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28 जून 2010

कहाँ है महँगाई ?

इस समय देश भर का मीडिया इन ख़बरों से अटा पड़ा है कि महँगाई मारे डाल रही है ,पर अपुन की समझ में नहीं आ रहा है कि ये महँगाई आख़िर है कहाँ ?यह बात तब और साफ़ हो जाती है जब सरकार का कोई पढ़ा-लिखा (खाया-अघाया) बाबू अख़बारों में बक़ायदा विज्ञापन छपवाकर साबित कर देता है कि अभी तो महँगाई कोसों दूर है!अज़ी ज़नाब,पाकिस्तान,लंका,भूटान,बांग्लादेश आदि को देखिये ,उनसे तो हम अभी बालिश्त भर नीचे हैं! यह तो ग़नीमत है कि उस बाबू ने हत्या,आतंक,लूट-पाट और भ्रष्टाचार के आंकड़े नहीं दिखाए नहीं तो हम उनमें भी अव्वल निकलते !
भई, पेट्रोलियम पदार्थों के दाम बाज़ार-भरोसे सरकार ने अभी किया है,पर यह देश तो पता नहीं कब से बाज़ार के ही भरोसे चल रहा है!आम आदमी की इस बाज़ार में एक ख़रीदार की हैसियत न होकर बेकार और खोटे सिक्के की तरह रह गयी है और उसे चुनाव के पहले तालियाँ पीटने और चुनाव बाद पेट बजाने का सम्मान-जनक काम मिला हुआ है ।
ख़र्चे तो हमारे माननीयों के होते हैं,मेहमान भी उन्हीं के होते है और जितने सारे पकवान हैं उनमें उन्हीं का नाम लिखा है,इसलिए यदि वे अपना 'मेहनताना' बढ़ाने की बात करते हैं तो यह बिलकुल ज़ायज है और अपनी सरकार अब इतनी भी निर्दयी नहीं है कि उनकी फ़रियाद न सुने !
रही बात 'कामनवेल्थ' के खेलों को लेकर हल्ला मचाने की,तो अपना देश 'अतिथि देवो भव' की परिपाटी पर चल रहा है और इसके लिए हम चाहे कंगाल हो जाएँ पर हमारे मेहमानों को लगना चाहिए कि हम भूखे-नंगे नहीं हैं ,इसीलिये दस दिनों के मेहमानों के लिए पूरी तिज़ोरी खोल दी गयी है,और जो यहाँ हमेशा रहते हैं उनके लिए दरी झाड़ दी गयी है!

इसलिए,महँगाई हमारी सोच में है,वास्तव में ऐसा है नहीं.