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23 अप्रैल 2011

सड़क पर चलते हुए !

सड़क पर चलते हुए अकसर,
सहम जाते हैं हम
बिलकुल बाएँ चलते हुए,
'ट्रैफिक' के सारे नियमों को ध्यान में रखते हुए,
संभल-संभल कर कदम बढ़ाते हैं,
पर,
साभार:गूगल बाबा
कभी पीछे से,कभी आगे से
इतने पास से गुज़रता है वाहन कोई,
कि लगता है कि बस,अभी 'गया' था...

देखता हूँ सड़क पर चलते हुए,
गाड़ियों का *अम्बार 'सुंचा' है
आदमी से ज्यादा गाड़ियाँ दिखती हैं,
थोड़ी-सी सीधी जगह नहीं बची है
जहाँ चला जाए कोई बेख़ौफ़ गुनगुनाते हुए।
यकायक कोई पीछे से सर्र से निकल जाता है
तो कोई आगे से मोबाईल पर बतियाते हुए
सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए
या तेज़ संगीत हमें सुनाते हुए ऐसे गुज़रता है
जैसे हम उसके 'गार्ड ऑफ़ ऑनर' के लिए खड़े हों!

सड़क पर चलते हुए
अब हम कुछ सोच नहीं पाते ।
रास्तों में अब सचमुच मौत दौड़ रही है
और कितना कटु-सत्य और हास्यास्पद है कि
फिर भी मौत को गले लगाने के लिए लोग मचल रहे हैं?
बाइक और कार की गिनती में लगातार इजाफा हो रहा है,
देश की जवान पीढ़ी
'धूम' की स्टाइल में 'खल्लास' हो रही है,
पर,
इंडस्ट्री खुश ,कम्पनियाँ खुश ,सरकार भी खुश
उसकी 'प्रजा' समृद्ध हो रही है !

सड़क पर जब कोई मरता है तो
महज़ गिनती नहीं कम होती ,
मानवता मरती है,संवेदना 'ख़तम' होती है
और सरकार थैली खोल देती है।
अक्सर ऐसा हो जाता है कि
मुआवज़े की रक़म मिलती है,
पर 'खरचने' वाला कोई नहीं बचता !
भले ही कोई माँ
कोई पत्नी
कोई बेटा
या कोई पिता
सड़क पर चलने का
दंड भुगतता है ,सिसकता है
पर यह हिदुस्तान है,
यहाँ ऐसे ही चलता है........


* अम्बार सुंचा =ढेर लगा है


विशेष :पुनर्प्रकाशन (पूर्व में ०१/०६/२०१०) में प्रकाशित

18 अप्रैल 2011

तीन लघु कवितायें !


फेसबुक पर लिखी हुई तीन रचनाएँ

(१)
इस जीवन में

सुख होते हैं

दुःख होते हैं,

हम हँसते हैं,हम रोते हैं .

सुख नकली है,दुःख असली है,

जब हम अपने से मिल रोते हैं,

पास हमारे हम होते हैं !

अपने गम हम खुद धोते हैं,

शायद इसीलिए रोते हैं ! 


सन्दर्भ:साथी अजय झा के पिताजी के देहावसान पर

(२)

सुबह हुई तो मुरझाये थे
कुम्हलाये थे,
हम अब ऐसे दरख़्त हैं,
जो ढलती शाम में खिलते हैं 


सन्दर्भ :एक दिन का निजी अनुभव 


 (३)

पुराना जा रहा है
नया आ रहा है
न जाने वाले का गम
न आने वाले का ख़ैर मकदम
जिसे जाना चाहिए
वह मजबूती से जमा है
भ्रष्टाचार  अब पांचवां खम्बा है !

सन्दर्भ:नए साल पर (२०११)

10 अप्रैल 2011

एक खत अपनों के नाम !

हर भेष में,हर देश में !
अन्ना हजारे के अनशन से खुश होने वालों से मैं एक बात कहना चाहता हूँ कि उन्हें ज़्यादा खुशी जताने या फुदकने की ज़रूरत नहीं है.ऐसे लोगों की संख्या उँगलियों में गिनने लायक है जो किरण बेदी या अरविन्द केजरीवाल के बहकावे में आ गए हैं.दर-असल उन्हें हमारी ताकत और एकजुटता,प्रतिबद्धता का रंचमात्र अनुमान नहीं है.हम अपनी बिरादरी को आश्वस्त करते हैं कि उन्हें तनिक भी घबडाने की ज़रूरत नहीं है.अपनी आबादी के आगे ये मुट्ठीभर लोग क्या कर लेंगे?

हम लोग पिछले पचास-साठ सालों से यूँ ही  भाड़ नहीं झोंक रहे हैं .हमने अपनी ताकत में लगातार इजाफा किया है.अपने लोगन क हम तनी अपनी बोली मा समझाय देइ कि हमैं संगठन के लोग हर दल,हर कोनवा और हर ठीहे पे मिल जइहैं .सबते बड़ी बात या है कि हर सरकार मा हमरी साझेदारी है !यहिते अन्ना के अनशन ते घबड़ाय के तनिकौ ज़रूरत ना है !

हम लोग बीते सालों में समाज में इतने घुल-मिल गए हैं कि दूसरी प्रजाति लुप्त होने की कगार पर है.उसी प्रजाति के बचे-खुचे लोग अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.एक बात यह भी है कि ऐसे कुछ लोग मौका पाते ही हमारी बिरादरी में शामिल हो जाते हैं .इसलिए भी अपने अस्तित्व और भविष्य की चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे आका लोग अपनों को बचाने के लिए इस बिल में भी छेद कर देंगे !हमें अपने काम को थोड़ा सतर्कता और होशियारी से करना पड़ेगा .कुछ दिन तक पुरानी दर पर ही काम करना पड़ सकता है,इसलिए बाल-बच्चों को थोड़ा तकलीफ हो सकती है !

इसलिए आखिरी जश्न तो हम ही मनाएंगे और फिर इस बिल को तो अभी पास भी तो होना है.इसमें पलीता लगाने की कोई न कोई तरकीब ज़रूर निकल आयेगी !हम लोग इसलिए भी चिंतित नहीं हैं क्योंकि कानून तो पहले के भी कोई कम नहीं बने हैं.हमारी बिरादरी बिंदास होकर अपना काम करे,ये थोड़े समय का बुलबुला है,जल्द ही  पिचक जायेगा !

और हाँ,तब तक अन्ना हजारे जी के हर कार्यक्रम में आप सब लोग ढोल-नगाड़े लेकर अपनी उपस्थिति अवश्य दर्ज कराते रहें !

3 अप्रैल 2011

माँ की दुआ !

हमारी अम्मा करीब सत्तर की हो रही हैं.अभी कुछ दिनों पहले उनकी तबियत खराब हुई तो उन्हें भइया (पिताजी को हम सब यही कहते हैं) गाँव से लखनऊ ले आए .वहाँ हमारी बहन के यहाँ अम्मा रुकीं .तीन-चार दिन के इलाज़ के बाद मुझसे जब बात हुई तो उन्होंने बताया कि तबियत ज़्यादा ठीक नहीं है.मैंने तुरत-फुरत लखनऊ जाने का कार्यक्रम बना लिया .

अम्मा-भइया
मुझे  देखकर अम्मा बड़ी खुश हुईं .हमने उन्हें यही बताया कि जो भी परेशानी है,बुढ़ापे  की वज़ह से है और पैरों में जो दर्द रहता है तो थोड़ा टहला करो (हालाँकि इस फार्मूले पर मैं स्वयं अमल नहीं करता ).हमारे पास समय ज़्यादा था नहीं सो थोड़ी देर के बाद वहाँ से निकलने लगे .अम्मा के पैर छूकर जब विदा लेने लगे तो उन्होंने अपनी धोती में बंधे एक रुमाल को निकाला .रूमाल में तीन जगह गाँठें लगी हुई थीं .मैंने देखा, उसमें एक में  तम्बाकू की पुड़िया थी,दूसरी में दवाई का पत्ता.अम्मा अभी भी कुछ ढूंढें जा रही थीं .आखिर तीसरी गाँठ में से एक मुड़ा-तुडा  नोट निकालकर उन्होंने  मेरी ओर बढ़ा दिया .

मैंने अचकचाकर सवालिया नज़रों से उन्हें देखा तो उन्होंने कहा,"हम जानिथ तू कमात है मुदा यह हम अपने पोता-पोतिन के बरे दई रहिन!" सच मानिए ,उस वक़्त मुझे ऐसा लगा कि हमारी ढेर सारी कमाई उस एक नोट के आगे पानी माँग रही थी ,लज्जित थी.उनका आशीर्वाद समझकर मैंने सर-माथे लिया और दुखी मन से अम्मा से विदा ली .मैं उनके लिए तो कोई कारगर दवा नहीं दे पाया ,पर मेरे पास माँ की दुआ थी जो दुनिया में सबसे बड़ी दवा होती है !

मुझे पहले भी शहर में रहते हुए कई बार लगा कि हमने अपने जीवन में माँ-बाप की सेवा का मौका हमेशा के लिए गवाँ दिया है क्योंकि दोनों लोग शहरी-जीवन को बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकते. कई बार मैं जब बातों-बातों में गाँव में न रहने की बात करता तो सबसे ज़्यादा बेचैनी अम्मा को ही  होती.इसीलिये लखनऊ में घर की व्यवस्था हो जाने के बावजूद अम्मा ने अपनी जिद से गाँव में हमारे लिए अलग घर भी बनवा दिया है,इस उम्मीद में कि यदि घर रहेगा तो एक दिन मैं ज़रूर उसमें रहने आऊँगा !

अम्मा ने बचपन में हमारे लिए जान लगा दी,अब भी हमारे बिना हूकती हैं,पर का करें,बिना नौकरी किये भी गुजारा  नहीं है.हम वहाँ नहीं जा सकते ,वे यहाँ नहीं आ सकतीं !क्या हर माँ-बाप अपने बच्चों के पैदा होने पर उनसे यही उम्मीद करते हैं? जीवन के जिस मोड़ पर उन्हें अपनी संतानों की  ज़रूरत होती है,तभी वह उनसे दूर होते हैं! यह हमारी,आपकी, सबकी विडम्बना है !