7 सितंबर 2026

 घर में रहते घर ढहते, 

बाहर जाते पुल ढहते,

सड़कें धँसतीं, गड्ढे हँसते, 

वो केवल ‘फू-फा’ करते!


जान हमारी सबसे सस्ती, 

मौत की पूरी गारंटी,

अच्छे दिन फिर भी आए, 

दसों दिशाओं में कहते!


असमय जिसका लाल गया, 

माता विकल दुआर ताकती,

कब लौटेगा राजा बेटा, 

वो राहत का दम भरते!


लूट-खसोट औ कदाचार पर, 

बात अगर कोई करता,

नक्सल कहकर वो चिल्लाते, 

बिकी मीडिया संग बहते !


मंदिर लूट छला हिंदू को, 

ख़ुदा को भी बेदख़ल किया,

सब धर्मों को ख़ूब निचोड़ा, 

फिर ख़ुद को रक्षक कहते!


-संतोष त्रिवेदी

6 सितंबर 2026

 घोर बादल प्रलय के छँटने लगे हैं,

वो फिर पुराने वायदे रटने लगे हैं।


मंच कोई भी नहीं वो छोड़ते हैं अब,

ख़ुद की कही हर बात से हटने लगे हैं।


पढ़ने-लिखने का कोई मौसम नहीं रहा,

धर्म माथे पर सजा, मैदान में डटने लगे हैं।


नायक नए तैयार होते जा रहे हैं रोज़,

इंसाफ़ और सच भीड़ में पिटने लगे हैं।


रहनुमाओं से हमें उम्मीद अब भी ख़ूब है,

झूठ के परचे हमारे हाथ से बँटने लगे हैं !


लूट जारी है मुसलसल देश भर में आपकी,

हे राम! यह सब देखकर आइने फटने लगे हैं !


— संतोष त्रिवेदी


2 सितंबर 2026

अव्वल दर्जा

 वोट चुराकर वो उछले हैं,

जीडीपी में फिर फिसले हैं।

झूठा डाटा पेश कर रहे 

देखो वो कितने छिछले हैं!


आत्म-मुग्ध रहते ये हरदम,

काम कोई अच्छा है।

हारी बाज़ी हरदम जीतें,

लोकतंत्र के ये पुतले हैं!


देश की मिट्टी रोज़ कुरेदें,

पुरखों की मूरत ढँकते।

भाईचारा ताक पे रक्खा 

मछली ताके वो बगुले हैं!


रोज़ उठाए फिरते झोला,

तंत्र, न्याय सब मुट्ठी में।

जल, जंगल, ज़मीन सब बेचा,

मंदिर तक में अब घपले हैं!


हिंदू-मुस्लिम राग अलापें,

राष्ट्रवाद के चोले में।

हम तो समझ रहे थे दोयम,

अव्वल दर्जे के निकले हैं!


- संतोष त्रिवेदी