28 जून 2012

चिप्स चबाते लोग !


बरगद बूढ़ा हो गया,सूख गया है आम |
नीम नहीं दे पा रही,राही को आराम ||(१)

कोयल कर्कश कूकती,कौए गाते राग |
सूना-सूना सा लगे,बाबा का यह बाग ||(२)

अम्मा डेहरी बैठकर ,लेतीं प्रभु का नाम |
घर के अंदर बन रहे,व्यंजन खूब ललाम ||(३)

आँगन में दिखते नहीं, गौरैया के पाँव |
गोरी रोज़ मना रही लौटें पाहुन गाँव ||(४)

मनरेगा के नाम पर,मुखिया के घर भोग |
ककड़ी,खीरा छोड़कर,चिप्स चबाते लोग  ||(५)

रामरती दुबली हुई,किसन हुआ हलकान |
बेटा अफ़सर बन गया,रखे शहर का ध्यान ||(६)


25 जून 2012

मुनव्वर राना की शायरी और हम लोग !

कल का दिन हमारी ज़िन्दगी का एक यादगार दिन रहा.परसों अविनाश वाचस्पति जी का फ़ोन आया कि रविवार को 'एनडीटीवी' के 'हम लोग' कार्यक्रम के लिए निमंत्रण आया है,चलना है तो बताओ.मैंने सहर्ष स्वीकृति दे दी और साथ ही मित्र शाहनवाज़ सिद्दीकी और सानंद रावत जी से चलने के लिए कहा तो वे लोग भी तैयार हो गए.कल करीब ग्यारह बजे हम स्टूडियो पहुँच गए.सभी को केवल मुनव्वर राना से मिलने की बेताबी थी.मेरे लिए अतिरिक्त खुशी थी कि वे मेरे गृह जनपद के ही हैं ! दुर्भाग्यवश अस्वस्थता के चलते अविनाशजी तो नहीं आ पाए पर हम तीनों लोग वहाँ डट गए.


रवीश कुमार जी कार्यक्रम की शुरुआत करें ,इससे पहले ही मुनव्वर जी ने अपने अंदाज़ में चुटकियाँ लेनी शुरू कर दी थीं.पैर में दिक्कत की वज़ह से चार महीने से वे अस्पताल में थे,पर अपनी इस तकलीफ को उन्होंने बड़ी सहजता से लिया.कार्यक्रम शुरू होने पर पहले आध घंटे उन्होंने तरह-तरह के किस्से सुनाये और माँ ,सियासत.मोहब्बत आदि पर शेरो-शायरी सुनाई ! इस कार्यक्रम को विस्तार से यहाँ सुन सकते हैं !




कार्यक्रम के दौरान हमें भी एक सवाल पूछने का मौका मिला,जिसमें मैंने पूछा कि आपको सियासत व सरोकार में सबसे अधिक दिल किस पर शायरी करने का होता है तो उन्होंने बेलौस होकर कहा कि हम शायरी तभी करते हैं जब दिल कहता है | इस तरह कार्यक्रम की समाप्ति के बाद उनसे मिलने के लिए लोग टूट पड़े.हमने उनसे चरण छूकर आशीर्वाद लिया .सबने फोटो भी खिंचवाई. इसके बाद हम सब अविनाशजी के यहाँ उनके हाल लेने गए और शाम को पहली बार अपने को टीवी पर चमकते हुए देखा !



अब देखिये कई दृश्य :

रवीश कुमार कार्यक्रम संचालित करते हुए




मुनव्वर जी माँ को याद करते हुए





दर्शकों के बीच हम


शाहनवाज़ और सानन्दजी के साथ



ज़बरिया हम उनके साथ बैठ ही गए !




23 जून 2012

खुरपेंचिया ब्लॉगर अनूप शुक्ल जी !







ब्लॉग-जगत में इन दिनों एक विशेष प्रकार का तत्व सक्रिय है जिसे हम अपनी स्थानीय बोली में खुरपेंच कहते हैं.इसको ऐसे भी कह सकते हैं कि चलते हुए बैल को अरई मारना !अरई एक प्रकार का हथियार है जिससे किसान बैलों में नाहक उत्तेजना भरने का काम लेते हैं.इस तरह का काम अपनी कलम से द्वारा करना 'खुरपेंच' की श्रेणी में आता है.इस काम को पहले आदरणीय स्वर्गीय डॉक्टर अमर कुमार जी किया करते थे,पर उनके जाने के बाद इस विधा को और गति प्रदान करने व विशिष्टता से करने का काम हमारे फुरसतिया वाले अनूप शुक्ल जी ने लगातार किया है.इस प्रकार वे अप्रत्यक्ष रूप से अमर कुमार जी के ब्लॉगरीय-वारिस बनने की दौड़ में भी हैं.


अभी हाल के दिनों में उनकी इस खुरपेंच-प्रतिभा ने और ज़ोर पकड़ा है.जबसे मैंने यह जाना है कि वे टहलते हुए लिख लेते हैं या चर्चिया लेते हैं तब से बहुत हैरान और दुखी हूँ.खुद तो कभी रेलगाड़ी से सफ़र करते हुए ,उठते,बैठते या टहलते हुए कुछ भी लिख सकते हैं पर दूसरे अगर बकायदा नहा-धोकर,मानस-पारायण कर, बैठकर कुछ लिखते हैं तो अनूप जी लाख खामियां निकालने लगते हैं.डॉ. अरविन्द मिश्र जी से उनका गज़ब का याराना है पर मौका मिलते ही उनकी हिज्जों में हुई गलतियाँ भी निकालते हैं.अभी कुछ दिनों पहले आलोक कुमार जी के ऊपर लिखी पोस्ट में मिश्रजी ने 'आदि ब्लॉगर' शब्द पर आपत्ति की थी कि इससे आदि-मानव की गंध महसूस होती है सो इन्होंने उनका मान रखते हुए इसे 'पहला ब्लॉगर' मान लिया था.पर अधिकतर मौकों पर वे मिश्रजी को कोंचते रहते हैं.


मिश्रजी वैज्ञानिक-प्रतिभा संपन्न होते हुए भी यदि हिंदी साहित्य को अपनी ब्लॉगिंग से कुछ दे रहे हैं तो यह उनकी ब्लॉग-जगत पर असीम कृपा ही है.हमारे यहाँ जो निर्वात है,उसको एक तरह से वे भरने की कोशिश कर रहे हैं और इसी सिलसिले में यदि उन्होंने अपने साईं ब्लॉग को पहला विज्ञान-ब्लॉग घोषित कर दिया तो अनूपजी कसमसा गए.इन्होंने पुराना रिकॉर्ड खोजा तो पता चला कि ज्ञान विज्ञान नामका कोई ब्लॉग उनसे पहले से है.मिश्रजी ने अपना रिकार्ड टूटते देखा तो उन्होंने यह नवीनतम जानकारी दी कि वह ब्लॉग मृत हो चुका है,सो इस नाते जो उपलब्ध ब्लॉग हैं ,उनमें उनका ही हक बनता है !इस पर अली साहब ने एक दिलचस्प सुझाव दिया है ,'मृत हो चुके वर्डप्रेस के ब्लॉग के बाद वाला पहला ब्लॉग' |अभी तक इस तरह के दावे पर अनूपजी की कोई प्रतिक्रिया मेरे संज्ञान में नहीं आई है.


कुछ उदाहरण देखिये,जिससे पता चलता है कि अनूपजी को दूसरे का किया कुछ भी अखरता है.कोई अगर लिखकर रिकॉर्ड बनाता है या केवल ब्लॉग बनाकर रिकॉर्ड बनाता है तो भी उन्हें मंज़ूर नहीं है.अगर कोई कविता लिखता है तो उसमें भी उनकी घोर आपत्ति है.सतीश सक्सेना जी की कवितायेँ पढ़कर उनको उसमें रोने वाले बिम्ब नज़र आते हैं,जबकि खुद वो गरमी के बिम्ब पकड़ नहीं पाते और इसके लिए गुहार लगाते हैं !अब अगर कोई सदाबहार-टाइप बिम्ब लेकर कविता लिखता है तो भी उनको आपत्ति है.वे स्वयं मौसमी-बिम्ब का रोना रोते हैं.अगर कविता होगी,तो दर्द तो होगा ही.बिना दर्द के कविता कैसी ? इस तरह की कविताओं को वे रोने वाली कहकर खारिज करते हैं .जब हम दुःख में डूबकर कविता लिखते हैं तो कहते हैं कि या तो वह गीत का हुलिया बिगड़ गया है इसलिए यह कविता नहीं है या भाव झूठे हैं.यानी,किसी प्रकार लिखने में चैन नहीं है |


अनूपजी का जब कानपुर से जबलपुर जाना हुआ,तभी उनने 'घर से बाहर जाता आदमी' कविता लिख कर आर्तनाद किया था,गाहे-बगाहे 'कट्टा-कानपुरी' के नाम से सड़क-छाप शेर भी लिखते रहते हैं पर मजाल है कि कोई उनके रहते किसी भी विधा में कुछ भी लिख सके.हाँ,महिला-ब्लॉगरों के प्रति वे विशेष आदर रखते हैं.कुछ समय पहले तक महिलाओं को अपनी पोस्ट में सम्मान देने के लिए अक्सर सुदर्शन चित्र लगाया करते थे.किसी ने आपत्ति की कि भाई अपनी पोस्टों के ज़रिये वे नस्लवाद और रंगभेद फैला रहे हैं ,सो उन्होंने उन सुदर्शनाओं को काजल कुमार के कार्टूनों से रिप्लेस कर दिया .अब चारों तरफ शांति है.



अगर ब्लॉग-जगत में कोई पुरस्कार देना चाहता है तो इसमें भी उनको आपत्ति है .चाहे परिकल्पना-सम्मान हो या कोई आलसी-परियोजना| इनको सबसे बड़ी खुंदक है कि उनके रहते न कोई गद्य लिख सकता है,न पद्य ,न कोई रिकॉर्ड बना सकता है न पुरस्कार बाँट सकता है.गद्य में जहाँ हिज्जों की गलतियाँ निकाली जाती हैं,वहीँ पद्य में बिम्ब पकड़े जाते हैं.खुद बैठकर,लेटकर और टहलते हुए गद्य,पद्य या व्यंग्य जैसा कुछ लिखते हैं तो कोई बात नहीं,पर एक सामान्य ब्लॉगर अगर अपनी रेटिंग बढ़ाने को लेकर कुछ लिखता है तो उनके पेट में मरोड़ शुरू हो जाती है.लोगों के ब्लॉग-शीर्षकों को लेकर भी वे खूब मजे लेते हैं,इसी सन्दर्भ में उनके अपने ब्लॉग फुरसतिया को खुरपेंचिया जैसे नाम से नवाज़ा गया है !सभी पुरस्कार-समितियों से हमारा निवेदन है कि इन्हें सबसे बड़ा खुरपेंचिया पुरस्कार दिया जाय |


उनमें इतने खुरपेंच भरे पड़े हैं कि पूछिए मत ! पिछले साल जब हम पहली बार जे एन यू के कैम्पस में अमरेन्द्र त्रिपाठी और निशांत मिश्र के साथ उनसे मिले थे,तभी से हमारी ब्लॉगरीय-ज़िन्दगी ने गज़ब की रफ़्तार ले ली.उस समय हमें उन्होंने कुछ ऐसे ख़ुफ़िया सूत्र बताये थे,जिनके सहारे मैं कहाँ से कहाँ पहंच गया ? तब मैं ब्लॉगिंग-जगत का स्ट्रगलर हुआ करता था,उदीयमान-ब्लॉगर की पहुँच से भी बाहर ! उस हंगामी-बैठक के बाद आज इत्ते बड़े ब्लॉगिंग-जगत का सबसे बड़ा आलोचक-ठेकेदार बनने की राह पर हूँ.यह सब अपने फुरसतियाजी उर्फ खुरपेंचिया जी की दी हुई शुरुआती-डोज़ का ही तो कमाल है !


ये तो गिने-चुने लोगों के उदाहरण हैं.पता नहीं,कितने लोग इनसे मार खाए और खार खाए बैठे हैं.कुछ कमज़ोर दिल वालों ने तो इनकी खुरपेंच से आजिज आकर अपना काम-धंधा ही बदल लिया है.अनूप जी या तो किसी के यहाँ टीपकर उसकी सारी खुमारी उतार देते हैं या फिर टहलते हुए चर्चा करके ! चिट्ठाचर्चा को इन्होंने अपना अचूक हथियार बनाया हुआ है,उसी से अपने प्रिय शिकार पर हमला बोल देते हैं ! हमें सबसे बड़ी शिकायत यह भी है कि वो हमारे पड़ोस के हैं, न जाने कितनी बार इधर-उधर की लहरों से खेला करते हैं,पर हमें प्रमोट करने के लिए कभी कुछ नहीं किया !

मोरल ऑफ दा स्टोरी "ये आदमी हमें चैन से लिखने भी नहीं देता !"

20 जून 2012

तुम्हारे जाने के बाद !


तुम्हारे जाते ही खुश हुआ था मैं
अब न कोई रोकेगा,न टोकेगा,
सब कुछ हमारे हाथ में होगा
हमारे काम पर भी
नज़र कोई नहीं रखेगा |
तुम्हारे बिना कुछ दिन
बड़ा अच्छा लगा था,
अकेले होने के ख़याल से
मन मचलने लगा था |
तुम्हारे जाने के इतने दिनों बाद
गुरूद्वारे में अर्चना करते हुए !
तुम्हारी कमी महसूसती है,
एक उकताहट सी आ गई है अब
ज़िन्दगी भी हम पे हँसती है |
जब भी उँगलियाँ चलाता हूँ
कम्प्यूटर के की-बोर्ड पर,
अचानक रुक जाता हूँ
पीछे से कोई आवाज़ न पाकर |
तुम्हारे रहते लिखता था
कहीं ज़्यादा बेफिक्र होकर ,
पर अब लगता है जैसे
कविता और ज़िन्दगी
दोनों गईं हों रूठकर |
तुम्हारी झिड़की औ नसीहत
जबसे नदारद सी हुई है,
हमारी जिंदगी बेरंग औ
बहुत घबराई हुई है |
इस की-बोर्ड, अंतरजाल से
वितृष्णा हो गई है,
बाहरी दुनिया को पाकर
अपनी कहानी खो गई है |
तुम्हें जाना है ज़्यादा
यूँ चले जाने के बाद,
घर मकाँ सा हो गया
दीवार-ओ-दर करते हैं याद |
बहुत दिन अब हो गए
तुम बिन व बच्चों के बिना,
आतप सहा,भूखा रहा,
सुबह उठके दिन गिना |
तुम्हारी हर नसीहत
अब हमें स्वीकार है,
बस हो गया  इतना विरह
बुलाता तुम्हें श्रृंगार है ||

17 जून 2012

मेरा हासिल हो तुम !




तुम गए कहीं नहीं ,रूह में शामिल हो तुम,
सुर में हो,हर साज में,दर्द में शामिल हो तुम ||

हर ख़ुशी तुमसे मिली,गम को हमने कम किया,
हर भटकती नाव के ,बन गए साहिल हो तुम ||


सरहदी दीवार तोड़ी,नफरतों को कम किया,
जी उठी हर गज़ल,प्यार के काबिल हो तुम ||


दुखते हुए हर ज़ख्म में, तुमने मला मरहम,
सब चला जाये मगर,बस मेरा हासिल हो तुम ||


जब भी गुम हो जाऊँगा,दुनिया की भीड़ में,
ग़ज़लें तुम्हारी ढूँढ लेंगी,मुझमें ही शामिल हो तुम ||




आपका पाकिस्तान रेडियो को दिया गया एक लंबा साक्षात्कार  (१९७०)



13 जून 2012

ये धुआँ सा कहाँ से उठता है-अलविदा मेंहदी हसन साब

अभी अभी फेसबुक में शिवम मिश्रा  के स्टेटस को पढ़कर अचानक दिल धक् से रह गया.हमारे अज़ीज  गज़ल गायक और हिंदुस्तान-पाकिस्तान में समान रूप से सम्मान पाने वाले मेंहदी हसन साहब नहीं रहे.यूँ तो अरसे से उनकी बीमारी उन्हें दबाये हुए थी पर फिर भी हमें उम्मीद थी कि वो अभी हमारे साथ और रहें.इस नामुराद खबर पर यकीं न हुआ तो अमर उजाला अखबार ने इसकी तस्दीक कर दी !



गजल गायिकी के बेताज बादशाह मेहदी हसन नहीं रहे

कराची/एजेंसी
Story Update : Wednesday, June 13, 2012    1:10 PM
Ghazal king Mehdi Hassan passes away in a Karachi hospital
नामचीन गजल गायक मेंहदी हसन का बुधवार को कराची के अस्पताल में निधन हो गया। पिछले कई दिनों से मेहदी हसन का इलाज कराची के अस्पताल में चल रहा था। हसन को फेफड़े, छाती और पेशाब करने में परेशानी थी। हसन के बेटे आरिफ हसन ने बताया कि उनके पिता पिछले 12 वर्षों से बीमार थे लेकिन इस साल उनकी तबियत ज्यादा खराब हो गई।

मेहदी हसन का जन्म राजस्थान के लुना गांव में 18 जुलाई 1927 को एक पारंपरिक संगीतकार घराने में हुआ था। लेकिन देश विभाजन के बाद मेंहदी हसन को परिवार के साथ पाकिस्तान में बसना पड़ा।

इसके बाद मेहदी हसन ने गुजारा चलाने के लिए साइकिल की दुकान पर भी काम किया था। इस सब के बीच मेंहदी हसन ने सुर साधना का साथ कभी नहीं छोड़ा और गजल गायिकी के बेताज बादशाह बने।

गायकी की दुनिया में महत्वपूर्ण योगदान करने के लिए उन्हें शहंशाहे गजल की उपाधि से नवाजा जा चुका है। इसके अलावा उन्हें बहुत से अवॉर्ड से भी नवाजा जा चुका है।


मेंहदी हसन साहब मेरे सबसे पसंदीदा गज़ल-गायक रहे हैं.उनसे यह लगाव 'रंजिश ही सही,दिल को जलाने के लिए आ' से शुरू हुआ था,बाद में बहुत सारी गज़लें हैं जिन्हें मैं अक्सर गुनगुनाता रहता हूँ.'खुदा करे कि जिंदगी में वो मक़ाम आए,'देख तो दिल के जां से उठता है,ये धुआँ सा कहाँ से उठता है.'

अब इस समय और कुछ सूझ नहीं रहा.वे भले ही हमारे साथ शरीर से नहीं रहे,पर हमारे दिलों में,सुरों में ताकयामत बरकारार रहेंगे.खुदा उन्हें पुरसुकून बख्शे !

फिलहाल उनकी ही आवाज़ में हमारा दर्द !


12 जून 2012

आदमी की औकात !


औरत के दिल को पढ़ना भले मुश्किल हो गया हो, आदमी की औकात को पढ़ना हमेशा से आसान काम रहा  है।यहाँ बात केवल आदमी की औकात की होगी । हम आदमी को देखते-समझते हैं तो उसकी वेशभूषा से पर यही काम औरत के मामले में उसकी सूरत देखकर किया जाता है,जिसमें अक्सर हम मात खा जाते हैं।आदमी की शक्ल या सूरत या तो देखने-समझने लायक होती ही नहीं या हम उसको बिलकुल नज़र-अंदाज़ करते हैं।

थोड़ा पहले तक आदमी की औकात को समझने और जानने का सही माध्यम जूता रहा है |हमारे बुज़ुर्ग भी कहते आये हैं कि कि आदमी की औकात उसके जूते से जानी जाती है।पहले जूता देखकर ही अगले के बारे में यह अनुमान लग जाता था कि वह कितना कुलीन है या उसके जूते में कितना दम है ? भाई लोग अपने जूते की ठसक से समाज को खुले-आम बता देते थे कि अगर उनका जूता चल गया तो भलेमानुसों की सेहत ख़राब हो जाएगी।मगर यह सब बातें काफी-पुरानी हो चली हैं और जूते की कुलीनता की पहचान अब मोबाइल ने ले ली है।

सीधी-सी बात है,अब वही आदमी स्मार्ट  और रुतबेवाला है जिसके पास तगड़ा स्मार्टफोन हो । हम अब जूते पर नज़र नहीं रखते।किसी को देखते ही हमारी निगाह उसके आधुनिक फोन पर जाती है।अगला भी उचक-उचककर अपना फ़ोन दिखाने की फ़िराक में होता है,यदि उसके पास महंगा वाला है ! अगर उसके पास दो-इंची ,बिना टच वाला ,घटिया कैमरा वाला मोबाइल हुआ तो फट से उसकी पहचान एक चिरकुट-टाइप आदमी की हो जाती है। यदि उसके पास चार-इंची फावड़े-सी स्क्रीन वाला,टच और बढ़िया कैमरे का मोबाइल हुआ तो वह तुरत ही एलीट-क्लास का लगने लगता हैं,भले ही उसने दसवीं कक्षा घिसट-घिसटकर पास करी हो !

फोन जितना ज्यादा महंगा दिखता है,आदमी की कीमत और इज्ज़त उतनी ही ज्यादा होती है।आजकल औकात नापने का सबसे आसान तरीका मोबाइल है | इसके लिए कुछ पूछने की नहीं बस दिखने की ज़रूरत है | कुछ अंदाज़ यूँ लगते हैं;यदि किसी के पास ब्लैकबेरी फोन है तो वह किसी कंपनी में एक्जीक्यूटिव हैं और एप्पल का फोन है तो किसी रईसजादे या नेता की औलाद ।किसी और कंपनी के महंगे फोन से सामने वाला यह ज़रूर अंदाज़ लगा लेता है कि यह कोई आम आदमी नहीं ,बहुत पढ़ा-लिखा है।उससे पुलिस वाले तमीज से बात करते हैं और ऑटो-टैक्सी वाले जमकर किराया मांगते हैं । इस बीच कार वालों की रेटिंग लगातार गिर रही थी,जबसे हर ऐरे-गैरे ने ईएमआई पर गाड़ी लेनी शुरू कर दी थी | सो उस स्तर पर क्षति-पूर्ति की जा रही है।पेट्रोल के दाम बढ़ाकर उन कार-धारकों की औकात को भी अपग्रेड किया जा रहा है।अगर पेट्रोल का दाम  पांच सौ रूपये प्रति लिटर हो जाए तो वह दिन दूर नहीं जब गाड़ीवाला भी ठसक से कह सकेगा कि उसके पास पेट्रोल की गाड़ी है !

फ़िलहाल,बाज़ार में आदमी की औकात मोबाइल से हो रही है।इसलिए कम्पनियाँ जानबूझकर चालीस-पचास हज़ार के फोन ला रही हैं,ताकि इनके धारकों की रेटिंग न गिरे! वे चाहती भी नहीं कि इन फोन को चिरकुट-टाइप के लोग खरीदें | इससे कंपनी और कुलीन लोगों की इज्ज़त मिट्टी में मिल जाने की पूरी आशंका है !इसलिए यदि आप अपनी चिरकुटई से निजात पाना चाहते हैं या समाज में अपनी औकात दिखाना चाहते हैं तो आज ही फोन बदल लें,आपकी पूछ बढ़ जाएगी और समाज में रुतबा भी।

11 जून 2012

चिरकुट-चूहों से बचाओ !

आदरणीय प्रधानमंत्रीजी,
बहुत दुखी मन से यह पत्र लिख रहा हूँ।देश में ज़बरदस्त संकट की स्थिति पैदा हो गई है।सुना है,चूहे तीन करोड़ का अनाज खा गए हैं।यह बहुत ही गंभीर मसला है।ये हमारा बजट था ,इसे दूसरा कैसे उड़ा सकता है?हम तो कहते हैं कि तुरत ही संसद का विशेष सत्र बुलाया जाए और इस पर बहस हो।एक संसदीय समिति से इसकी जांच भी कराई जाय कि हमारे बहादुरों के रहते ये सब हुआ कैसे ?

तीन करोड़ की रक़म यूँ ही जाया हो जाए,यह हम सब सहन नहीं कर सकते हैं।यह हमारे मौलिक-अधिकारों पर डाका है और इसे हम बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं।कालेधन को लेकर इतना शोर किया जा रहा है,अगर वह आ भी गया तो वह हमारे काम का नहीं है।उसे सफ़ेद करना पड़ेगा और उसमें समय लगेगा।जो धन हमारे पास पहले से ही चकाचक सफ़ेद है उसे हम ऐसे नष्ट नहीं होने देंगे ।उन चूहों की हमारे आगे बिसात ही क्या है? उन्होंने हमारी प्रभुसत्ता को ललकारा है इसलिए हम चुप नहीं बैठने वाले।


हमें किसी अन्ना से खतरा नहीं है पर जब बात हमारे अन्न की हो,पेट की हो तो यह बड़े खतरे का संकेत है।हमारे पुराणों  में अन्न को देवता कहा गया है और इन चूहों ने इस लिहाज़ से देवताओं पर आक्रमण किया है।अगर यह हाल देवताओं का हो रहा है तो फिर असुर कब तक सुरक्षित रहेंगे ?हमें किसी बाबा से भी कोई डर नहीं है क्योंकि वे सब मौका पाते ही कुतरने की जुगाड़ में लगे हैं।हम अपने जीते जी यह नहीं होने देंगे ।संसद के हमले के बाद यह बड़ा वाकया है .हमारी सत्ता को चूहों ने चुनौती दी है  इसलिए यह छोटा-मोटा मसला नहीं है,गंभीर आपदा  का समय है, हमारे अस्तित्व का प्रश्न है।अगर हम अभी एकजुट नहीं हुए तो कब होंगे ?

तीन करोड़ की रकम इतनी मामूली भी नहीं है।इस मद से हमारे यहाँ कम से कम दस टायलेट बन सकते हैं  जिनमें हमारे भाई-बिरादर बैठकर गंभीर-चिंतन करते ! इन चूहों ने अनजाने में ऐसा नहीं किया है।यह एक साजिश है हमें भूखों मारने की।हमने अपना सब-कुछ इस देश के लिए न्योछावर कर दिया है और लगातार इसी प्रयास में लगे हैं।हमने इस देश की सेवा में अपना पूरा परिवार झोंक दिया है ।अगर चूहे इस देश के मद को ऐसे खर्चने लगेंगे तो हमारे बिलों का क्या होगा? ये चूहे तो खा-पीकर अपने बिलों में मस्त घूमेंगे पर हम देश-सेवा को तरसते रह जायेंगे ।इस सबका सबसे बड़ा खतरा यह है कि चिरकुट-टाइप के चूहे इसका स्वाद पाकर और जोर से हमले करेंगे और सारे बिलों पर उन्हीं का कब्ज़ा हो जायेगा ।

इस ज्ञापन के द्वारा आपको हम सचेत करते हैं कि कम से कम अब तो जाग जाओ।अभी तक हमारे ऊपर सीधा हमला नहीं हुआ था,इसीलिए हम चुप बैठे थे।इन चूहों ने आज तीन करोड़ खाए हैं,कल हमें भी कुतरना शुरू कर देंगे।इन चिरकुट-टाइप चूहों से सख्ती से निपटने की ज़रुरत है नहीं तो हमारे खिलाड़ी और अफसरटाइप चूहों की प्रजाति पर ही संकट उत्पन्न हो जायेगा ! इस पर आप जल्द से जल्द एक सर्वदलीय बैठक बुलाकर आगे की रणनीति तय कर लें। इन चूहों को हमें ऐसा सबक सिखाना है कि इनकी सात पुश्तें अनाज को देखकर डरें और अन्न खाना ही भूल जांय !

उम्मीद है कि इस पत्र को आप वरीयता के आधार पर लेंगे और इस प्रकार  लोकतंत्र और हमारे मौलिक अधिकारों की रक्षा करेंगे ।                                                                              


                                                 आपका ही 
                                                         देश का प्रमाण पत्र धारी सेवक    
                                                                                                                   
                                                                                                                  

6 जून 2012

वो भरमा गए हैं !

दरख्तों के साये यूँ गहरा गए हैं,
कभी पास थे,कितने दूर आ गए हैं | (१)


कभी देख-सुनके चहकते थे उनको,
बंधन से अब छूटकर आ गए हैं |(२)


मेरे लबों पे है उनका फ़साना,
सबको सुनाकर यहाँ आ गए हैं |(३)


बड़ी बेरहम बेवफ़ाई है उनकी,
आईना दिखाकर मगर आ गए हैं |(४)


महबूब कोई फिर से मिलेगा,
हमको भुलाकर वो भरमा गए हैं |(५)

4 जून 2012

मेरे गीत---अब सबके गीत !

करीब दस रोज़ पहले सतीश सक्सेना जी  से बात हुई और तय हुआ कि उनके दिल्ली-आवास पर मुलाक़ात हो.इस मुलाक़ात की फौरी वज़ह तो उनकी पहली कृति को हासिल करना था,पर पहली बार मिलने का उल्लास भी था.सतीशजी ने बकायदा समझा दिया ताकि हमें उन तक पहुँचने में कोई दिक्कत पेश न हो.आखिर तय-समय पर मैं उनके आवास पर पहुंचा तो बिना किसी औपचारिकता के उन्होंने गले लगाया.ऐसा लगा ही नहीं कि यह हमारी पहली भेंट हो !

सप्रेम-भेंट 
हमने ब्लॉगिंग के वर्तमान घटनाक्रम पर खूब चर्चा की.इस बीच चाय-पानी भी होता रहा.उनके अतिथि-कक्ष में रखा निकॉन का बड़ा कैमरा मुझे बहुत आकर्षित कर रहा था.अचानक सतीश जी अपने इस प्रिय हथियार को लेकर मुझ पर ताबड़तोड़ टूट पड़े.मैं हतप्रभ,गोया  सेलिब्रेटी हो गया होऊँ ! इत्ते फोटू खींचे कि मेरी सारी परदेदारी उजागर हो गई.चित्रों में मेरे उड़े हुए बाल अचानक मेरे उम्रदराज़ हो जाने की चुगली करने लगे थे.कुछ चित्र वाकई खूबसूरत थे.जब उनकी बहू आ गई तो हम दोनों ने एक साथ फोटो खिंचाई.सतीशजी ने चालाकी से अपना चश्मा यह कहकर हटा लिया था कि इससे ज़रा बुजुर्गियत झलकेगी !!

बहरहाल,अब बात असल मुद्दे की. उन्होंने हाल ही में 'ज्योतिपर्व प्रकाशन ' से छपा अपना पहला काव्य-संग्रह 'मेरे गीत' मुझे भेंट किया .मैंने सरसरी तौर पर वहीँ इस पुस्तक को देखा और उनसे यह आग्रह भी किया कि इसमें से वे अपनी पसंद का एक गीत सुनाएँ.वे सहज भाव से इसके लिए राज़ी हो गए और मैंने अपने मोबाइल से उस दृश्य को कैद कर लिया.'मेरी रचना क्यों लिखी गई' कविता को उन्होंने हमें गाकर सुनाया.


घर आकर जब इस संकलन को पढ़ना शुरू किया तो सबसे ज़्यादा प्रभावित किया सतीशजी की भूमिका ने | माँ को बिलकुल बचपन में खोने का दर्द वही जान सकता है जिसके ऊपर ऐसा पहाड टूटा हो.लगता है,सतीश जी को दर्द का जो घूँट तब मिला ,वही अब कविता का सागर बन के निकल रहा है.उन्होंने भूमिका में कई जगह इस बात को रेखांकित किया है.माँ की तड़प को उन्होंने कितनी शिद्दत से महसूस किया है:
कई बार रातों में उठकर,
दूध गरम कर लाती होगी,
मुझे खिलाने की चिंता में 
खुद भूखी रह जाती होगी,
                                          मेरी तकलीफों में अम्मा,सारी रात जागती होगी |

और यह देखिये:
एक दिन सपने में तुम जैसी  
कुछ देर बैठकर चली गईं ,
हम पूरी रात जाग कर माँ
बस तुझे याद कर रोये थे !

ऐसी रचनाओं को पढ़ते-पढ़ते दिल भर आता है.बिलकुल दर्द को कविता बनाकर कागज पर उतार दिया है !इस संग्रह में माँ को समर्पित कई रचनाएँ हैं  |कवि ने अपने गीतों में अपने दर्द के अलावा अपनों के प्यार का भी इज़हार किया है.इसमें बेटी,बहू और पत्नी पर आधारित संस्मरणात्मक रचनाएँ हैं.जहाँ एक तरफ कवि के जीवन में माँ का अभाव खटकता है,वहीँ बाद में पत्नी,पुत्र,पुत्री और बेटी ने उसके जीवन में ऊर्जा का संचार कर दिया है.इस लिहाज़ से 'मेरे गीत' की रचनाएँ कवि के अपने जीवन के इर्द-गिर्द अनुभव किये जाने से उपजी हैं.इनमें काल्पनिकता के बजाय यथार्थ का पुट ज़्यादा है |

पत्नी को समर्पित एक हास्य-रचना देखिये:
जब से ब्याही हूँ साथ तेरे 
लगता है मजदूरी कर ली,
बरतन धोए,घर साफ करें
बुड्ढे -बुढिया के पैर छुए 
       जब से पापा ने शादी की,फूटी किस्मत अरमान लुटे,
         जब देखो तब बटुआ खाली,हम बात तुम्हारी क्यों माने ?


अपने पारिवारिक जीवन से इतर सामान्य जीवन,हास्य और प्यार पर भी रचनाएँ हैं,पर हमें उनकी दर्द से भरी रचनाएँ ज़्यादा प्रभावित करती हैं.कविताओं में संवेदनशीलता और सरोकार का अहसास होता है.इनमें कुछ बाल कवितायेँ भी हैं.कवि का पहला संग्रह है,इस नाते कविताओं के चयन में थोड़ा चूक हुई है.इनमें गंभीर कविताओं के बीच बिलकुल हल्की रचना अखरती है.इन्हें या तो अलग से स्थान दिया जाता या इसी संग्रह में देना ज़रूरी था तो अलग सेक्शन बनाया जा सकता था.
फोटोग्राफिक हुनर 

बहरहाल,कवि को उसके पहले संग्रह की ढेर सारी बधाई और मित्रों से यह अनुशंसा कि इस संकलन को अवश्य पढ़ें !
और हाँ,ऑडियो की खराबी के बावजूद सतीश जी को वीडियो में देखें और सुनें !


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