, वे पहले समाजसेवा के क्षेत्र को अपना ध्येय बताती हैं और बाद में फिल्मों में दिखाई देती हैं. इस लिए पुरुष हो या महिला सब अपने हितों की बल्कि स्वार्थों की पूर्ति हेतु लगे हुए हैं. महिलओं की स्थिति दूसरे पर आर्थिक रूप से आश्रित होने के कारण अधिक खराब है.

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    1. कुछ लोग ज़रूर इस काम में लगे हुए हैं,बहुत सी स्त्रियाँ अभी भी अपने गुणों को पहचानती हैं और वे चुपचाप काम में लगी हुई हैं !

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  11. सदियों से चल रहे अंतहीन विमर्श का एक हिस्सा

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  12. एक रोचक पोस्ट। विचारोत्तेजक विमर्श।
    दोनों से लाभान्वित हुआ।

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    1. ..अपने विचारों से हमें रास्ता दिखाते तो हम भी लाभान्वित होते !

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  13. स्त्री को बाजार में बिठाने वाले पुरूष अब चकाचौंध से घबड़ाने लगै हैं!

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    1. ...इसमें केवल एक का अपराध नहीं है !

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    2. स्त्री को बाजार में बिठाने का अपराधी एक और केवल एक है..पुरूष।

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  14. क्या ही अच्छा हो की पुरुष नारी को खुद ही निर्णय लेने दें, की उसे क्या चाहिए|

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    1. आप यदि पोस्ट पढ़ें तो यही बात उभरकर आएगी....फिर भी यह पोस्ट केवल स्त्रियों को संबोधित नहीं है,वरन पूरे समाज को है !

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  15. सूरत के साथ सीरत भी सुन्दर हो तो , सोने पे सुहागा हो जाता है ।
    वैसे स्त्री को फेटल एट्रेक्शन भी कह सकते हैं । :)

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  16. दरअसल समस्या यहाँ आती है जब हम किसी मुद्दे के प्रति श्वेत श्याम मानसिकता रखते हैं!
    मतलब यह कि सारे निष्कर्ष और विचार उन्ही एक दो मुद्दों पर ही आधारित हो जाते हैं, विमर्श किसी भी मुद्दे पर हो अंततः समग्रता में क्या निकला ...महत्वपूर्ण वही होगा!

    समाज में स्त्री की स्थिति में सुधार और बराबरी का आज के समाज में पक्षधर मैं भी समझता हूँ और निश्चित रूप से हम सब को होना ही चाहिए .....पर कुछ मुद्दे और उन पर हमारी समझ में इतना जंग लगा रहता है कि वह सब हमारे डीनए तक पहुँच गया है ....जाहिर है डीनए तक परिवर्तन में समय तो लगेगा ....और तब तक यह जद्द्दोजहद जारी रहनी चाहिए !

    बकिया समाज में बराबरी के लिए किस स्तर और किस स्थिति के साथ कितना उचित और कितना संभव है ...इन पहलुओं पर भी विचार जरूरी है ....बकिया स्त्री विमर्श किसी स्त्री या पुरुष के एकल अधिकार की चीज नहीं है!

    जय जय !

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    1. बकिया समाज में बराबरी के लिए किस स्तर और किस स्थिति के साथ कितना उचित और कितना संभव है .

      there is constitution
      there is law
      and we all need to go by the rule if we are really interested in improving our society

      the rules of society should be SAME as the law / constitution and in larger context for all genders { as of now declared genders are 5 }

      any one can discuss but when anyone starts a discussion on hindi blog it would be good read some previous entries of last 5-7 years related to the topic and take up from those discussions rather then to repeat the often quoted social stigmas and justify them

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    2. there is constitution
      there is law

      हम सब जानते हैं और कानूनी रूप से मानते भी हैं ...पर क्या समाज में बदलाव केवल कानूनों से ही संभव है ....क़ानून की अपनी महत्ता है पर सामाजिक बदलाब के लिए तो कुछ और करना और कहना होगा ....मेरा आशय उस तरफ था और अब भी है !

      and we all need to go by the rule if we are really interested in improving our society
      हाँ! ऐसा हम सब को यथासंभव करना चाहिए ...पर समाज में क़ानून भी स्थायी समाधान नहीं दे सकते हैं परिवेश और समाज में शाश्वत मूल्यों के साथ नए परिवर्तन को आत्मसात करने के लिए सामाजिक परिवर्तन की चाल भी बढानी ही पड़ेगी!

      read some previous entries of last 5-7 years related to the topic and take up from those discussions rather then to repeat the often quoted social stigmas and justify them
      सहमत हूँ !
      ....पर जाहिर है इस आधार पर आधे अधूरे का तो आरोप लगाया जा सकता है ...पर पूर्णतयः खारिज करना समीचीन ना होगा!

      हटाएं
    3. @ रचना जी!
      सबसे ज्यादा मैं आपके विचार यकीनन अपने इस बिंदु पर जानना चाहता था!


      जाहिर है डीनए तक परिवर्तन में समय तो लगेगा ....और तब तक यह जद्द्दोजहद जारी रहनी चाहिए !

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    4. प्रवीण जी,कुछ पूर्वाग्रहों को भी हमें आत्मसात करने की आदत होनी चाहिए !

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    5. पर पूर्णतयः खारिज करना समीचीन ना होगा!
      jab ek saa likhaa jayegaa to khud hi kharij ho jayegaa
      aap jinko samjhaana chahtey haen , jinko disha daena chahtey haen wo is disha ko pehlae hi kharij kar chuki haen
      aaj ki naari ki disha aur raastaa haen equality wo kisi tarah bina parivaar kae tootae aaye agar is par baat ho to kharij naa ho kar aagey kaa rastaa haen

      equality , morality should be same for man and woman
      woman empowerment is based on the fact that we are born equal and we have a RIGHT TO THINK WHAT IS BEST FOR US
      @ रचना जी!
      सबसे ज्यादा मैं आपके विचार यकीनन अपने इस बिंदु पर जानना चाहता था!
      maere vichaar ek sae haen aur wo wahii rahegae naetiktaa kaa paath ab purush padh hi lae anyathaa aanae vaale samay me kahin gender bias ko laekar pareshani me naa pad jayae

      कुछ पूर्वाग्रहों को
      santosh ji badaltey samay ko pehchannaa jaruri haen ho saktaa haen jo aap ko purvagrah lagtaa ho aap ko uski utni jaankari naa ho

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    6. jab ek saa likhaa jayegaa to khud hi kharij ho jayegaa
      इसमें क्या संदेह? हालाँकि जिस सन्दर्भ में मैंने इसे प्रयोग किया वह अनुत्तरित सा ही लगा!


      aap jinko samjhaana chahtey haen , jinko disha daena chahtey haen wo is disha ko pehlae hi kharij kar chuki haen
      ना हम किसी को समझाना चाहेंगे और ना ही दिशा देना चाहेंगे ...जब तक कि उसे दरकार ना हो! क्योंकि खारिज करना जितना आसान है उतना ही उसे अपने से वास्तविक रूप से दूर रखना मुश्किल और कठिन! हालाँकि यह कठिनाई परिवर्तन की हर राह पर आती है ..... इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है !


      maere vichaar ek sae haen aur wo wahii rahegae
      अपने विचारों में टिका रहना अक्सर अच्छा तो हुआ ही करता है .....पर कहीं ना कहीं आपकी यह जिद आपको किसी एजेंडा के प्रति ही सीमित करती है ....मुझे आपके किसी एजेंडे विशेष के प्रति अनुराग दिखाने में कोई आपत्ति नहीं है .....पर मान कर चलता हूँ कि यह जिद जड़ता से बची रहे! अक्सर परिवर्तन वही सफल होते देखे गए हैं .....जो परिवर्तनशील और लोचदार हों ...खैर इस मुद्दे को यहीं छोड़ते हैं!




      सारे मुद्दों पर मूलरूप से आप द्वारा उठायी गयी आपत्तियों के बावजूद मुझे इस तथ्य से नितांत वैचारिक असहमति है कि केवल स्त्री ही स्त्री के भले और परिवर्तन की वाहक हो सकती है! हालाँकि यह कथन आपने कहा तो नहीं .....पर शायद यह बू आपके इस कथन naetiktaa kaa paath ab purush padh hi lae anyathaa aanae vaale samay me kahin gender bias ko laekar pareshani me naa pad jayae से झलक रही है?

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    7. मुझे इस तथ्य से नितांत वैचारिक असहमति है कि केवल स्त्री ही स्त्री के भले और परिवर्तन की वाहक हो सकती है! हालाँकि यह कथन आपने कहा तो नहीं .....पर शायद यह बू आपके इस कथन


      प्रवीण जी
      मैने कभी ऐसा नहीं कहा हैं ना ही मै ये सोचती हूँ . समाज में रहती हूँ अपने आस पास देखती हूँ और पाती हूँ की नैतिकता . शील , संस्कार सब का दाइत्व स्त्री पर हैं . बच्चे असंस्कारी हो तो माँ जिम्मेदार हैं , पति विवाह से इतर सम्बन्ध रखे तो दूसरी औरत जिम्मेदार हैं इत्यादि . हर जगह दोहराव हैं और सब से बड़ा दोहराव हैं की स्त्री के लिये क्या सही हैं उसको क्या करना चाहिये , उसको कैसे रहना चाहिये , ये सब पुरुष / समाज { जिस में कंडीशन की हुई स्त्री भी हैं } बतायेगा . स्त्री के लिये रोल डिफाइन हैं अगर उससे इतर वो चलेगी तो उसको छिनाल , चरित्र हीन और पुरुष बनने का तमगा दिया जाएगा .
      नैतिकता के प्रति पुरुष इतना दोहराव क्यूँ रखता हैं , और ध्यान दे जब मै पुरुष कहती हूँ तो इसमे वो स्त्री स्वयं शामिल हैं जो समाज की कंडिशनिंग का शिकार हैं .
      जो पुरुष के लिये नैतिक हैं वो स्त्री के लिये अनेतिक क्यूँ हो जाता हैं .
      समानता की एक लम्बी लड़ाई में मै भी अपनी आहुति डालती रहती हूँ कम से कम इतनी तसल्ली जरुर हैं की मुह देखी नहीं करती . कितने नामो से मुझे इस हिंदी ब्लॉग जगत में बुलाया जाता हैं क्यूँ महज इस लिये क्युकी मै ब्लॉग से ब्लॉग जा कर स्त्री के चित्रों को हटवा रही हूँ , मै ब्लॉग से ब्लॉग जा कर उन बातो पर आपत्ति करती हूँ जहां स्त्री के प्रति दोयम का दर्जा हैं , जहां स्त्री के शरीर को केवल प्रोडक्ट माना जाता हैं . ना जाने कितनी जगह आपत्तियां दर्ज की हैं . और खुश हूँ की अब मुझ से पहले और ब्लॉग लिखती महिला आपत्ति दर्ज करवा देती हैं http://bulletinofblog.blogspot.com/2012/01/blog-post_19.html
      , ये जागरूकता आये की हम बराबर हैं ,कोई अगर मजाक में भी हमे दोयम बनाये या किसी भी स्त्री को बनाये तो हम आपत्ति करे

      मेरी जिद इस दिशा में हैं . क्या आप बता सकते हैं अगर कोई पुरुष इस दिशा में काम करता हैं तो वो सकारात्मक सन्देश मान लिया जाता हैं और मुझे पुरुष विरोधी , नारी वादी , परिवार का महत्व ना समझने वाली और भी बहुत कुछ क्यूँ कहा जाता हैं . फिर एक लिंक दे रही हूँ http://chotichotibaate.blogspot.com/2010/12/blog-post_15.htmlताकि सनद रहे की जो लोग इतने सकारातमक हैं इस ब्लॉग जगत में वो कितने स्त्री अधिकार विरोधी हैं की उस स्त्री के खिलाफ लिखते हैं जो केवल एक प्रयास कर रही हैं की हिंदी ब्लॉग जगत में महिला के अधिकारों के प्रति महिला में जागरूकता आये

      अब अगर आप लिंक पर जा कर वापस आकर अपनी बात कहेगे तो लगेगा का की स्त्री की चिंता हैं आप को भी वर्ना केवल शब्दों का खेल आप और संतोष त्रिवेदी जी खेल रहे हैं जो असंख्य बार पहले भी खेला जा चुका हैं


      gender bias

      the laws are very strict but in india they are still not implemented . and it really leaves me worried about our men folk because they dont understand the word "gender bais " they feel woman are made for the pleasure of man and in coming years this area will be problemetic

      if freedom of speech is acceptable then we have to make laws to punish those who use use freedom of speech to abuse woman .
      the laws are very much there only thing is woman is not vocal enough to protest but in last few years lot of changes have come http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2010/04/blog-post_24.html

      young girls are protesting for their rights and that is makin man insecure so its important

      naetiktaa kaa paath ab purush padh hi lae anyathaa aanae vaale samay me kahin gender bias ko laekar pareshani me naa pad jaya

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  17. बाकी टिप्पणियों पर ध्यान दूंगा तो मेरी प्रतिक्रिया प्रभावित हो जायेगी अतः अभी केवल आपके आलेख पर फोकस कर रहा हूं ...

    @ पोस्ट ,
    प्रविष्टि के पहले से लेकर तीसरे पैरे तक में आलेख तीन मुख्य बातों पे जोर देता है ,एक स्त्री का प्रबल आकर्षण , दो स्त्री अब तक समझी नहीं गई है ,तीन आकर्षण के चलते स्त्री का इस्तेमाल बाज़ार हित के लिए किया जा रहा है !
    आलेख के चौथे से लेकर छठवे पैरे तक में एक कथन यह कि पुरुष की उन्नति के पार्श्व में स्त्री का हाथ होता है और दूसरा यह कि स्त्री बाजार के आगे समर्पण करते हुए अपने मूल गुणों की अनदेखी कर रही है !
    अब अगर आलेख को रेखांकित किये गये बिंदुओं के तारतम्य में परखा जाये तो यह स्पष्ट होता है कि पुरुष स्त्री को अब तक समझ नहीं पाया है किन्तु इससे यह साबित नहीं होता कि स्त्री स्वयं को नहीं समझती !
    मुद्दा यह है कि पुरुष स्त्री के प्रति जो भी आकर्षण रखता है अगर उसे नैसर्गिक मानकर उससे आगे की चर्चा की जाये तो संवाद में दोतरफा तर्क इस्तेमाल किये जाने चाहिये ,मसलन तर्क ये कि स्त्री , पुरुष के नीति वचनों से बंध कर चले तो इसका उलट तर्क यह होगा कि पुरुष क्यों नहीं स्त्री के नीति वचनों से बंध कर चलें ? कहने का आशय यह है कि स्त्री और पुरुष दो भिन्न लिंगीय सामाजिक वर्ग हैं उनमे से किसी एक के एकाधिकार /विशेषाधिकार की स्वीकृति से आलेख की तथ्यगत/ चर्चागत तटस्थता तिरोहित होती है !
    इसलिए आलेख की इस चिंता से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि जब स्त्री स्वयं निर्णय लेने का सामर्थ्य रखती हो तो पुरुष ( काज़ी )शहर के अंदेशे में दुबला होता फिरे ! यदि स्त्री यह निर्णय लेती है कि उसके लिए क्या व्यवसाय उचित है तो यह उसका अधिकार है ठीक वैसे ही जैसे पुरुष के अपने अधिकार होते हैं ! आलेख के विषय में सैद्धांतिक रूप से मेरा अंतिम अभिमत यही होगा !

    किन्तु...कतिपय व्यावहारिक कठिनाइयां और दृष्टान्त मुझे स्त्री पुरुष वर्गीय संश्लिष्टताओं के चलते उपरोक्त आदर्श स्थिति के मौजूद नहीं होने का संकेत देते हैं ,यथा महानगरीय परिस्थितियों की स्त्री अपनी स्वतंत्रता का उद्घोष करने में सक्षम दिखाई देती है तो ग्रामीण परिवेश की स्त्रियां आज भी पुरुष की मुखापेक्षी हैं या कहिये कि उनके जीवन , पुरुष के हस्तक्षेप के लिए आज तक अभिशापित हैं ! नि:संदेह हमारे देश की बड़ी जनसँख्या आज भी ग्रामीण प्रकृति की है सो समस्या यह है कि ग्रामीण परिवेश की स्त्रियां जब तक स्वयं सामर्थ्य हासिल नहीं कर लेतीं तब तक पुरुष उनके विषय में निर्णय लेने की हिमाकत अगर करते हों तो उन्हें कौन रोक सकता है ,यह पहल तो स्वयं स्त्रियों को ही करनी होगी ! एक समस्या और भी है कि क्या स्त्री पुरुष के मध्य कोई सीधी सपाट विभाजन रेखा खींची भी जा सकती है जबकि दोनों के सामाजिक सम्बन्ध इनके पारस्परिक अधिकार क्षेत्रों और कर्तव्यों को गडमड करने की सम्भावना के चलते बड़े अस्पष्ट / अनिश्चित से हैं ! क्या संबंधों की सहजता और भावनात्मक चिंताओं / संवेदनात्मक जुड़ाव और पूर्वाग्रहों के बीच के फर्क को नापने का कोई ठोस पैमाना भी है हमारे पास ! उदाहरण के लिए कोई पति या पत्नी एक दूसरे के लिए कोई सुझाव /अभिमत दें तो यह कैसे तय किया जाएगा कि यह सहज चिंता आधारित परामर्श है अथवा इसमें कोई पूर्वाग्रह भी सन्निहित है ? खैर मैं बहस को आलेख से खिसकाना नहीं चाहता मेरा उद्देश्य केवल संबंधों की संश्लिष्टता की ओर ध्यान आकर्षित करना था !

    बहरहाल आलेख के विषय में अपना अभिमत पुनः स्पष्ट करना चाहूँगा...मेरे विचार से निर्णय लेने का अधिकार सम्बंधित के स्व विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिये ! किन्तु इसका मतलब यह भी नहीं है कि आप चिंतायें करना छोड़ दें ! चिंतायें यदि सहज होंगी तो सम्बंधित पक्ष उन्हें महसूस करके स्वीकार भी कर सकता है अन्यथा रिजेक्ट करना उसका अधिकार तो है ही !

    अरे यार यह बहुत बड़ा मुद्दा है एक छोटी सी टीप फिलहाल यहीं दम तोड़ रही है !

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    2. अली साब...आपने विस्तार से इस पोस्ट पर चर्चा की.हम सब चर्चाकारों का मुख्य उद्देश्य समाज में किसी प्रकार की असंगति या किसी वर्ग की अधोगति को लेकर चिंता करना है.इसमें बहस लिंग,वर्ग या वाद से परे हो तभी बेहतर है.

      हमारी मुख्य चिंता स्त्री के प्रति पुरुष के अंध-आकर्षण को लेकर है,जिसमें बाज़ार का दबाव व प्रभाव भी साफ़ दीखता है.स्त्री को क्या करना है,उसके लिए क्या उचित है,या पुरुष को क्या करना है,उसके लिए क्या उचित है,इसके लिए हम काजी तो नहीं मगर बतौर समाज के हिस्सेदार,अपनी चिंताएं तो ज़रूर साझा कर सकते हैं.

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    3. अरे संजय जी का इस्माइली कहां गया ? :)

      संतोष जी , अधोगति या परमगति तय करने का सामर्थ्य या स्वविवेक अथवा अधिकार उस वर्ग विशेष का क्यों नहीं होना चाहिये ?
      अब अगर स्त्रियाँ , पुरुषों की सदगति / असदगति तय करने लग जायें तो कैसा रहेगा :)

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    4. लगता है संजय जी को इस पोस्ट की गंभीरता का भान हो गया है !

      ....तो पुरुष सीधे नरक में जायेंगे,और वे अपने गुणों को प्रदर्शित करते हुए उनके पीछे-पीछे वहाँ पहुँच जाएँगी !!

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  18. आज भी स्त्री कहाँ मुक्त हुई है आज भी कहाँ पूर्ण महिला सशक्तिकरण आ गया है जब तक स्त्री खुद इस बात को नही समझेगी और नही जानेगी और जब तक अपने जीवन मे नही उतारेगी तब तक उसका दुरुपयोग होता ही रहेगा फिर चाहे महिला सशक्तिकरण के नाम पर हो या रूढिवादी परंपराओं के नाम पर ।

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    1. बिलकुल,उसे यह भी समझना होगा कि उसका उपयोग कोई अपने हितों के तईं क्यों और किस हद तक कर रहा है ?उसके गुणों का उपयोग होना और देह का ,दोनों अलग धाराएँ हैं !

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  19. स्त्री क़ोई वस्तु नहीं हैं
    जिसके दुरुपयोग @vandana / उपयोग @santosh trevedi की बात की जाए
    ना स्त्री के शरीर की और ना ही उसके गुणों की
    ये ही सोच तो बदलनी है

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    1. आप एक तरफ यह तो मानती हैं कि मॉडलिंग या ग्लैमर में स्त्री शाहरुख या सलमान बन रही है तो क्या बुरा है,भले ही इस चक्कर में वह स्वयं एक 'प्रोडक्ट' बन जाये ,फिर उसके उपयोग या दुरूपयोग से क्या खटकना ?
      यहाँ चर्चा इस बात की है कि समाज या बाज़ार उसे उसके अंदरूनी गुणों की खातिर तवज्जो दे रहा है या खाली दैहिक-सुंदरता को !जाने-अनजाने वह 'यूज' तो हो रही है !

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    2. मॉडलिंग या ग्लैमर में स्त्री शाहरुख या सलमान बन रही है
      aap phir bhatak gaye
      sharukh yaa salmaan khudaa nahin haen koi stri unjaesee baane
      maene upar hi kehaa haen aaj ki stri "नारी सशक्तिकरण " की समर्थक महिला चाहती हैं की समाज से ये सोच हो की " जो पुरूष के लिये सही वही नारी के लिये सही हैं ।
      mae naa sharukh ko product maantii hun naa kisi model ko
      yae sab unki jeevikaa haen

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    3. खाली दैहिक-सुंदरता को !

      ab is kathan par hi sara vivaad haen kyuki stri ko deh kae rup daekhna hi galt haen aur us par behas to sadiyon sae hoti aa raheee haen
      jab tak samaj uski deh sae kamaa rahaa thaa sab theek tha ab wo khud kamaa rahee to wo galat haen

      shoshan ho to theek , jeevikaa to to galat
      हे नर , क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम

      क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
      कि नारी को हथियार बना कर
      अपने आपसी द्वेषो को निपटाते हो
      क्यों आज भी इतने निर्बल हो तुम
      कि नारी शरीर कि
      संरचना को बखाने बिना
      साहित्यकार नहीं समझे जाते हो
      तुम लिखो तो जागरूक हो तुम
      वह लिखे तो बेशर्म औरत कहते हो
      तुम सड़को को सार्वजनिक शौचालय
      बनाओ तो जरुरत तुम्हारी है
      वह फैशन वीक मे काम करे
      तो नंगी नाच रही है
      तुम्हारी तारीफ हो तो
      तुम तारीफ के काबिल हो
      उसकी तारीफ हो तो
      वह "औरत" की तारीफ है
      तुम करो तो बलात्कार भी "काम" है
      वह वेश्या बने तो बदनाम है

      हे नर
      क्यों आज भी इतने कमजोर हो तुम
      http://mypoemsmyemotions.blogspot.com/2007/09/blog-post_385.html

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    4. रचना जी,अगर पुरुषों से मुकाबले के नाम पर औरतें ऊल-जलूल विज्ञापन व अंग-प्रदर्शन करती हैं तो क्या इसी से उनके विकसित और आधुनिक होने का पता चलेगा ?

      अभी भी बहुत स्त्रियाँ झूठे ग्लैमर से दूर रहकर अपनी पहचान बना रही हैं,उनसे भी प्रेरणा ली जा सकती है.

      बकिया,आपके कुछ पूर्वाग्रहों का उत्तर शायद किसी के पास नहीं हो !

      हटाएं
  20. अगर पुरुषों से मुकाबले के नाम पर औरतें ऊल-जलूल विज्ञापन व अंग-प्रदर्शन करती हैं तो क्या इसी से उनके विकसित और आधुनिक होने का पता चलेगा ?
    trevidi ji maene aesa kab kehaa
    maenae kewal itna kehaa haen ki kahin koi mukaabla haen hi nahin
    yae purusho kaa bhrm haen ki stri mukabla kar rahee haen
    agar purush maantaa haen stri mukbla kar rahee haen aur usko copy kar raheee haen to purush ko khud apnae aachran ko sudharna hoga
    aur tarko ko purvagrah keh kar aap samvaad kaa rastaa band kar daetae haen apnae hi hatho

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    1. में रचना जी से पूर्णतया सहमत हुं....ये बहस अगर स्त्री को हराने के लिए हैं तो इसकी शुरुआत में ही पुरुष हार गया हैं..!! कई पुरुष भी तो बाज़ार में हैं....फिर उनके बारे में वो सब कुछ क्यों नही कहा जा रहा जो यहाँ स्त्रियों के बारे में कहा जा रहा हें?? समाज को बदलिए...क्योंकि स्त्रियाँ इसी समाज का हिस्सा हैं.....!

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    2. डिम्पल जी,
      लगता है आपने अपनी धारणा रचना जी की टीपें पढकर बनाई है,वर्ना इस पोस्ट में जो विमर्श हुआ है उसके आधार पर किसी को जिताने या हारने के लिए नहीं है.
      एक तरफ आप हमसे समाज को बदलने को कह रही हैं,जबकि हमने जब स्त्री,पुरुष और बाज़ार को इस बारे में कहा तो,यह कहा जाता है कि आप स्त्रियों के बारे में क्यों कह रहे हैं.स्त्रियाँ इसी समाज का अंग हैं कि नहीं?
      हमारी पोस्ट में कहे हुए एक-एक वाक्य का जवाब मैं दे सकता हूँ,और हाँ,सबसे ज़्यादा तो हमने पुरुष को ही दोषी कहा है.
      आत्म-मंथन का समय है,इस पर आपकी हमारी ,सबकी ज़िम्मेदारी है !दिलीप कुमार और सलमान एक हैं क्या जैसे नूतन और मल्लिका शेरावत या पूनम पाण्डेय ?

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  21. माना कि स्‍त्री पुरुष के लिए पहेली रही है
    परंतु स्‍त्री भी पुरुष 'पहला' ही चाहती है
    इसमें न बाजार का दवाब है
    न विज्ञापन का असबाब है
    यह तो देह का दाह है
    जो नई नई राहें खोल रहा है
    राहें कुछ के लिए नई
    और बाकी के तईं पुरानी हैं
    यही सदियों से होता रहा है
    और युगों तक यही होता रहेगा
    मानसिकता में कहीं कोई फर्क नहीं है
    बस कहीं पर किसी का जिक्र नहीं है
    कोई जीत कर भी हार पहनना चाहता है
    और कोई हार कर भी खुश रहता है
    हार में जीत का अहसास चिरंतन है
    इस चिरंतन के आगे तन नहीं मन बेबस है
    मन चाहकर भी तन को अस्‍थाई नहीं मान रहा है
    यह भ्रम ही उससे वह सब कुछ करवा रहा है
    जो तन के लिए नहीं किया जाना चाहिए था
    मन के लिए कोई करता भी नहीं
    परंतु बाजार के दवाब पर भला किसका वश चला है
    हर कोई विज्ञापन के जरिए बाजार की सीढ़ी चढ़ने
    और उस पर फतेह हासिल करने को उतावला है।
    मन तो बावला है
    निरा बावला है
    बस पाबला जी को मत बतलाइएगा।

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    1. आपकी कबिताई में काफी-कुछ छिपा है,पढ़ने बाला यदि बांच सके तो !

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  22. त्रिवेदी जी क्या आपने किसी ऐसे ब्लॉग पर जहां महिला का चित्र लगा हो और उसका पोस्ट से लेना देना नहीं हो वहाँ कभी कोई आपत्ति दर्ज करायी हैं ?
    मैने हिंदी ब्लॉग जगत मे असंख्य बार ऐसा किया हैं और आज भी करती हूँ लेकिन मानसिकता वही की वही हैं
    देखिये ये दो लिंक और अगर समाज को बदलना हैं तो आपत्ति दर्ज करवाना शुरू कीजिये आप से आग्रह हैं नारी का हित जिस मे हो पुरुष करे या नारी काम वही होना चाहिये
    और अगर आप आपत्ति दर्ज नहीं कराते हैं तो आप भी नारी को विमर्श की वस्तु मानते हैं और चाहते हैं विमर्श पुरुष का हो और माने नारी

    http://hindini.com/fursatiya/archives/2540

    http://indianwomanhasarrived.blogspot.com/2008/10/blog-post_9296.html

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